जनता से धोखा! करोड़ों की जमीन पर बना पार्क, अब सिर्फ 'अमीरों' के लिए? रीवा के अटल पार्क पर लगा 'एंट्री फीस' का ताला

 
करोड़ों की जमीन पर बना 10 एकड़ का अटल पार्क अब जनता के लिए नहीं रहा 'फ्री', नगर निगम ने निजी हाथों में सौंपा, टेंडर प्रक्रिया शुरू

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) रीवा के लोगों को करोड़ों की जमीन पर बने 10 एकड़ के अटल पार्क का सपना दिखाया गया था। सिविल लाइन में सरकारी बंगलों को तोड़कर इस पार्क का निर्माण पुर्नघनत्वीकरण योजना के तहत किया गया था, ताकि शहरवासियों को परिवार के साथ घूमने-फिरने के लिए एक अच्छी जगह मिल सके। पार्क बनने के बाद शुरुआती दिनों में तो इसे जनता के लिए निःशुल्क रखा गया, लेकिन अब नगर निगम और जनप्रतिनिधियों ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं। इस पार्क में घूमने के लिए अब जनता को पैसे चुकाने होंगे। यह फैसला जनता के साथ एक बड़ा धोखा है, क्योंकि एक सार्वजनिक संपत्ति को अब व्यावसायिक रूप दिया जा रहा है।

नगर निगम के 15वें सम्मिलन में इस पार्क को निजी हाथों में सौंपने का प्रस्ताव रखा गया, जिसे जनप्रतिनिधियों ने भी हरी झंडी दिखा दी। हैरान करने वाली बात यह है कि हैंडओवर से पहले ही नगर निगम ने टेंडर प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि इस पूरे खेल की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी।

टेंडर की शर्तें: क्या बड़े ठेकेदारों को ही मिलेगा फायदा?
अटल पार्क के संचालन के लिए जो टेंडर निकाला गया है, उसकी शर्तें भी सवालों के घेरे में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, टेंडर की शर्तें इतनी कठिन रखी गई हैं कि रीवा के छोटे ठेकेदार या बेरोजगार युवा इसमें भाग नहीं ले पाएंगे। ऐसा माना जा रहा है कि यह टेंडर भी किसी बाहरी और बड़े ठेकेदार को ही दिया जाएगा, जैसा कि पहले भी शहर में कई परियोजनाओं में देखा गया है।

शहर का ऑडिटोरियम पहले ही एक बड़े समूह, समदड़िया को दिया जा चुका है, और अब अटकलें लगाई जा रही हैं कि अटल पार्क का संचालन भी उसी समूह को सौंपा जा सकता है, जिसने इसका निर्माण किया था। अगर ऐसा होता है, तो यह रीवा के नागरिकों के लिए और भी निराशाजनक होगा, क्योंकि एक सार्वजनिक स्थान पर उनका अधिकार सीमित हो जाएगा।

जनप्रतिनिधियों और नगर निगम पर उठे सवाल
इस फैसले के बाद नगर निगम के पार्षदों और जनप्रतिनिधियों पर जनता को ठगने का आरोप लग रहा है। जनता ने एक बड़े पार्क का सपना देखा था, जिसे अब सिर्फ बाहर से ही देखा जा सकता है। यह फैसला दर्शाता है कि जनप्रतिनिधि जनता के हितों की जगह निजीकरण और व्यावसायिक लाभ को प्राथमिकता दे रहे हैं।

करोड़ों रुपए की सरकारी जमीन पर बना पार्क, जो जनता के पैसे से बना है, अब उन्हीं से पैसे वसूलने का जरिया बन रहा है। यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करती है। जनता को यह उम्मीद थी कि शहर का विकास होगा, लेकिन ऐसा लगता है कि यह विकास कुछ लोगों की जेब भरने का जरिया बन गया है।

निष्कर्ष: क्या जनता का अधिकार छिन गया?
अटल पार्क का निजीकरण एक गंभीर मुद्दा है। एक तरफ जहां सरकार सार्वजनिक सुविधाओं को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर रीवा में एक बड़ा पार्क निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा, खासकर उन परिवारों पर जो कम बजट में बच्चों के साथ घूमने की जगह तलाशते हैं।

इस फैसले से यह भी पता चलता है कि शहर में सार्वजनिक स्थानों का रखरखाव और प्रबंधन कितना कमजोर है, कि उन्हें निजी हाथों में सौंपना पड़ता है। उम्मीद है कि जनता के दबाव और मीडिया के ध्यान के बाद इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाएगा और अटल पार्क को जनता के लिए निःशुल्क रखा जाएगा।