शख्स ने शुरू किया दुख सुनने का बिजनेस, छोटे दुख का 250 तो साथ रोने के लगेंगे 1000 रुपये
ऋचा सिंह, बिज़नेस डेस्क। आज के डिजिटल युग में जहाँ इंसान हजारों 'ऑनलाइन फ्रेंड्स' से घिरा है, वहीं असल जिंदगी में वह उतना ही अकेला होता जा रहा है। इसी अकेलेपन को दूर करने के लिए और लोगों का मन हल्का करने के लिए एक शख्स ने एक ऐसा बिजनेस शुरू किया है, जिसे सुनकर हर कोई हैरान है।
दुख सुनने का बिजनेस कैसे काम करता है?
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीर के अनुसार, इस शख्स का नाम पृथ्वीराज बोहरा (Prithvi Raj Bohra) बताया जा रहा है। इन्होंने एक पोस्टर जारी किया है जिसमें लिखा है— "अगर किसी को अपना दुख सुनाना है तो मैं सुन सकता हूँ..."। यह विचार सुनने में जितना अजीब लगता है, समाज की हकीकत को उतना ही गहराई से दर्शाता है। कई लोग ऐसे होते हैं जिनके पास अपनी बात कहने के लिए कोई भरोसेमंद साथी नहीं होता, ऐसे में यह शख्स एक 'पेड लिसनर' (Paid Listener) की भूमिका निभा रहा है।
रेट कार्ड का खौफनाक सच: क्या है पूरी फीस?
इस शख्स ने बाकायदा अपनी सेवाओं के लिए एक रेट कार्ड तैयार किया है, जो इस प्रकार है:
मामूली दुख के लिए: 250 रुपये
बड़ा दुख सुनाने के लिए: 500 रुपये
साथ में रोने के लिए: 1000 रुपये
पोस्टर में मिलने का समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक दिया गया है। साथ ही संपर्क के लिए मोबाइल नंबर और सोशल मीडिया हैंडल (Instagram/YouTube) भी साझा किए गए हैं।
कौन है यह शख्स और कहाँ का है मामला?
वायरल पोस्टर और सोशल मीडिया प्रोफाइल के अनुसार, यह शख्स राजस्थान या गुजरात के आसपास के क्षेत्रों से संबंधित लग रहा है, हालांकि इसकी सटीक लोकेशन की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है। पोस्टर पर दिए गए नाम 'पृथ्वीराज' और उनके सोशल मीडिया लिंक्स से पता चलता है कि वे इस काम को लेकर काफी गंभीर हैं और इसे एक प्रोफेशनल सर्विस की तरह प्रमोट कर रहे हैं।
सोशल मीडिया पर जनता की प्रतिक्रिया: मजाक या जरूरत?
जैसे ही यह फोटो वायरल हुई, इंटरनेट पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई। कुछ लोग इसे 'कलयुग का चरम' बता रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि यह एक बेहतरीन स्टार्टअप है क्योंकि आज के समय में कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है।
एक यूजर ने लिखा: "भाई, अगर मैं अपना पूरा जीवन सुना दूँ तो क्या डिस्काउंट मिलेगा?"
दूसरे यूजर ने कहा: "यह मजाक नहीं, समाज की कड़वी सच्चाई है कि अब हमें रोने के लिए भी पैसे देकर साथी ढूंढना पड़ रहा है।"
अकेलेपन का बढ़ता बाजार और मेंटल हेल्थ
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के 'अनोखे बिजनेस' का उदय होना यह दर्शाता है कि मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जुड़ाव की कितनी कमी है। विदेशों में 'रेंट-ए-फ्रेंड' (Rent a Friend) जैसी सेवाएं काफी समय से चल रही हैं, लेकिन भारत में इस तरह का सीधा और देसी मॉडल पहली बार इतने चर्चा में आया है।
क्या यह भविष्य का बिजनेस है?
भले ही यह खबर पढ़ने में हास्यास्पद लगे, लेकिन यह एक गंभीर संदेश देती है। पृथ्वीराज का यह 'दुख सुनने वाला बिजनेस' सफल होगा या नहीं, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इसने चर्चा छेड़ दी है कि क्या हम वाकई इतने अकेले हो चुके हैं?