रीवा कलेक्टर के पत्र ने खोली पोल: 7 साल से बिना CPCT नौकरी कर रही थी महिला कर्मचारी, क्या रसूखदार है?
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) रीवा जिले में सरकारी नौकरी पाने के इच्छुक लोगों और कर्मचारियों के बीच एक बड़ा मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। हाल ही में कलेक्टर कार्यालय में अनुकंपा नियुक्ति के तहत नियुक्त दो लिपिकों से जुड़े मामलों ने प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन मामलों में एक लिपिक द्वारा फर्जी CPCT (Computer Proficiency Certification Test) प्रमाण पत्र जमा करने और दूसरे द्वारा सात साल बीत जाने के बावजूद यह अनिवार्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत न करने का खुलासा हुआ है। यह अनियमितताएं तब उजागर हुईं जब कलेक्टर डॉ. प्रतिभा पाल ने इन मामलों में कार्रवाई शुरू की। उनके द्वारा एक लिपिक को सेवा से बर्खास्त करने और दूसरे के खिलाफ मार्गदर्शन मांगने वाला पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिससे यह मामला सुर्खियों में आ गया।
यह घटना दर्शाती है कि सरकारी विभागों में नियुक्ति प्रक्रिया में कितनी खामियां हो सकती हैं और किस तरह से कुछ लोग नियमों को ताक पर रखकर नौकरी पाने में सफल हो जाते हैं। प्रशासन की यह कार्रवाई एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह भी सवाल उठाती है कि ऐसे मामले पहले क्यों नहीं पकड़े गए।
फर्जी प्रमाण पत्र पर एक लिपिक बर्खास्त, दूसरे पर कार्रवाई क्यों नहीं?
इस मामले में दो अलग-अलग स्थितियां सामने आई हैं, जिन पर अलग-अलग कार्रवाई की गई है। पहला मामला लिपिक अभिराम मिश्रा का है। उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति मिलने के बाद जो CPCT प्रमाण पत्र जमा किया था, वह जांच में पूरी तरह से फर्जी पाया गया। इस गंभीर अनियमितता को देखते हुए, कलेक्टर डॉ. प्रतिभा पाल ने तत्काल प्रभाव से उनकी सेवा समाप्त कर दी। कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि फर्जी दस्तावेज जमा करना एक आपराधिक कृत्य है, और ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। अभिराम मिश्रा को सेवा से अलग करने का यह निर्णय एक कठोर संदेश देता है कि भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
वहीं, दूसरा मामला महिला लिपिक वंदना द्विवेदी का है। उन्हें वर्ष 2017 में अनुकंपा नियुक्ति मिली थी, लेकिन उन्होंने अब तक अनिवार्य CPCT प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया है। अनुकंपा नियुक्ति के नियमों के अनुसार, ऐसे प्रमाण पत्र को एक तय समय सीमा के भीतर जमा करना होता है, लेकिन वंदना द्विवेदी ने न तो प्रमाण पत्र दिया और न ही समय सीमा बढ़ाने के लिए कोई आवेदन दिया। इस मामले में कार्रवाई करने के बजाय, कलेक्टर ने मध्य प्रदेश शासन के सचिव को पत्र लिखकर मार्गदर्शन मांगा है। यही पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिससे लोगों में यह सवाल उठ रहा है कि जब एक कर्मचारी को तुरंत बर्खास्त कर दिया गया, तो दूसरे के खिलाफ कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है।
क्या है CPCT और क्यों है यह इतना जरूरी?
CPCT, यानी Computer Proficiency Certification Test, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित एक अनिवार्य परीक्षा है। इस परीक्षा का मुख्य उद्देश्य सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों की कंप्यूटर दक्षता और टाइपिंग कौशल को प्रमाणित करना है। लिपिक जैसे पदों के लिए यह प्रमाण पत्र बेहद महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इन पदों पर कंप्यूटर पर काम करना और डेटा एंट्री करना मुख्य कार्य होता है। यह परीक्षा सुनिश्चित करती है कि कर्मचारी अपने काम को प्रभावी ढंग से कर सकें।
अनुकंपा नियुक्ति के तहत नियुक्त होने वाले अभ्यर्थियों को भी यह परीक्षा पास करके अपना प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होता है। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि अनुकंपा नियुक्ति पाने वाले कर्मचारी भी कार्यालय के कार्यों में दक्ष हों और उन्हें अतिरिक्त प्रशिक्षण की आवश्यकता न हो। यह एक तरह का गुणवत्ता नियंत्रण है जो सरकारी सेवा की कार्यक्षमता को बनाए रखने में मदद करता है।
कांग्रेस ने उठाए सवाल: क्या प्रभावशाली महिला कर्मचारी को मिल रही है छूट?
यह मामला सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा शुरू हो गई है। स्थानीय कांग्रेस नेता कुंवर सिंह ने इस कार्रवाई को पक्षपातपूर्ण बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि वंदना द्विवेदी की ऊपर तक पहुंच है, इसी कारण उनके खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। कुंवर सिंह ने सवाल किया कि जब एक कर्मचारी को फर्जी प्रमाण पत्र के लिए तुरंत बर्खास्त कर दिया गया, तो दूसरे कर्मचारी, जिन्होंने 7 साल से प्रमाण पत्र नहीं दिया, उनके खिलाफ कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है। यह आरोप प्रशासन पर राजनीतिक दबाव और पक्षपात के संकेत दे रहा है।
यह स्थिति सरकारी विभागों में काम करने वाले सामान्य कर्मचारियों के लिए भी एक चिंता का विषय है, क्योंकि यह न्याय और समानता के सिद्धांतों पर सवाल उठाती है।
कलेक्टर का बयान: सख्त कार्रवाई का आश्वासन
मामले के तूल पकड़ने पर कलेक्टर डॉ. प्रतिभा पाल ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि अनुकंपा नियुक्ति के नियमों के तहत, अभ्यर्थियों को तय समय सीमा के भीतर CPCT प्रमाण पत्र जमा करना होता है। उन्होंने साफ कहा कि फर्जी दस्तावेज जमा करने वाले कर्मचारी पर कठोर कार्रवाई की गई है और यह एक सही निर्णय है। वहीं, उन्होंने वंदना द्विवेदी के मामले पर कहा कि इस पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। मार्गदर्शन मांगने का उद्देश्य प्रक्रिया को पारदर्शी और नियमों के अनुकूल बनाना है। हालांकि, उनका यह बयान कांग्रेस के आरोपों का पूरी तरह से खंडन नहीं कर पाता।
आगे क्या? क्या अन्य मामले भी आएंगे सामने?
रीवा में उजागर हुई यह अनियमितता सिर्फ एक शुरुआत हो सकती है। यह संभव है कि अन्य सरकारी विभागों में भी ऐसे ही मामले दबे हुए हों, जहां कर्मचारी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर या नियमों का उल्लंघन करके काम कर रहे हों। यह घटना प्रशासन के लिए एक वेक-अप कॉल है कि उसे अपनी भर्ती और अनुकंपा नियुक्ति प्रक्रियाओं की गहन जांच करनी चाहिए।
यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार वंदना द्विवेदी के मामले में क्या मार्गदर्शन देती है और उस पर क्या कार्रवाई होती है। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि क्या प्रशासन अन्य विभागों में भी ऐसे मामलों की जांच करेगा ताकि भविष्य में इस तरह का फर्जीवाड़ा रोका जा सके।
अनुकंपा नियुक्ति के नियम क्या हैं और क्यों जरूरी है पारदर्शिता?
अनुकंपा नियुक्ति का नियम उन परिवारों के लिए बनाया गया है जिनके कमाने वाले सदस्य का निधन हो जाता है। इसका उद्देश्य पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता प्रदान करना है। हालांकि, इस प्रक्रिया में भी कुछ नियमों का पालन करना होता है, जैसे शैक्षिक योग्यता और जरूरी प्रमाण पत्र जमा करना।
इन नियमों का सख्ती से पालन करना इसलिए जरूरी है ताकि व्यवस्था में पारदर्शिता बनी रहे और सिर्फ योग्य व्यक्ति ही इस लाभ को प्राप्त कर सकें। यदि नियमों का उल्लंघन किया जाता है तो यह न केवल प्रणाली में विश्वास को खत्म करता है, बल्कि योग्य उम्मीदवारों के साथ भी अन्याय होता है। रीवा का यह मामला एक उदाहरण है कि किस तरह से नियमों की अनदेखी के कारण व्यवस्था में सेंध लगाई जा सकती है।