रीवा शिक्षा विभाग में 23 साल पुराने पाप का फूटा घड़ा: हाईकोर्ट की फटकार के बाद अब 'अन्वेषक' से दोबारा 'लेखापाल' बनेंगे मलाई काटने वाले 5 कर्मचारी

 

रीवा शिक्षा विभाग का महा-फर्जीवाड़ा: भ्रष्टाचार और मनमानी का पुराना सिंडिकेट फिर आया सुर्खियों में

ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले का स्कूल शिक्षा विभाग और जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय एक बार फिर अपने ही कारनामों के कारण सूबे की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में सुर्खियों में है. रीवा का शिक्षा विभाग वैसे तो लंबे समय से नियम विरुद्ध भर्तियों, फर्जी नियुक्तियों और निजी स्कूलों को मलाई बांटने के खेल के लिए बदनाम रहा है, लेकिन इस बार जो मामला सामने आया है उसने व्यवस्था की जड़ों को हिलाकर रख दिया है.

यह पूरा मामला आज से करीब 23 साल पुराना है, जब अपनी शासकीय शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी ने पाँच चहेते कर्मचारियों को नियम-कायदे ताक पर रखकर 'अवैध प्रमोशन' की रेवड़ी बांट दी थी. अब, पूरे 17 साल तक चले लंबे कानूनी ड्रामे के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने इस फर्जीवाड़े पर अपना अंतिम और कड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कह दिया है कि बिना नियमों के किया गया यह प्रमोशन पूरी तरह अवैध था और इसके साथ ही कर्मचारियों की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया गया है. इस झटके के बाद अब इन रसूखदारों को वापस अपने मूल पद पर भेजने यानी 'डिमोशन' की तैयारी अंतिम दौर में है.

कुर्सी का ऐसा दुरुपयोग: जब DEO ने सीधी भर्ती के पदों पर बैकडोर से बांट दी प्रमोशन की रेवड़ी
इस सनसनीखेज घोटाले की पटकथा वर्ष 2003 में लिखी गई थी. उस समय जिला शिक्षा अधिकारी की कुर्सी पर बैठे अफसर ने नियमों की ऐसी धज्जियां उड़ाईं कि पूरा विभाग देखता रह गया. स्कूल शिक्षा विभाग के नियमों के मुताबिक, 'अन्वेषक' (Investigator) का पद शत-प्रतिशत सीधी भर्ती का होता है, यानी इस पद पर परीक्षा या तय प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए ही सीधी नियुक्ति की जा सकती है. इसमें नीचे के संवर्ग से किसी को भी पदोन्नत करने का कोई प्रावधान ही मौजूद नहीं था.

परंतु, तत्कालीन DEO ने अपनी कलम की ताकत का गलत इस्तेमाल करते हुए विभाग में पदस्थ 5 चहेते लेखापालों (Accountants) को रातों-रात सीधे 'अन्वेषक' के पद पर बैठा दिया. 14 अगस्त 2003 को जारी किया गया वह एक आदेश विभागीय भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा दस्तावेज बन गया. मजे की बात यह है कि करीब 6 सालों तक यह पूरा सिंडिकेट बिना किसी डर के मलाई काटता रहा और फाइलों को दबाकर रखा गया.

विधानसभा में गूंजी थी गूंज: 6 साल बाद खुली पोल, तो कमिश्नर के आदेश पर जेडी ने काटा था पत्ता
कहा जाता है कि पाप का घड़ा एक न एक दिन जरूर भरता है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। वर्ष 2009 में यह अमानवीय और गैर-कानूनी मामला मध्य प्रदेश विधानसभा की दहलीज तक पहुंच गया. विधानसभा में जैसे ही रीवा शिक्षा विभाग के इस फर्जीवाड़े को लेकर सवाल उठा, भोपाल से लेकर रीवा तक हड़कंप मच गया. शासन के निर्देश पर तुरंत एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित की गई.

जब जांच टीम ने फाइलों की धूल झाड़ी, तो परत-दर-परत तत्कालीन डीईओ और इन कर्मचारियों का गठजोड़ बेनकाब हो गया. जांच में साफ पाया गया कि इस पदोन्नति के लिए कोई प्रक्रिया ही नहीं अपनाई गई थी. इसके बाद, आयुक्त लोक शिक्षण (कमिश्नर) के सख्त निर्देश पर 14 मई 2009 को संयुक्त संचालक (JD) रीवा ने एक बड़ा हंटर चलाते हुए इन सभी पांचों कर्मचारियों का गलत प्रमोशन तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया और उन्हें मूल पद पर वापस भेजने का फरमान जारी कर दिया.

फर्जीवाड़े के 'पांच सितारे': जानिए किन-किन कर्मचारियों पर गिरने जा रही है डिमोशन की गाज
रीवा न्यूज़ मीडिया की खोजी रिपोर्ट में उन पांचों कर्मचारियों के नाम और उनके तत्कालीन पदस्थापना स्थलों का पूरा ब्योरा सामने आया है, जो इस अवैध मलाई सिंडिकेट का हिस्सा थे और अब वापस अपने पुराने पदों पर लौटने वाले हैं:

  • श्रीमती महमूदन खान: तत्कालीन पदस्थापना - जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय, रीवा।
  • हरिहर पटेल: तत्कालीन लेखापाल - शासकीय हाई स्कूल, शिवपुर्वा।
  • फतेमोहम्मद खान: तत्कालीन लेखापाल - शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (शाउमावि) बालक, बैकुंठपुर।
  • द्रोणाचार्य पाण्डेय: तत्कालीन लेखापाल - जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय, रीवा।
  • रामाप्रसन्नधर द्विवेदी: तत्कालीन लेखापाल - जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय, रीवा।

इन सभी पांचों को 2003 में नियम विरुद्ध तरीके से 'अन्वेषक' बनाया गया था और अब ये सभी वापस अपने मूल संवर्ग यानी लेखापाल के पद पर डिमोट किए जाएंगे.

हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार: 17 साल का कानूनी ड्रामा खत्म, कोर्ट ने कहा- "शक्तियों का हुआ था गलत इस्तेमाल"
जब 2009 में शासन ने इन सभी को डिमोट करने का आदेश जारी किया, तो व्यवस्था को चुनौती देने के लिए इनमें से चार कर्मचारी न्याय की गुहार लगाने माननीय उच्च न्यायालय पहुंच गए। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका (WP 5399/2009) दायर कर शासन के आदेश पर स्टे लेने का प्रयास किया। तब से लेकर अब तक, यानी पूरे 17 साल तक यह मामला अदालत की तारीखों में घूमता रहा।

अब इस मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक शुचिता को लेकर एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि याचिकाकर्ताओं को जिस अन्वेषक के पद पर पदोन्नत किया गया था, उसके लिए विभाग में कोई पदोन्नति नियम या प्रक्रिया अस्तित्व में ही नहीं थी। यह पूरी कार्रवाई केवल और केवल प्रशासनिक शक्तियों का अनियमित और गलत प्रयोग थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी अवैध निर्णय का लाभ याचिकाकर्ताओं को नहीं दिया जा सकता और इसके साथ ही उनकी याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया गया.

क्या मिली मामूली राहत? काम के बदले मिले वेतन की वसूली पर कोर्ट ने लगाई रोक
हालांकि, इस पूरे कड़े रुख के बीच अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण और तकनीकी पहलुओं को देखते हुए इन कर्मचारियों को एक छोटी सी राहत जरूर दी है। शासन की तरफ से यह दलील आ सकती थी कि इतने सालों तक उच्च पद का जो वेतन इन्होंने लिया है, उसकी रिकवरी (वसूली) की जाए।

परंतु, कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि भले ही इनका प्रमोशन गलत था और शक्तियों का दुरुपयोग हुआ था, लेकिन इन कर्मचारियों ने इतने वर्षों तक अन्वेषक के पद पर वास्तविक रूप से काम किया है। चूंकि उन्होंने शासकीय कार्य का संपादन किया है, इसलिए उन्हें उस काम के बदले भुगतान किया गया था। ऐसी स्थिति में, इतने वर्षों के वेतन की वित्तीय वसूली इन कर्मचारियों से नहीं की जाएगी। कोर्ट ने डिमोशन को सही ठहराते हुए केवल इस वित्तीय रिकवरी से उन्हें मुक्त रखा है।

अब संयुक्त संचालक (JD) के पाले में गेंद: जिला शिक्षा अधिकारी ने कोर्ट के आदेश की कॉपी भेजी
उच्च न्यायालय द्वारा 27 अप्रैल 2026 को याचिका खारिज किए जाने के बाद अब प्रशासनिक मशीनरी तेजी से हरकत में आ गई है। नियमों के मुताबिक, पूर्व में भी इन कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त करने और डिमोशन का आदेश संयुक्त संचालक (जेडी) लोक शिक्षण रीवा की तरफ से जारी हुआ था, इसलिए अब कोर्ट के इस ताजा आदेश पर अंतिम मुहर भी जेडी को ही लगानी है।

जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय रीवा की ओर से उच्च न्यायालय के फैसले की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) के साथ एक आधिकारिक पत्र संयुक्त संचालक कार्यालय को प्रेषित कर दिया गया है। इस पत्र में कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए इन पांचों कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से उनके मूल संवर्ग यानी लेखापाल के पद पर वापस भेजने (मूल विभाग वापसी) की अनुशंसा की गई है। उम्मीद जताई जा रही है कि अगले कुछ ही दिनों में जेडी कार्यालय से डिमोशन का आधिकारिक आदेश जारी हो जाएगा, जिससे शिक्षा विभाग के भीतर अवैध तरीके से पैर जमाए बैठे अन्य लॉबिंग करने वालों में भी हड़कंप मचा हुआ है।