NEET Paper Leak Protest : बहन-बेटियों पर लाठियाँ, आँसू गैस और लाखों की भीड़, क्या संसद मार्च के बाद बदल जाएगी देश की राजनीति? 3 बड़े खुलासे
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) धांधली के विरोध में जारी प्रदर्शन ने अब एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का रूप धारण कर लिया है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) और सोनम वांगचुक के नेतृत्व में आयोजित संसद मार्च के दौरान हुए घटनाक्रम ने देश के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह गरमा दिया है। जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह गतिरोध अब सीधे तौर पर सरकार की प्रशासनिक और विधायी नीतियों के लिए एक गंभीर कसौटी बन चुका है।
संसद मार्च से CJP और प्रदर्शनकारियों को क्या हासिल हुआ?
इस व्यापक आंदोलन और संसद कूच के माध्यम से CJP और प्रदर्शनकारी छात्रों ने कई रणनीतिक बढ़त हासिल की हैं:
अपेक्षा से अधिक जनसमर्थन और व्यापक सहभागिता
शुरुआती दो हफ्तों में जंतर-मंतर पर भीड़ सीमित थी। परंतु सोनम वांगचुक के अनशन के लगातार जारी रहने और स्वास्थ्य बिगड़ने के साथ ही देश भर के छात्र व अभिभावक दिल्ली पहुँचने लगे। संसद मार्च के दिन आयोजकों की अपेक्षा से कहीं अधिक संख्या में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे, जिसने इस डिजिटल प्लेटफॉर्म से शुरू हुए आंदोलन को जमीनी स्तर पर बेहद मजबूत बना दिया।
प्रशासनिक स्तर पर वार्ता की पहली पहल
आंदोलन के दबाव के चलते प्रशासनिक स्तर पर वार्ता की पहली आधिकारिक पहल देखने को मिली। सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ नेतृत्व और CJP के प्रतिनिधियों (सौरव दास एवं आशुतोष रांका) के बीच बैठक हुई। प्रदर्शनकारियों की ओर से सोनम वांगचुक की रिहाई, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और प्रभावित अभ्यर्थियों के लिए राहत उपाय जैसी माँगें रखी गईं। सरकार द्वारा ज्ञापन (Memorandum) स्वीकार करना इस बात का संकेत है कि आंदोलन की गूँज सत्ता के गलियारों तक स्पष्ट रूप से पहुँच चुकी है।
मुख्य विपक्षी दलों का मिला सीधा समर्थन
NEET मुद्दे पर छात्रों के रुख को देखते हुए प्रमुख विपक्षी दल खुलकर मैदान में उतर आए हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और सुप्रिया सुले जैसे प्रमुख नेताओं ने प्रदर्शनकारियों से मुलाकात कर अपनी एकजुटता व्यक्त की है। विपक्ष द्वारा इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने से आंदोलन को भारी राजनीतिक बल मिला है।
प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग से सरकार के सामने खड़ीं 3 बड़ी चुनौतियाँ
संसद मार्च के दौरान हुए लाठीचार्ज और पुलिस कार्रवाई के बाद सरकार के लिए स्थितियाँ अधिक जटिल हो गई हैं:
चुनौती 1: केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और शीर्ष नेतृत्व के विरोध की माँग
प्रदर्शनकारियों की माँग अब केवल परीक्षा रद्द करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें प्रशासनिक जवाबदेही भी जुड़ गई है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग को लेकर विपक्षी दल संसद से लेकर सड़कों तक आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। गैर-राजनीतिक स्वरूप वाले इस आंदोलन पर पारंपरिक राजनीतिक आरोप लगाना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
चुनौती 2: सोनम वांगचुक का अडिग अनशन और बिगड़ती स्थिति
सोनम वांगचुक द्वारा अस्पताल से भी भूख हड़ताल जारी रखने के निर्णय ने मामले को अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है। न्यायपालिका द्वारा उन्हें अन्य चिकित्सा केंद्र में स्थानांतरित करने की अनुमति के बाद, यदि उन्हें सार्वजनिक रूप से पुनः संवाद की अनुमति मिलती है, तो आंदोलन का दायरा और अधिक व्यापक हो सकता है।
चुनौती 3: संसद के मानसून सत्र में विधायी कार्यों पर संकट
संसद के चालू मानसून सत्र में महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतिगत सुधारों को पारित कराना सरकार की प्राथमिकता थी। परंतु इस जन-आंदोलन के चलते दोनों सदनों में लगातार हंगामा हो रहा है, जिससे विधायी कामकाज बाधित हो रहा है और सरकार को रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ रहा है।
भविष्य की दिशा: शासन और CJP के पास क्या विकल्प हैं?
सरकार के पास दो मुख्य रास्ते हैं। पहला, पूर्व के जन-आंदोलनों की तर्ज पर संवाद समिति का गठन कर छात्रों की मांगों पर सकारात्मक आश्वासन देना। दूसरा, सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा करना और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से जंतर-मंतर पर व्यवस्था बनाए रखना।
जंतर-मंतर से आगे की रणनीति
CJP नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि वे जंतर-मंतर पर अपना शांतिपूर्ण धरना जारी रखेंगे। उनका कहना है कि जब तक उनकी प्राथमिक मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनका सत्याग्रह अनवरत चलता रहेगा।