बच्चों के पोषण से खिलवाड़ : सरकारी बच्चों के हक के खाने में लाखों का खेल? मेनू गायब, खाना घटिया; भड़के अभिभावकों ने खोला मोर्चा
ध्रुव नामदेव। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से सरकारी योजनाओं में लापरवाही और बच्चों के हक पर डाका डालने का एक बेहद ही गंभीर और असंवेदनशील मामला सामने आया है। सरकारी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने और उन्हें कुपोषण से बचाने के लिए चलाई जा रही देश की सबसे महत्वाकांक्षी 'मध्यान्ह भोजन योजना' (Mid-Day Meal Scheme) रीवा शहर में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। रीवा नगरीय क्षेत्र के कई शासकीय विद्यालयों से लगातार यह शिकायतें आ रही हैं कि बच्चों को दोपहर का भोजन या तो समय पर नहीं मिल रहा है, या फिर जो भोजन परोसा जा रहा है, उसकी गुणवत्ता इतनी खराब है कि वह खाने योग्य ही नहीं है।
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद स्थानीय नागरिकों, जागरूक अभिभावकों और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। लोगों का स्पष्ट आरोप है कि स्कूलों में भोजन की सप्लाई करने वाली सेंट्रल किचन संस्था नियमों को ताक पर रखकर काम कर रही है।
सेंट्रल किचन की मनमानी पर उठ रहे सवाल: समय पर खाना क्यों नहीं मिल रहा है?
रीवा शहर के सरकारी स्कूलों में केंद्रीकृत रसोई व्यवस्था यानी सेंट्रल किचन (Central Kitchen) के माध्यम से सुबह तैयार भोजन को गाड़ियों के जरिए अलग-अलग स्कूलों तक पहुंचाया जाता है। नियमानुसार, स्कूलों में लंच टाइम (मध्यान्ह अवकाश) शुरू होने से पहले भोजन पहुंच जाना चाहिए, ताकि बच्चे गर्म और ताजा खाना खा सकें। लेकिन धरातल पर हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
सामने आई प्रमुख गड़बड़ियां:
- समय की पाबंदी नहीं: कई स्कूलों में जब लंच का समय खत्म हो जाता है, तब सेंट्रल किचन की गाड़ियां भोजन लेकर पहुंचती हैं। ऐसे में बच्चे या तो भूखे पेट रहने को मजबूर हैं या फिर अपने घर से लाए सूखे नाश्ते पर निर्भर हैं।
- निर्धारित मेनू का उल्लंघन: शासन द्वारा सप्ताह के छह दिनों के लिए एक विशेष और पौष्टिक मेनू तय किया गया है, जिसमें खीर-पूरी, सब्जी-रोटी, दाल-चावल और पौष्टिक सलाद शामिल है। लेकिन शिकायतकर्ताओं के अनुसार, सेंट्रल किचन अपनी मर्जी से रोज एक जैसा घटिया भोजन भेज रहा है।
- मात्रा और गुणवत्ता में कमी: भोजन की मात्रा बच्चों की संख्या के अनुपात में बेहद कम होती है। पतली दाल और अधपके चावल के कारण बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है।
करोड़ों का बजट और भूखे बच्चे: मध्य प्रदेश पोषण आहार योजना का बजट कितना है?
भारत सरकार और मध्य प्रदेश शासन मिलकर हर साल प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं के बच्चों के लिए करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत करते हैं। इस योजना का मुख्य उद्देश्य यह है कि गरीब परिवारों से आने वाले बच्चे कुपोषण का शिकार न हों और भोजन के आकर्षण में वे नियमित रूप से स्कूल आएं। लेकिन रीवा में चल रहे इस ढर्रे को देखकर लगता है कि योजना का असली लाभ बच्चों को मिलने के बजाय बिचौलियों और जिम्मेदार ठेकेदारों की जेब में जा रहा है।
अभिभावकों का कहना है कि जब सरकार हर बच्चे के मान से पर्याप्त राशि और खाद्यान्न उपलब्ध करा रही है, तो फिर सेंट्रल किचन संचालक बच्चों के भोजन में कटौती क्यों कर रहे हैं? क्या इन ठेकेदारों को स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों का मूक संरक्षण प्राप्त है? यह एक बड़ा अनुत्तरित सवाल बना हुआ है।
लाखों के भ्रष्टाचार की आशंका: अभिभावकों और जनप्रतिनिधियों का आक्रोश क्यों फूट रहा है?
इस गंभीर लापरवाही को लेकर अब रीवा के स्थानीय जनप्रतिनिधि और वार्ड पार्षद भी मुखर हो गए हैं। शिकायतकर्ताओं ने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि सेंट्रल किचन के संचालन और कागजी रिकॉर्ड में बहुत बड़ा घालमेल चल रहा है।
"स्कूलों में दर्ज बच्चों की संख्या और वास्तव में भोजन पाने वाले बच्चों की संख्या में भारी अंतर है। सेंट्रल किचन के संचालक कागजों पर शत-प्रतिशत बच्चों की उपस्थिति दिखाकर हर महीने शासन से लाखों रुपये के वित्तीय बजट का आहरण कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर एक बड़ा वित्तीय घोटाला है।" अभिभावकों का कहना है कि यदि औचक निरीक्षण किया जाए, तो भोजन वितरण की गाड़ियों के लॉग-बुक, भोजन पकाने के समय और स्कूलों में पहुंचने के समय के बीच के फर्जीवाड़े का आसानी से भंडाफोड़ हो सकता है।
अधिकारियों की चुप्पी और रीवा जिला प्रशासन से उच्चस्तरीय जांच की मांग कैसे की जाए?
मामला उजागर होने के बाद अब गेंद जिला प्रशासन और स्कूल शिक्षा विभाग के पाले में है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों ने रीवा जिला प्रशासन, जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) और मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) जिला पंचायत से इस पूरे रैकेट की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
जांच के लिए उठाए जाने वाले आवश्यक कदम:
- सेंट्रल किचन का औचक निरीक्षण: अधिकारी बिना किसी पूर्व सूचना के तड़के सुबह सेंट्रल किचन के गोदाम और रसोई की साफ-सफाई और कच्चे माल की गुणवत्ता की जांच करें।
- वित्तीय ऑडिट: संस्था को पिछले कुछ महीनों में जारी किए गए बजट और उनके द्वारा वास्तव में किए गए राशन खर्च का मिलान चार्टर्ड अकाउंटेंट से कराया जाए।
- गोपनीय फीडबैक: स्कूलों के प्राचार्यों और शिक्षकों से बिना किसी दबाव के लिखित में रिपोर्ट ली जाए कि उनके स्कूल में भोजन कितने बजे और किस स्थिति में पहुंचता है।
नागरिकों का कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष होती है, तो कई सफेदपोश और ठेकेदार इस घोटाले की जद में आएंगे।
मध्यान्ह भोजन योजना के नियम: क्या कहता है सरकारी मैन्युअल?
केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, मध्यान्ह भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि यह बच्चों के अधिकार से जुड़ा मामला है।
कक्षा समूह कैलोरी की मात्रा प्रोटीन की मात्रा
प्राथमिक (कक्षा 1 से 5) न्यूनतम 450 कैलोरी 12 ग्राम प्रोटीन
माध्यमिक (कक्षा 6 से 8) न्यूनतम 700 कैलोरी 20 ग्राम प्रोटीन
इसके साथ ही, भोजन पकाने वाले स्थान पर पूरी तरह से स्वच्छता होनी चाहिए और भोजन का वितरण हर हाल में स्कूल के निर्धारित हाफ-टाइम के भीतर ही सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है। रीवा में जिस तरह इन नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, वह सीधे तौर पर बाल अधिकारों का हनन है।
पारदर्शी व्यवस्था और सख्त कार्रवाई की जरूरत
रीवा शहर में मध्यान्ह भोजन योजना के तहत सामने आई यह अव्यवस्था बेहद चिंताजनक है। बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और उनके पोषण के साथ ऐसा खिलवाड़ किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि रीवा जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या सेंट्रल किचन के रसूखदार संचालकों के खिलाफ कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई होगी, या फिर हमेशा की तरह मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? रीवा के लाखों अभिभावकों की नजरें अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं।