रीवा में स्वास्थ्य सेवा बनी अंधाधुंध कारोबार! हर कदम पर वसूली से कांप रहे मरीज; क्या स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले के इस बड़े खेल पर एक्शन होगा?
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे और जनता के भरोसे को झकझोर देने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। यह पूरा घटनाक्रम प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल के गृह जिले का है, जिससे इस मामले की संवेदनशीलता और भी बढ़ जाती है। जिले के एक नामचीन निजी अस्पताल (Private Hospital) पर मरीजों और उनके परिजनों ने आर्थिक शोषण करने और मनमानी फीस वसूलने के बेहद संगीन आरोप लगाए हैं।
शिकायत के मुताबिक, अस्पताल प्रबंधन ने बीमारी को सेवा के बजाय पूरी तरह से एक अंधाधुंध कमाई का जरिया बना लिया है। मरीजों का कहना है कि शुरुआती परामर्श शुल्क (Consultation Fee) चुकाने के बाद भी, जब वे जांच रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास जाते हैं, तो उनसे दोबारा जेब ढीली करने को कहा जाता है। यह मुद्दा अब सोशल मीडिया से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक में गूंज रहा है, जिसने रीवा के निजी स्वास्थ्य तंत्र और उस पर निगरानी रखने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।
लूट की इनसाइड स्टोरी: 'रिपोर्ट दिखाने के नाम पर 500 रुपये की एक्स्ट्रा चपत'
आमतौर पर किसी भी अस्पताल में नियम होता है कि मरीज एक बार पर्चा (ओपीडी फीस) कटवाता है, तो डॉक्टर के कहने पर होने वाली जांचों की रिपोर्ट वह उसी पर्चे पर दिखा सकता है। लेकिन इस आरोपी अस्पताल ने अपना खुद का एक नया नियम बना लिया है। यहाँ डॉक्टर को सिर्फ लैब या एक्स-रे की रिपोर्ट दिखाने के नाम पर मरीजों से ₹500 की अतिरिक्त (Extra) फीस वसूली जा रही है।
पीड़ित परिवारों का आरोप है कि अस्पताल में पैर रखते ही हर कदम पर अलग-अलग प्रक्रियाओं के नाम पर पैसे ऐंठे जा रहे हैं। दवाई, बेड चार्ज और महंगी जांचों के भारी-भरकम बोझ से दबा मरीज जब अपनी ही रिपोर्ट डॉक्टर को दिखाने अंदर जाता है, तो बाहर काउंटर पर उसे ₹500 का एक और नया पर्चा कटवाने पर मजबूर किया जाता है। अस्पताल की इस एकतरफा व्यवस्था से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट पूरी तरह से ध्वस्त हो रहा है। फिलहाल इस मामले में स्वतंत्र जांच की मांग की जा रही है, क्योंकि अस्पताल प्रबंधन ने अभी तक इन आरोपों पर अपनी कोई सफाई या पक्ष पेश नहीं किया है।
वायरल ऑडियो/बातचीत का सच: 'गलती अस्पताल की, जुर्माना भुगत रहे मरीज'
मरीजों के साथ होने वाली इस जबरन वसूली का एक बड़ा प्रमाण अस्पताल के कर्मचारी और पीड़ित मरीज के रिश्तेदार के बीच हुई तीखी बहस से सामने आया है। इस बातचीत ने अस्पताल के भीतर चल रहे तानाशाही ढर्रे को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है:
देरी भी अस्पताल की, वसूली भी अस्पताल की:
मरीज के तीमारदार ने जब विरोध जताते हुए कहा कि “अस्पताल प्रबंधन ने जांच रिपोर्ट 7 दिनों के भीतर देने का वादा किया था, लेकिन लापरवाही के कारण रिपोर्ट पूरे 16 दिन बाद दी जा रही है। जब समय सीमा अस्पताल की गलती से निकली है, तो मरीज दोबारा फीस क्यों दे?”
अस्पताल प्रबंधन का अड़ियल रवैया:
इस तार्किक सवाल पर अस्पताल के कर्मचारी का बेहद असंवेदनशील जवाब सामने आया। उसने साफ लफ्ज़ों में कह दिया कि “चाहे रिपोर्ट समय पर आए या महीनों लेट हो, अगर डॉक्टर को कागज दिखाना है, तो ₹500 का नया पर्चा हर हाल में बनवाना ही पड़ेगा।” यह साफ दर्शाता है कि अस्पताल की शुल्क प्रणाली में पारदर्शिता का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं है और मरीजों को बंधक समझकर उनसे वसूली की जा रही है।
कारोबार बनाम उपचार: स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर उठते गंभीर सवाल
इस पूरे विवाद ने रीवा जिला प्रशासन और क्षेत्रीय स्वास्थ्य विभाग (Health Department) को सीधे सवालों के घेरे में ले लिया है। जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि जिस जिले के जनप्रतिनिधि खुद प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री हों, वहाँ के निजी अस्पतालों में इतनी बड़ी धांधली बिना किसी खौफ के कैसे चल रही है? क्या स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों ने निजी क्लीनिकों और कॉर्पोरेट अस्पतालों को मरीजों को लूटने की खुली छूट दे रखी है?
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने इस पूरे रैकेट की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग तेज कर दी है। मांग की जा रही है कि:
- अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज और बिलिंग रिकॉर्ड को तुरंत जब्त कर जांच की जाए।
- दोषी पाए जाने पर अस्पताल का लाइसेंस तुरंत निलंबित किया जाए।
- निजी अस्पतालों के लिए एक निश्चित और पारदर्शी 'फीस चार्ट' लागू हो, ताकि कोई भी डॉक्टर मरीजों का मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न न कर सके।