Welcome to Corex City : ब्राउन शुगर, गांजा और अब 'जहरीली चाय': रीवा को श्मशान बनाने की तैयारी में नशा माफिया

 
फ्रेंचाइजी लेकर नियमों की धज्जियां उड़ा रहे चाय वाले। डिस्पोजल गिलास और अवैध सिगरेट की बिक्री से रीवा बन रहा कैंसर और नशे का अड्डा।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। सफ़ेद चादर ओढ़े रीवा शहर आज महानगर बनने की होड़ में है। फ्लाईओवर बन रहे हैं, सड़कें चौड़ी हो रही हैं, लेकिन इन्ही सड़कों के किनारे बसे चाय के होटलों और ढाबों पर मौत का सामान सरेआम बिक रहा है। रीवा के अस्पताल चौराहा, सिरमौर चौराहा, और कॉलेज चौराहा जैसे मुख्य इलाकों में चाय के लिए जिन डिस्पोजल गिलासों का इस्तेमाल हो रहा है, वे सीधे तौर पर कैंसर को दावत दे रहे हैं। प्रशासन की आँखों के सामने ये 'सफेद जहर' हर दिन हजारों लोगों के शरीर में घुल रहा है।

कलेक्टर साहब! क्या रीवा को 'कैंसर कैपिटल' बनाना है? 
जिला प्रशासन और रीवा कलेक्टर विकास के दावों में मशगूल हैं, लेकिन शहर की बुनियादी स्वास्थ्य सुरक्षा भगवान भरोसे है। नगर निगम की 'स्वच्छता की रेंकिंग' सिर्फ कागजों और विज्ञापनों तक सीमित है। हकीकत देखनी हो तो शहर की कचरा गाड़ियों में पड़े लाखों की संख्या में ये प्लास्टिक और वैक्स कोटेड कप देखिए। कलेक्टर और जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या वे किसी बड़े स्वास्थ्य संकट का इंतजार कर रहे हैं?

मेडिकल रिपोर्ट: खौलती चाय और पिघलता प्लास्टिक 
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि जब इन डिस्पोजल गिलासों (विशेषकर प्लास्टिक या वैक्स कोटेड पेपर कप) में 90 डिग्री से ज्यादा गर्म चाय डाली जाती है, तो इसमें मौजूद 'माइक्रो-प्लास्टिक' और 'बिसफेनॉल-ए' (BPA) जैसे घातक रसायन चाय में मिलकर सीधे पेट में जाते हैं।

  • ये रसायन आंतों में अल्सर और कैंसर पैदा करते हैं।
  • पुरुषों में नपुंसकता और महिलाओं में हार्मोनल गड़बड़ी का मुख्य कारण बन रहे हैं।
  • रीवा के संजय गांधी अस्पताल में बढ़ते कैंसर के मरीजों की संख्या कहीं न कहीं इसी लापरवाही का नतीजा है।

कहाँ सो रहा है खाद्य सुरक्षा विभाग? 
रीवा जिले का खाद्य सुरक्षा विभाग (Food Safety Department) केवल त्यौहारों पर सैम्पलिंग का नाटक करता है। विभाग के पास शायद इतना समय नहीं है कि वे चाय दुकानों पर जाकर इन प्रतिबंधित गिलासों की जांच कर सकें। नियम कहते हैं कि खाद्य पदार्थों के लिए इस तरह के कप का उपयोग FSSAI के मानकों के विरुद्ध है और इसके लिए भारी जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन रीवा में नियम सिर्फ किताबों में बंद हैं, धरातल पर तो सिर्फ लापरवाही का राज है।

रीवा नगर निगम और प्रदूषण बोर्ड की 'मिलीभगत' या लाचारी?
नगर निगम रीवा बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाकर जनता को स्वच्छता का पाठ पढ़ाता है, लेकिन इन प्लास्टिक कपों से होने वाले प्रदूषण और बीमारियों पर लगाम लगाने में पूरी तरह विफल रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी भी मूकदर्शक बने हुए हैं। शहर की नालियां इन्हीं कपों से चोक हो रही हैं और जमीन बंजर हो रही है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल 'शून्य' है।

नगर निगम का ढोंग: 4 दिन की चांदनी, फिर वही अंधेरी रात 
रीवा नगर निगम का अभियान किसी 'मजाक' से कम नहीं है। बीच-बीच में साहब लोग एसी गाड़ियों से उतरकर पन्नी और डिस्पोजल गिलासों के खिलाफ दिखावे की कार्रवाई करते हैं, जो महज 4 दिन का नाटक साबित होता है। 4 दिन की 'चांदनी' बिखेरकर ये अधिकारी वापस अपने ठंडे दफ्तरों में दुबक जाते हैं। यही कारण है कि आज रीवा ही नहीं, बल्कि पूरा देश पिछड़ा है, क्योंकि नीतियां सिर्फ फाइलों में बनती हैं, जमीन पर तो सिर्फ 'वसूली' का खेल चलता है। 

महीने में एक बार साहब लोग फोटो खिंचवाने निकलते हैं, छोटे रेहड़ी वालों का चालान काटते हैं, लेकिन इन बड़े 'चाय के शोरूम्स' के पास जाने की हिम्मत इनकी भी नहीं होती। क्यों? क्योंकि यहाँ 'महीना' बंधा होता है। अधिकारी एसी ऑफिस और एसी गाड़ियों से बाहर तभी निकलते हैं जब उन्हें पब्लिसिटी चाहिए होती है। हकीकत देखने के बजाय, ये भ्रष्ट कारिंदे चाय-पान और रिश्वत की 'पैटिंग' (सेटिंग) करके लौट जाते हैं।

नाम बड़े और दर्शन खोटे: अमृततुल्य, मनोहर और प्रेम प्याली का 'जहरीला' खेल 
रीवा शहर में अमृततुल्य, मनोहर, केटली, प्रेम प्याली जैसे न जाने कितने बड़े-बड़े नाम हैं जो शान से अपनी दुकानें चला रहे हैं। लेकिन क्या आपने गौर किया है? ये नामी ब्रांड्स सरेआम नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए प्लास्टिक और वैक्स कोटेड डिस्पोजल गिलासों में चाय परोस रहे हैं। चंद रुपयों के मुनाफे के लिए ये दुकानदार रीवा की जनता को 'कैंसर' परोस रहे हैं। आखिर इन पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या प्रशासन का संरक्षण इन्हें प्राप्त है या फिर जांच करने वाले अधिकारी चाय-पान और गुटखे की रिश्वत लेकर लौट जाते हैं? 

रीवा शहर में अमृततुल्य, मनोहर, केतली, और प्रेम प्याली जैसे ब्रांड्स ने पैर पसारे हैं। लोग नाम देखकर खिंचे चले जाते हैं, लेकिन इन दुकानों के पीछे का सच डरावना है। ये बड़े आउटलेट्स सरेआम प्लास्टिक और वैक्स कोटेड डिस्पोजल गिलासों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नियम कहता है कि खौलती चाय प्लास्टिक के संपर्क में आते ही 'कार्सिनोजेनिक' (कैंसर पैदा करने वाली) हो जाती है। चंद रुपयों की बचत के लिए ये करोड़ों का टर्नओवर करने वाले ब्रांड्स रीवा की जनता की किडनी और फेफड़े सड़ा रहे हैं।

फ्रेंचाइजी के नाम पर सिगरेट का 'अवैध' धंधा: क्या यही नियम है? 
हद तो तब हो जाती है जब ये 'चाय के आउटलेट्स' सिगरेट के अड्डे बन जाते हैं। COPTA (कोटपा) एक्ट के नियमों के अनुसार, सार्वजनिक खाद्य प्रतिष्ठानों में तंबाकू उत्पादों की बिक्री के सख्त नियम हैं। लेकिन रीवा में फ्रेंचाइजी के नाम पर ये आउटलेट्स युवाओं को सिगरेट और लाइटर थमा रहे हैं। चाय की चुस्की के साथ युवाओं को निकोटीन के जाल में फंसाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या इन ब्रांड्स के पास सिगरेट बेचने का लाइसेंस है? या 'फ्रेंचाइजी' का मतलब नियमों से ऊपर होना है?

एसी गाड़ियों का मोह और जमीन पर 'लचर' व्यवस्था 
रीवा शहर की व्यवस्था पूरी तरह से लचर हो चुकी है। जिम्मेदार अधिकारी कभी जमीन पर हकीकत देखने नहीं निकलते। वे एसी ऑफिस में बैठकर आदेश टाइप करते हैं और उनके अधीनस्थ कर्मचारी मैदान में जाकर सिर्फ 'पैटिंग' (सेटिंग) का काम करते हैं। जब तक अधिकारी अपनी एसी गाड़ियों से उतरकर गली-कूचों में नहीं घूमेंगे, तब तक रीवा की सूरत नहीं बदलेगी। हकीकत तो यह है कि जांच के नाम पर जाने वाले लोग चाय-पान खाकर और जेब गरम करके मामले को रफा-दफा कर देते हैं।

स्कूल-कॉलेज के 100 मीटर में 'मौत' का बाजार: कहाँ है पुलिस? 
नियमों के मुताबिक शिक्षण संस्थानों के 100 मीटर के दायरे में नशा वर्जित है, लेकिन रीवा में हकीकत इसके उलट है। स्कूल-कॉलेज के ठीक बाहर कोरेक्स (Corex), गांजा, ब्राउन शुगर, कोकीन, चरस और सुट्टा सरेआम मिल रहा है। रीवा की युवा पीढ़ी नशे की गर्त में जा रही है। सवाल यह है कि क्या पुलिस को यह नहीं दिखता? या फिर 'कोरेक्स सिटी' के इस कलंक को मिटाने की इच्छाशक्ति ही मर चुकी है?

आखिर कब होगी कड़ी कार्रवाई? जनता पूछती है सवाल! 
आज रीवा की हालत यह है कि यहाँ कानून का डर खत्म हो चुका है। चाय की दुकान हो या नशे का अड्डा, सब कुछ खुलेआम चल रहा है। क्या कलेक्टर साहब और एसपी साहब कभी भेष बदलकर इन इलाकों का दौरा करेंगे? क्या कभी उन बड़े चाय विक्रेताओं पर ताला लगेगा जो लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं? रीवा की जनता अब जवाब चाहती है।

अब जागने का समय है
अगर रीवा के जागरूक नागरिक आज आवाज़ नहीं उठाएंगे, तो आने वाली नस्लें हमें माफ नहीं करेंगी। विकास तब तक अधूरा है जब तक नागरिक स्वस्थ न हों। कलेक्टर रीवा को तत्काल प्रभाव से पूरे जिले में इन घातक गिलासों के निर्माण, भंडारण और उपयोग पर प्रतिबंध लगाकर कड़े दंड का प्रावधान करना चाहिए।