सरकारी 'सुशासन' बनाम जमीनी हकीकत: रीवा में खाद के लिए बारिश में भीगते किसान, कौन जिम्मेदार? सरकार के दावों की खुली पोल
ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के कई शहरों में इन दिनों खाद का संकट गहराता जा रहा है, और इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण रीवा जिले में देखने को मिल रहा है। जहाँ सरकारें लगातार खाद की पर्याप्त उपलब्धता के दावे कर रही हैं, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। रीवा की सबसे बड़ी करहिया मंडी में रविवार देर रात हजारों किसान खाद के लिए घंटों लाइन में खड़े रहे, जिनमें बच्चे, बुजुर्ग और बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं। उनकी यह बेबसी सरकारी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
बारिश और ठंड में रात भर का इंतजार
रविवार की रात, जब पूरा शहर सो रहा था, रीवा की करहिया मंडी में एक अलग ही मंजर था। खाद के लिए यहाँ हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। रात करीब 2 बजे जब तेज बारिश शुरू हुई, तो हालात और भी बदतर हो गए। किसानों को ठंड और बारिश से बचने के लिए कोई सहारा नहीं मिल रहा था। किसी ने शॉल ओढ़ी, तो किसी ने प्लास्टिक की शीट, और कुछ किसानों ने तो टीन शेड को ही सिर पर रखकर खुद को भीगने से बचाया। महिलाओं के साथ आए छोटे बच्चे भी ठंड से कांपते नजर आए, जो शॉल में लिपटे हुए थे।
किसान खाद के लिए क्यों परेशान हैं?
किसानों का कहना है कि यह उनकी मजबूरी है। खेती-किसानी का सीजन अपने चरम पर है और अगर सही समय पर फसलों को खाद नहीं मिली, तो पूरी फसल बर्बाद हो जाएगी। किसान लगातार 10-10 दिनों से खाद केंद्रों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें खाद नहीं मिल रही। यही वजह है कि वे रात भर लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करने को मजबूर हैं।
'नारा' नहीं, 'राहत' चाहिए
किसानों को खाद के लिए रात-रात भर लाइन में क्यों लगना पड़ रहा है? जब सरकार कहती है कि खाद की कोई कमी नहीं है, तो फिर ये 2 किलोमीटर लंबी लाइनें किसकी हैं? ये वो किसान हैं, जिनके पसीने से देश की रोटी पैदा होती है, और आज उन्हें एक बोरी खाद के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। महिलाएं अपने छोटे बच्चों को गोद में लिए बारिश और ठंड में ठिठुर रही हैं, और सरकार के पास सिर्फ फोटो-वीडियो जारी करने का समय है। क्या यही है 'किसान हितैषी' सरकार का असली चेहरा?
अव्यवस्था और कालाबाजारी का खेल
यह सिर्फ खाद की कमी का मामला नहीं है, यह सरकार की अव्यवस्था और निजी व्यापारियों की मिलीभगत का नतीजा है। किसान सीधे आरोप लगा रहे हैं कि खाद की कालाबाजारी हो रही है, और सरकारी केंद्रों पर उपलब्ध खाद को गुपचुप तरीके से निजी दुकानों तक पहुँचाया जा रहा है, जहाँ वह ऊंचे दामों पर बेची जा रही है। अगर अपर कलेक्टर का यह दावा सही है कि खाद की रैक लगातार आ रही हैं, तो फिर ये खाद जा कहाँ रही है? क्या सरकार के पास इस बात का कोई जवाब है?
यह स्पष्ट है कि सरकार किसानों की समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं है। अगर सरकार वाकई किसानों के साथ खड़ी होती, तो उन्हें रात-रात भर बारिश में खड़े होकर अपनी पीड़ा नहीं सुनानी पड़ती। किसानों की यह दुर्दशा इस बात का प्रमाण है कि सरकारी तंत्र बुरी तरह विफल हो चुका है।
कालाबाजारी का आरोप: किसानों की पीड़ा
बारिश में भीगते और ठंड में ठिठुरते किसानों ने आरोप लगाया कि इस संकट के पीछे कालाबाजारी जिम्मेदार है। उनका कहना है कि सरकारी केंद्रों पर खाद उपलब्ध नहीं है, लेकिन निजी दुकानों पर यह दोगुनी कीमत पर बेची जा रही है। एक किसान ने तो अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि अगर खाद नहीं मिली तो फसल बर्बाद हो जाएगी, और उसने अपनी गले में रस्सी डालकर अपनी बेबसी जाहिर की।
मध्य प्रदेश में खाद की कालाबाजारी कैसे हो रही है?
किसानों के मुताबिक, सरकार द्वारा वितरित होने वाली खाद को निजी व्यापारी और बिचौलिए महंगे दामों पर बेच रहे हैं। इस तरह की कालाबाजारी के कारण छोटे और गरीब किसान जो अधिक कीमत नहीं चुका सकते, वे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
महिलाओं की मुश्किलें: सुरक्षा और सुविधा का अभाव
करहिया मंडी में खाद के लिए पहुंची महिलाओं ने भी अपनी समस्याओं को बयां किया। सुनीता पटेल ने कहा कि सरकारें सिर्फ दावे करती हैं, जबकि किसानों की असल हालत उन्हें पता नहीं। प्रमिला सिंह ने बताया कि वह अपने तीन साल के बच्चे को घर पर छोड़कर आई हैं, और उनके पति भी लाइन में लगे हैं, लेकिन फिर भी खाद मिलने की कोई गारंटी नहीं है।
तस्वीरों में देखिए किसानों के लिए खाद पाने की चुनौतियां...
एक और महिला किसान, नीलम सिंह, ने सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मंडी में महिला शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है और इतने पुरुषों के बीच टॉयलेट जाना भी मुश्किल है।
सरकारी जवाब और जमीनी हकीकत
जब इस स्थिति के बारे में अपर कलेक्टर सपना त्रिपाठी से पूछा गया, तो उन्होंने दावा किया कि जिले में खाद की रैक लगातार आ रही है और निजी विक्रेताओं और सहकारी समितियों में राजस्व अधिकारियों की निगरानी में खाद का वितरण किया जा रहा है। उन्होंने किसानों से एक सप्ताह की जरूरत के हिसाब से ही खाद उठाने की अपील की।
हालांकि, किसानों की 2 किलोमीटर लंबी लाइन और रात भर का इंतजार सरकारी दावों की पोल खोलता है। यह दिखाता है कि या तो वितरण व्यवस्था में कोई बड़ी कमी है, या फिर कालाबाजारी के कारण खाद जरूरतमंद किसानों तक पहुँच ही नहीं रही है।
निष्कर्ष: किसान कब तक करेगा इंतजार?
रीवा के किसानों की यह दुर्दशा सिर्फ एक जिले की नहीं, बल्कि पूरे देश के कृषि क्षेत्र में व्याप्त समस्याओं का एक चेहरा है। जब किसान को अपनी फसल बचाने के लिए इतनी मेहनत करनी पड़ रही है, तो सरकार की योजनाएं और दावे खोखले नजर आते हैं। यह समय है कि सरकारें सिर्फ बयानबाजी से आगे बढ़कर, जमीनी स्तर पर प्रभावी कदम उठाएं और यह सुनिश्चित करें कि किसानों को उनकी जरूरत की चीजें समय पर और सही दाम पर मिलें।