रीवा में बड़ा सियासी उलटफेर: 'माननीयों' से ज्यादा कलेक्टर पर जनता को भरोसा, उपमुख्यमंत्री के बंगले पर पसरा सन्नाटा, कलेक्ट्रेट में उमड़ा सैलाब

 
रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के 'ऑन द स्पॉट' फैसलों के आगे डिप्टी सीएम का दरबार पड़ा फीका, नेताओं की जी-हजूरी छोड़ कलेक्ट्रेट पहुंच रही जनता।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। विंध्य की राजधानी कहे जाने वाले रीवा में इन दिनों एक नया प्रशासनिक दौर देखने को मिल रहा है। नवागत कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के कड़े तेवरों और त्वरित न्याय प्रणाली ने रीवा की पूरी व्यवस्था को बदल कर रख दिया है। आलम यह है कि कभी जिन नेताओं और मंत्रियों के बंगलों पर सुबह से ही फरियादियों का तांता लगा रहता था, आज वहां सन्नाटा पसरा हुआ है। हाल ही में जब मध्य प्रदेश के डिप्टी सीएम एक लंबे अंतराल के बाद रीवा में रुके, तो उनके बंगले पर गिनती के लोग ही नजर आए। जनता अब नेताओं के चक्कर काटने के बजाय सीधे जिला कलेक्टर की चौखट पर माथा टेकना ज्यादा बेहतर समझ रही है।

  • ऑन द स्पॉट फैसला: जब जनसुनवाई छोड़ सीधे खेत पहुंच गए कलेक्टर 
  • कलेक्टर सूर्यवंशी की लोकप्रियता की मुख्य वजह क्या है?
  • नेताओं के यहां फाइलें हफ्तों लटकी रहती हैं, लेकिन रीवा के नए कलेक्टर का नियम साफ है—"फैसला ऑन द स्पॉट"। जनता के प्रति उनकी संवेदनशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में देखने को मिला:

जनसुनवाई में आया मामला: कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में एक गरीब आवेदक अपनी जमीन के सीमांकन की गुहार लेकर पहुंचा था, जिसे स्थानीय पटवारी और राजस्व अमला महीनों से भटका रहा था।
सीधे मौके पर पहुंचे साहब: कलेक्टर सूर्यवंशी ने न केवल उसकी बात सुनी, बल्कि तुरंत अधिकारियों की टीम तैयार की और खुद जनसुनवाई बीच में छोड़कर सीधे सेमरिया क्षेत्र के मोहरवा गांव पहुंच गए।
जमीन का तत्काल सीमांकन: मौके पर खड़े होकर पीड़ित को उसकी जमीन का हक दिलाया। जब जनता यह लाइव एक्शन देखती है, तो उसका भरोसा सिस्टम पर मजबूत हो जाता है।

माननीयों के बंगलों से क्यों गायब हो गई जनता? 'चेले-चपाटों' का खेल खत्म 
पहले रीवा की आम जनता के सामने मजबूरी थी कि उन्हें छोटे-छोटे कामों के लिए स्थानीय नेताओं और माननीयों के सामने जी-हजूरी करनी पड़ती थी। लेकिन नेताओं के बंगलों की कड़वी हकीकत यह थी:

  • बिचौलियों और चेलों का राज: माननीयों के बंगलों पर तैनात उनके खास 'चेले-चपाटे' ही असल में जनसुनवाई करते थे। वे गरीब और असहाय लोगों के आवेदनों को साइड में रख देते थे क्योंकि उन्हें पता होता था कि यहां से कोई निजी फायदा (कमीशन) नहीं मिलने वाला।
  • नेताओं के फोन की कोई वैल्यू नहीं: अगर माननीय किसी अधिकारी को फोन पर काम करने की सिफारिश कर भी देते थे, तो नीचे का अमला उसे गंभीरता से नहीं लेता था। जनता महीनों भटकने के बाद भी खाली हाथ रह जाती थी।
  • सिर्फ रसूखदारों की सुनवाई: नेताओं के दरबारों में सिर्फ ठेकेदारों, अधिकारियों, कर्मचारियों या फिर बड़े पहुंच वाले लोगों की ही तुरंत खातिरदारी होती थी। आम गरीब सिर्फ गेट पर खड़ा रह जाता था।

कलेक्ट्रेट में 1000 फरियादी, नेताओं के पास सिर्फ ठेकेदार और कर्मचारी 
कलेक्ट्रेट और डिप्टी सीएम के बंगले से सामने आईं हालिया तस्वीरें पूरी हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं।

कलेक्ट्रेट बना जन-अदालत: पिछले मंगलवार को हुई जनसुनवाई में कलेक्ट्रेट परिसर में पैर रखने तक की जगह नहीं थी। जिलेभर से लगभग 1,000 से अधिक फरियादी अपनी आस लेकर पहुंचे थे, जिनमें से कलेक्टर ने खुद लगभग 600 लोगों की समस्याओं को आमने-सामने सुना और संबंधित विभागों को तत्काल निराकरण के निर्देश दिए।

बंगलों पर सिर्फ सियासी लोग: दूसरी तरफ, माननीयों और डिप्टी सीएम के बंगलों से आम जनता पूरी तरह नदारद रही। वहां अब केवल ट्रांसफर-पोस्टिंग के चक्कर में आए सरकारी कर्मचारी, टेंडर की जुगाड़ में लगे ठेकेदार या फिर केवल अपनी हाजिरी लगाने वाले दलाल ही नजर आते हैं। आम जनता अब केवल कलेक्ट्रेट के 'मंगलवार' का इंतजार करती है।

नगर निगम का अगला निशाना: क्या कमिश्नर अक्षत जैन भी खत्म करेंगे महापौर का जलवा? 
कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के इस प्रचंड प्रशासनिक हंटर के बाद अब रीवा के सियासी गलियारों में एक नया डर सताने लगा है। चर्चा है कि यदि इसी तर्ज पर रीवा नगर निगम के युवा और तेजतर्रार कमिशनर अक्षत जैन ने भी शहर की कमान पूरी तरह अपने हाथ में ले ली, तो रीवा के तथाकथित 'विकास पुरुष' यानी महापौर का जलवा भी पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।

वर्तमान में नगर निगम के भीतर फैली अव्यवस्थाओं, सफाई कर्मियों की मनमानी और निचले स्तर पर चल रही कथित लूट-खसोट के कारण जनता परेशान है और उसे महापौर की चौखट पर जाना पड़ता है। लेकिन, यदि कमिश्नर अक्षत जैन ने खुद वार्डों में उतरकर सीधे जनता से संवाद स्थापित करना और उनकी समस्याओं को हल करना शुरू कर दिया, तो नगर निगम की राजनीति से भी नेताओं का वजूद पूरी तरह साफ होना तय है।