नतीजों का दूसरा नाम ‘राजेंद्र शुक्ल’: क्यों विन्ध्य की जनता उन्हें ही कहती है अपना ‘विकास पुरुष’?

 

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) रीवा। राजनीति में दावे बहुत होते हैं, लेकिन प्रमाण कम। विन्ध्य की धरती ने दशकों तक आश्वासन की राजनीति देखी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस माटी ने वह बदलाव देखा जिसे लोग 'असम्भव' कहते थे। आज जब विन्ध्य की जनता अपने हक और विकास का हिसाब मांगती है, तो पन्नों पर केवल एक ही नाम उभरकर आता है—मध्य प्रदेश शासन के यशस्वी उपमुख्यमंत्री एवं रीवा विधायक श्री राजेंद्र शुक्ल।

बयानबाज़ी बनाम ज़मीनी हकीकत
आज जो विरोधी केवल शोर मचाकर जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं, उनसे एक ही सवाल है—जब आपको मौका मिला था, तब रीवा के लिए क्या किया? श्री राजेंद्र शुक्ल ने कभी पलटवार की राजनीति नहीं की, बल्कि उन्होंने 'काम' से जवाब दिया। उन्होंने रीवा को सिर्फ आश्वासन नहीं दिए, बल्कि ऐसे रिकॉर्ड तोड़ विकास कार्य दिए जिसने रीवा का इतिहास और भूगोल दोनों बदल दिए।

विकास की वो गाथा, जिसने रीवा को बनाया 'स्मार्ट सिटी'
राजेंद्र शुक्ल का नेतृत्व भाषणों से नहीं, बल्कि इन बड़े परिणामों से पहचाना जाता है:
 

  • गुढ़ सौर ऊर्जा परियोजना: विश्व की सबसे बड़ी सौर परियोजनाओं में से एक, जिसने रीवा को अंतरराष्ट्रीय नक्शे पर पहचान दिलाई।
  • मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी: विश्व के पहले सफेद बाघ की जन्मस्थली को उसका सम्मान दिलाया और पर्यटन का वैश्विक केंद्र बनाया।
  • किसानों की खुशहाली: नहरों का ऐसा जाल बिछाया कि आज अंतिम छोर के खेत तक पानी पहुँच रहा है, जिससे किसानों की आमदनी दोगुनी हुई है।
  • कनेक्टिविटी की क्रांति: रीवा से मुंबई की सीधी रेल सेवा हो या रीवा-भोपाल, रीवा-इंदौर और रीवा-दिल्ली की हवाई सेवा—जो कभी सपना था, आज वह रीवावासियों की दिनचर्या का हिस्सा है।
  • स्वास्थ्य का कवच: सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के निर्माण ने रीवा को मेडिकल हब बना दिया। अब गंभीर इलाज के लिए नागपुर या दिल्ली की दौड़ नहीं लगानी पड़ती।
  • बुनियादी ढांचा: शहर को जाम मुक्त करने वाले चारों ओर फ्लाईओवर, आधुनिक कलेक्टर भवन और अत्याधुनिक न्यायालय भवन—ये इमारतें शुक्ल जी की दूरगामी सोच का प्रतीक हैं।

विरोधियों के पास तर्क नहीं, सिर्फ शोर है
विरोधी आज इसलिए परेशान हैं क्योंकि उनके पास दिखाने को एक भी ऐसी उपलब्धि नहीं है जो इन विकास कार्यों के सामने टिक सके। जनता जानती है कि जब राजेंद्र शुक्ल ने कमान संभाली, तभी विन्ध्य ने विकास की रफ़्तार पकड़ी। उनका सरल स्वभाव, आमजन से सीधा जुड़ाव और “पहले काम, बाद में नाम” वाली कार्यशैली ही उन्हें भीड़ से अलग करती है।

निष्कर्ष: नेता नहीं, विकास पुरुष चाहिए
रीवा की जनता का संदेश बिल्कुल साफ़ और स्पष्ट है—हमें पीछे ले जाने वाले नहीं, भविष्य संवारने वाले चाहिए। हमें खोखले नारे नहीं, ठोस नतीजे चाहिए। और रीवा के लिए नतीजों का पर्याय बन चुके हैं राजेंद्र शुक्ल। इसीलिए आज विन्ध्य की गलियों से लेकर चौराहों तक एक ही गूँज है:

"विन्ध्य का सम्मान, राजेंद्र शुक्ल का काम।"

प्रस्तुति: ग्राउंड रिपोर्ट — रीवा न्यूज़ मीडिया दैनिक समाचार पत्र, रीवा