"अडानी का प्रोजेक्ट है, FIR करा देंगे!" रीवा में नायब तहसीलदार की धमकी पर नहीं डरा किसान, 4 दिन पानी में भूखा लेटा रहा... देर रात भागे-भागे पहुंचे कलेक्टर!

 

रीवा के गुढ़ में बिना मुआवजा टॉवर लगाने पहुंचे अधिकारी; 4 दिन पानी में भूखे-प्यासे पड़े किसान को रात में मनाने पहुंचे कलेक्टर Rewa News

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) देश में अडानी और अंबानी के प्रभाव तथा सरकारी तंत्र पर उनकी पकड़ को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहती हैं। रीवा जिले के गुढ़ तहसील अंतर्गत आने वाले ग्राम बेला (पोस्ट हर्दी) में इस प्रभाव का एक भयानक उदाहरण देखने को मिला है। सिंगरौली में कोल ब्लॉक हासिल करने और हजारों पेड़ों की कटाई के बाद अब अडानी ग्रुप का रुख रीवा की ओर हुआ है, जहां बिजली पारेषण के लिए हाईटेंशन लाइनें बिछाई जा रही हैं। आरोप है कि अडानी समूह के बिजली प्रोजेक्ट के लिए स्थानीय प्रशासनिक अमला और पुलिस बल किसानों को डरा-धमकाकर बिना कोई मुआवजा दिए और बिना किसी कानूनी सूचना के उनकी कीमती जमीनों पर जबरन बिजली के बड़े-बड़े टॉवर खड़े करवा रहा है। इस पूरी तानाशाही के खिलाफ जब एक किसान युवक ने आवाज उठाई, तो पूरे सरकारी तंत्र ने उसे दबाने की कोशिश की, लेकिन युवक के साहस के आगे आखिरकार प्रशासन को झुकना ही पड़ा।

बिना मुआवजा और सूचना के 16 स्क्वायर मीटर जमीन पर जबरन कब्जे की कोशिश
नियम और कानून के मुताबिक, जब भी किसी निजी भूमि से हाईटेंशन विद्युत लाइन गुजारी जाती है या टॉवर स्थापित किया जाता है, तो संबंधित भू-स्वामी को लिखित सूचना जारी कर उसका पक्ष सुनना और उचित मुआवजा देना अनिवार्य होता है। एक टॉवर लगाने के लिए कम से कम 16 स्क्वायर मीटर जमीन अधिग्रहित होती है, जिसके बाद उस पूरे क्षेत्र की जमीन कृषि या व्यावसायिक उपयोग के लायक नहीं रह जाती और उसकी बाजार कीमत कौड़ियों के भाव हो जाती है। गुढ़ तहसील के ग्राम बेला में अडानी ग्रुप की हाईटेंशन लाइन निकालने के लिए जिला प्रशासन के अधिकारियों ने कंपनी के दबाव में आकर उन लोगों से सहमति पत्र बनवा लिए जिनकी वहां जमीन ही नहीं थी। दूसरों की फर्जी सहमति के आधार पर असली भू-स्वामियों की जमीनों पर जबरन टॉवर लगाने की तैयारी कर ली गई। जब कंपनी के इंजीनियर और मशीनें जमीन खोदने पहुंचे, तब असली किसानों को इस धांधली का पता चला।

नायब तहसीलदार ने दी एफआईआर की धमकी, किसान पर जेसीबी चढ़ाने का प्रयास
ग्राम बेला निवासी पीड़ित किसान देशराज मिश्रा पिता कृष्णकांत मिश्रा को जब अपनी जमीन पर अवैध उत्खनन की जानकारी मिली, तो वे तुरंत मौके पर पहुंचे और काम का विरोध किया। किसान का विरोध देखते ही गुढ़ तहसील की नायब तहसीलदार, तहसीलदार और पुलिस प्रशासन का अमला मौके पर दल-बल के साथ पहुंच गया। पीड़ित किसान देशराज मिश्रा के अनुसार, मौके पर मौजूद नायब तहसीलदार ने रौब झाड़ते हुए उन्हें सीधे तौर पर धमकाया और कहा, "तुम काम क्यों रोक रहे हो? जानते नहीं हो कि यह अडानी का प्रोजेक्ट है? तुरंत एफआईआर करवा देंगे और जेल भेज देंगे।"

प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके पर ही जबरन नोटिस थमाने और किसान के हाथ में नोटिस पकड़ाकर फोटो खींचने का प्रयास किया ताकि कागजी खानापूरी की जा सके। जब किसान ने इस असंवैधानिक रवैये का कड़ा विरोध किया, तो प्रशासन की शह पर जेसीबी चालक ने खोदे गए गड्ढे के पास खड़े युवक को डराने के लिए गाड़ी चढ़ाने की कोशिश की।

4 दिनों तक खोदे गए पानी भरे गड्ढे में भूखे-प्यासे लेटा रहा जांबाज किसान
अधिकारियों की धमकियों और पुलिस के खौफ के बावजूद किसान देशराज मिश्रा अपनी जमीन बचाने के इरादे पर कायम रहे। वे जेसीबी के सामने ही कंपनी द्वारा खोदे गए गड्ढे में लेट गए। भारी बारिश के कारण खेत में खोदे गए उस गड्ढे में पानी भरा हुआ था, लेकिन किसान ने हिम्मत नहीं हारी। देशराज मिश्रा लगातार चार दिनों तक उसी पानी भरे गड्ढे में बिना खाए-पिए अनशन पर बैठे रहे। उनकी मांग थी कि जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता, निष्पक्ष सीमांकन नहीं होता और उचित मुआवजा तय नहीं होता, तब तक वे अपनी जमीन पर एक भी खंभा नहीं गाड़ने देंगे। प्रशासनिक अमले ने चार दिनों तक किसान को प्रताड़ित करने और डराने का प्रयास किया, लेकिन युवक का अनशन जारी रहा।

मऊगंज के पूर्व विधायक सुखेन्द्र सिंह बन्ना पहुंचे समर्थन में, मुख्य विपक्ष गायब
जब अडानी ग्रुप और गुढ़ प्रशासन की इस ज्यादती की खबर मऊगंज के पूर्व कांग्रेस विधायक सुखेन्द्र सिंह बन्ना को लगी, तो वे तुरंत बेला गांव पहुंचे। उन्होंने पानी भरे गड्ढे में लेटे किसान देशराज मिश्रा के साथ बैठकर धरने में हिस्सा लिया और उन्हें पूर्ण समर्थन देने का ऐलान किया। पूर्व विधायक बन्ना ने मौके से ही जिला प्रशासन की इस दमनकारी नीति पर कड़ा प्रहार किया।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान स्थानीय स्तर पर राजनीतिक उदासीनता भी खुलकर सामने आई। सत्ताधारी दल भाजपा का कोई प्रतिनिधि तो दूर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के शहर और ग्रामीण जिलाध्यक्षों ने भी मौके पर पहुंचने या किसान के हक में आवाज उठाने की जहमत तक नहीं उठाई। पूर्व विधायक सुखेन्द्र सिंह बन्ना ने घटनास्थल की पूरी स्थिति का जायजा लेने के बाद सीधे रीवा कलेक्टर को फोन किया और उन्हें पूरी घटना की जानकारी देते हुए तत्काल मौके पर आने को कहा।

शनिवार की देर रात पहुंचे कलेक्टर: विकास की दुहाई देकर रुकवाया काम
पूर्व विधायक की सूचना और किसान के लगातार बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण मामला तूल पकड़ते देख रीवा कलेक्टर शनिवार की देर रात स्वयं प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बेला गांव स्थित घटनास्थल पर पहुंचे। कलेक्टर ने रात के अंधेरे में पानी में बैठे अनशनकारी किसान देशराज मिश्रा से संवाद स्थापित किया।

कलेक्टर ने किसान से कहा, "देश में जब सभी का सहयोग होता है, तभी विकास संभव है। इसमें सरकार, प्राइवेट कंपनियां, उद्यमी और आम नागरिक सभी का योगदान होता है। मुझे यह बात अच्छी लगी कि आप व्यवस्था के भागीदार बनना चाहते हैं, लेकिन सारे काम तरीके से होने चाहिए।"

जब कलेक्टर ने मामले की ऑन-द-स्पॉट जांच की, तो पता चला कि किसी विश्वकर्मा नामक व्यक्ति ने इस जमीन से लाइन ले जाने की फर्जी सहमति दी थी। इसके बाद जब प्रशासन ने सीमांकन का दावा किया, तो दो पोल देशराज की जमीन पर और दो पोल विश्वकर्मा की जमीन पर दर्शाए गए थे। इस पर किसान देशराज ने कलेक्टर के सामने पूरी सच्चाई रखते हुए नक्शा दिखाया कि विश्वकर्मा जी की जमीन घटनास्थल पर है ही नहीं, बल्कि उनकी जमीन यहां से डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित है। फर्जी सीमांकन और गलत सहमति की पोल खुलते ही कलेक्टर ने तत्काल प्रभाव से निर्माण कार्य रुकवाने का आदेश दिया और निष्पक्ष जांच के आश्वासन के बाद किसान का अनशन समाप्त कराया।

रीवा में पूरी तरह से फेल साबित हो रहा सरकारी सिस्टम और प्रशासनिक तानाशाही
गुढ़ तहसील की यह घटना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि रीवा जिले में सरकारी तंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से बेलगाम हो चुकी है। अधिकारी निजी पूंजीपतियों के लाभ के लिए आम जनता और किसानों के अधिकारों को कुचलने में लगे हैं। स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले भी अधिकारियों की इसी मनमानी से नाराज होकर सिरमौर विधायक दिव्यराज सिंह को जवा में अनशन पर बैठना पड़ा था, जहां उन्होंने एसडीएम और सीईओ की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए थे। उस समय भी कलेक्टर को मौके पर पहुंचकर मनाना पड़ा था। अब गुढ़ में अडानी ग्रुप के दबाव में हुई इस घटना ने साबित कर दिया है कि निचले स्तर के अधिकारी पूरी तरह से मनमर्जी पर उतारू हैं और जब मामला मीडिया तथा जनप्रतिनिधियों के दबाव में तूल पकड़ता है, तब उच्च अधिकारी केवल लीपापोती करने के लिए मौके पर पहुंचते हैं।

विवादित आराजी नंबर और भूमि का आधिकारिक विवरण
पीड़ित किसान देशराज मिश्रा पिता कृष्णकांत मिश्रा के अनुसार, उनकी कुल दो बहुमूल्य आराजियां इस प्रोजेक्ट की वजह से प्रभावित हो रही हैं:

  • आराजी नंबर 1162/1/2/6: रकबा 0.5610 हेक्टेयर (ग्राम बेला)
  • आराजी नंबर 1156/2: रकबा 0.1090 हेक्टेयर (ग्राम बेला)

यह पूरी जमीन औद्योगिक क्षेत्र (इंडस्ट्रियल एरिया) के ठीक पास स्थित है, जिसकी वर्तमान बाजार दर करोड़ों रुपये में है। अडानी ग्रुप के अधिकारी इसी कीमती व्यावसायिक जमीन पर बिना किसी पूर्व सूचना, अधिग्रहण प्रक्रिया या मुआवजे के जबरन दो से अधिक खंभे और टॉवर लगाने पर अड़े हुए थे, जिसके कारण यह पूरा भूमि विवाद खड़ा हुआ।