रीवा SSMC में 64 करोड़ का बड़ा घोटाला! नए अकादमिक भवन में जड़े ताले, लिफ्ट बंद, दीवारों में दरारें! न पानी, न टॉयलेट, एसी खराब... राज्यपाल ने किया था लोकार्पण
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। विंध्य अंचल के अग्रणी स्वास्थ्य संस्थान श्याम शाह मेडिकल कॉलेज (SSMC), रीवा में चिकित्सा शिक्षा का ढांचा प्रशासनिक लापरवाही और घटिया निर्माण की भेंट चढ़ गया है। राज्य सरकार द्वारा क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल शिक्षा को विस्तार देने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये के बजट से स्वीकृत नया अकादमिक भवन आज स्वयं एक बड़ी समस्या बन चुका है।
जिस नए अकादमिक ब्लॉक का भव्य शुभारंभ संवैधानिक पदों पर बैठे गणमान्य अतिथियों और मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री की उपस्थिति में संपन्न हुआ था, वह तीन वर्षों बाद जब हस्तांतरित हुआ तो उपयोग के लायक ही नहीं निकला। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि यहाँ एमबीबीएस की शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों और उन्हें पढ़ाने वाले वरिष्ठ प्राध्यापकों ने इस परिसर में बैठने और अध्यापन कार्य संचालित करने से साफ मना कर दिया है, जिससे भविष्य के डॉक्टरों की पढ़ाई पूरी तरह ठप पड़ी है।
₹64 करोड़ की लागत के बाद भी क्यों बेहाल है मेडिकल कॉलेज परिसर
श्याम शाह मेडिकल कॉलेज परिसर के विस्तार के तहत दो विशाल अकादमिक ब्लॉक और तीन अत्याधुनिक छात्रवासों का निर्माण स्वीकृत किया गया था। इस संपूर्ण परियोजना पर लोक निर्माण विभाग की कार्यपालन इकाई (PIU) के माध्यम से लगभग ₹64 करोड़ की भारी-भरकम राशि व्यय की गई। किंतु धरातल पर जो परिणाम सामने आया, वह अत्यंत निराशाजनक है।
सेंट्रल एसी बंद, बिना पंखों के दमघोटू माहौल में पढ़ने को मजबूर छात्र
नए अकादमिक परिसर के लेक्चर हॉल (LT-1) की संरचना इस प्रकार बनाई गई है कि यहाँ प्राकृतिक हवा का आवागमन न्यूनतम है और यह पूरी तरह से वातानुकूलित (Air Conditioned) प्रणाली पर निर्भर है। विडंबना यह है कि हस्तांतरण के तुरंत बाद ही यहाँ लगाए गए सेंट्रल एसी ठप पड़ गए।
कक्षों में सीलिंग फैन लगाने का कोई विकल्प मौजूद नहीं है। नतीजतन, भीषण गर्मी के मौसम में हॉल के भीतर का तापमान इतना अधिक बढ़ जाता है कि कुछ ही मिनटों में विद्यार्थियों और प्रोफेसरों का दम घुटने लगता है। लगातार पसीने से लथपथ होने और अस्वस्थ महसूस करने के कारण एमबीबीएस वर्ष 2022 बैच (अंतिम वर्ष) के विद्यार्थियों ने इन कक्षाओं का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया है।
शौचालयों में जड़े ताले, पेयजल की व्यवस्था न होने से आक्रोश
करोड़ों रुपये की लागत से बने इस परिसर में मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की भी सुध नहीं ली गई है। भवन के भीतर शौचालयों का निर्माण तो कागज़ों और ढांचों में पूर्ण दर्शा दिया गया है, किंतु व्यावहारिक रूप से उन पर ताले लटके हुए हैं।
अकादमिक कार्य हेतु आने वाली छात्राओं और महिला चिकित्सकों को अति-आवश्यक स्थिति में भी दूर स्थित पुराने भवनों की दौड़ लगानी पड़ती है। इसके अतिरिक्त, पूरे नए ब्लॉक में शुद्ध पेयजल का एक भी सुचारू स्तंभ स्थापित नहीं किया जा सका है, जिससे अध्ययनरत छात्र पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं।
लिफ्ट बंद, दीवारों में दरारें और बारिश में उड़ी प्लास्टिक शेड
इमारत की संरचनात्मक गुणवत्ता इतनी दयनीय है कि यह सुरक्षा के मानकों पर भी खरी नहीं उतरती:
- तकनीकी रूप से असुरक्षित लिफ्ट: परिसर में स्थापित की गई तीनों लिफ्ट बंद पड़ी हैं। पूर्व में एक लिफ्ट के अचानक रुक जाने से उसमें कई विद्यार्थी फंस गए थे, जिससे बड़ा हादसा होते-होते बचा।
- क्षतिग्रस्त शेड: भवन के शीर्ष हिस्से को जलभराव से बचाने के लिए जो अस्थायी प्लास्टिक शेड लगाए गए थे, वे पूर्व की सामान्य बारिश और हवा में ही उखड़कर बह गए।
- दीवारों में दरारें: नव-निर्मित संरचना की दीवारों में जगह-जगह गहरी दरारें उभर आई हैं, जो निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की गुणवत्ता पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती हैं।
PIU निर्माण एजेंसी और ठेकेदारों की भूमिका पर सवाल
इस पूरी परियोजना का निर्माण कार्य पीआईयू (PIU) के नियंत्रण में हुआ। निर्माण की समयावधि के दौरान एक के बाद एक दो ठेकेदारों को बदला गया, जिससे कार्य में अत्यधिक विलंब हुआ।
लोकार्पण के तीन साल बीत जाने के बाद भी जब भवन पूरी तरह तैयार नहीं था, तब भी जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा बिना गहन भौतिक परीक्षण (Physical Verification) के इसे कॉलेज प्रशासन को सौंप दिया गया। कागजी औपचारिकताओं में भवन हस्तांतरित तो हो गया, लेकिन इसका खामियाज़ा अब शिक्षा व्यवस्था को भुगतना पड़ रहा है।
डीन और भवन शाखा की अनदेखी से ठप हुआ शिक्षण कार्य
सत्र की शुरुआत से ही विद्यार्थियों ने इस बदहाली के विरुद्ध आवाज़ उठाना शुरू कर दिया था। एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्रों ने संगठित होकर कॉलेज के डीन तथा भवन निर्माण शाखा के प्रभारी को कई बार लिखित आवेदन और शिकायत पत्र सौंपे।
शिकायत पत्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि बंद एसी, पंखों की अनुपस्थिति, पीने के पानी का अभाव और बंद शौचालयों के कारण अकादमिक वातावरण पूरी तरह नष्ट हो चुका है। किंतु प्रबंधन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। लगातार हो रही उपेक्षा से आहत होकर अंततः प्राध्यापकों ने भी पठन-पाठन से अपने हाथ खींच लिए, जिसके बाद नए अकादमिक ब्लॉक में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है।
कब सुधरेगी विंध्य के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान की स्थिति?
सरकारी धन के दुरुपयोग और प्रशासनिक लापरवाही का यह प्रत्यक्ष उदाहरण है जहाँ ₹64 करोड़ खर्च होने के बाद भी देश के भावी चिकित्सक बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जब तक निर्माण एजेंसी PIU, संबंधित ठेकेदारों और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाती और भवन को पूर्णतः सुचारू नहीं बनाया जाता, तब तक श्याम शाह मेडिकल कॉलेज में पठन-पाठन का सामान्य होना कठिन प्रतीत होता है।