MP हाईकोर्ट में कोहराम: रीवा के युवक ने बैग खोला तो फटी रह गईं सुरक्षाकर्मियों की आँखें, दयाशंकर पांडे ने हिला दी न्याय व्यवस्था की नींव

 
रीवा के युवक ने न्याय के लिए हाईकोर्ट में पेश किया दर्दनाक सबूत, पुलिसिया कार्रवाई न होने पर उठाया खौफनाक कदम।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के गलियारों में सोमवार को एक ऐसी घटना घटी, जिसने सुरक्षाकर्मियों से लेकर कानून के जानकारों तक को झकझोर कर रख दिया। रीवा जिले का एक युवक, जो लंबे समय से खुद पर हो रहे हमलों और पुलिस की उदासीनता से त्रस्त था, अपनी बात को साबित करने के लिए अपनी पत्नी का गर्भपात हुआ भ्रूण एक पॉलीथिन में लपेटकर सीधे अदालत पहुँच गया। यह घटना न केवल न्याय व्यवस्था की देरी को दर्शाती है, बल्कि एक आम आदमी की बेबसी का भी चेहरा पेश करती है।

गेट नंबर-6 पर मची अफरा-तफरी: सुरक्षा जांच में खुलासा 
सोमवार की सुबह जब दयाशंकर पांडे नाम का युवक हाईकोर्ट के गेट नंबर-6 पर पहुँचा, तो रूटीन चेकिंग के दौरान सुरक्षाकर्मियों ने उसके बैग की तलाशी ली। बैग के अंदर एक पॉलीथिन में लिपटा हुआ भ्रूण देखकर सुरक्षाकर्मी दंग रह गए। आनन-फानन में वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया गया और युवक को हिरासत में लेकर सिविल लाइन थाना पुलिस के हवाले कर दिया गया। युवक ने बताया कि वह कोई अपराधी नहीं, बल्कि एक पीड़ित है जो साक्ष्य (Evidence) दिखाने आया था।

सड़क हादसे से मिसकैरेज तक की दुखद कहानी 
दयाशंकर के अनुसार, यह त्रासदी 1 मार्च से शुरू हुई थी। वह अपनी पत्नी के साथ बाइक से जा रहा था, तभी रास्ते में उनके साथ एक भीषण सड़क दुर्घटना हुई। इस हादसे में उसकी गर्भवती पत्नी को गंभीर अंदरूनी चोटें आईं। डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद, 8 मार्च को उसकी पत्नी का गर्भपात (Miscarriage) हो गया। दयाशंकर का दावा है कि यह हादसा महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि उन पर किए गए जानलेवा हमलों की एक कड़ी थी।

राजनीतिक रंजिश और निर्दलीय चुनाव का दंश 
पूछताछ के दौरान दयाशंकर पांडे ने खुलासा किया कि उनकी परेशानियाँ 2024 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बाद शुरू हुईं। उन्होंने इन चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर अपनी किस्मत आजमाई थी। हार के बाद से ही कुछ स्थानीय रसूखदार लोग उनके दुश्मन बन गए। दयाशंकर का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में उन पर और उनके परिवार पर 4 से 5 बार जानलेवा हमले किए जा चुके हैं, जिसका उद्देश्य उन्हें और उनके परिवार को डराना या खत्म करना है।

पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल: आखिर सबूत कहाँ से लाएं? 
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू स्थानीय पुलिस का रवैया है। दयाशंकर ने बताया कि हर हमले के बाद उन्होंने रीवा के बैकुंठपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन पुलिस ने कथित तौर पर यह कहकर मामला टाल दिया कि "पुख्ता सबूत लेकर आओ।" युवक का कहना है कि इसी 'सबूत' की तलाश में वह इतना हताश हो गया कि उसने अपनी पत्नी के मृत भ्रूण को ही साक्ष्य मान लिया और उसे अदालत दिखाने चल पड़ा। उसने आईजी और कमिश्नर से भी गुहार लगाई थी, लेकिन न्याय की उम्मीद केवल हाईकोर्ट से बची थी।

जब थक हारकर मांगी इच्छामृत्यु: राष्ट्रपति को लिखा पत्र 
न्याय न मिलने और लगातार हो रहे हमलों से दयाशंकर पांडे का मानसिक तनाव इस कदर बढ़ गया कि उसने जीवन त्यागने का फैसला कर लिया। उसने भारत के राष्ट्रपति के नाम एक पत्र लिखकर 'इच्छामृत्यु' (Euthanasia) की मांग की है। उसका कहना है कि जब शासन और प्रशासन उसकी सुरक्षा करने में असमर्थ है, तो उसे तिल-तिल कर मरने के बजाय सम्मान के साथ मृत्यु दी जाए।

पुलिस की समझाइश और अंतिम संस्कार 
जबलपुर की सिविल लाइन पुलिस ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दयाशंकर को काउंसलिंग दी। सीएसपी सोनू कर्मी ने बताया कि युवक को समझाया गया कि कानून के समक्ष अपनी बात रखने का यह तरीका सही नहीं है। इसके बाद, युवक की सहमति से करिया पाथर श्मशान घाट में पुलिस की मौजूदगी में भ्रूण का विधि-विधान से अंतिम संस्कार कराया गया। पुलिस ने अब रीवा पुलिस से संपर्क कर मामले की तह तक जाने और पीड़ित को सुरक्षा प्रदान करने का आश्वासन दिया है।

व्यवस्था के लिए एक चेतावनी 
हाईकोर्ट की यह घटना हमारे समाज और पुलिसिंग व्यवस्था के लिए एक बड़ा सबक है। जब एक नागरिक को यह लगने लगे कि उसे न्याय पाने के लिए इतने विचलित करने वाले कदम उठाने पड़ेंगे, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। दयाशंकर पांडे का मामला यह याद दिलाता है कि शिकायतों पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई कितनी आवश्यक है।