रीवा में सिस्टम की 'मजबूरी': सरेआम जलील हुई कुर्सी, पर 'सियासी फोन' ने बदल दी FIR की कहानी

 
रीवा में महिला कलेक्टर के अपमान के बाद भी नामजद FIR नहीं! राजनीतिक दबाव में 'अज्ञात' हुए आरोपी। प्रशासनिक अधिकारियों ने खुद को महसूस किया ठगा।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा में सोमवार को जो हुआ, उसने न केवल प्रशासनिक गरिमा को तार-तार किया, बल्कि देर शाम हुए घटनाक्रम ने व्यवस्था की रीढ़ पर भी सवाल खड़े कर दिए। यूजीसी नियमों के नाम पर हुए हुड़दंग में जब महिला कलेक्टर के प्रति अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल हुआ और एक बेजुबान कुत्ते के जरिए प्रशासन को 'जलील' किया गया, तो लगा था कि कानून अपना काम करेगा। लेकिन, जैसे ही कार्रवाई की बारी आई, एक "अदृश्य शक्ति" का फोन कॉल पूरे मामले की दिशा मोड़ ले गया।

नामजद से 'अज्ञात' तक: कैसे बदल गई FIR की इबारत?
सूत्रों और चश्मदीदों के अनुसार, सोमवार देर शाम एसडीएम हुजूर, तहसीलदार और नायब तहसीलदार पूरी तैयारी के साथ सिविल लाइन थाने पहुंचे थे। उनके हाथ में उन 28 मुख्य प्रदर्शनकारियों की सूची थी, जिन्होंने सड़क जाम की अगुवाई की और अभद्र नारेबाजी की थी।

  • तैयारी: नामजद एफआईआर दर्ज करने के लिए कलम उठाई ही गई थी।
  • मोड़: अचानक एक 'बड़े नेता' का फोन आया और थाने के भीतर का माहौल बदल गया।
  • नतीजा: जिन 28 चेहरों को पुलिस और प्रशासन पहचान चुका था, उन्हें अचानक "अज्ञात" (Unknown) की श्रेणी में डाल दिया गया। कागजी खानापूर्ति कर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की गई।

खाकी और खादी के बीच फंसा प्रशासनिक जमीर 
यह दृश्य विचलित करने वाला था कि जिस प्रशासन को सरेआम 'कुत्ता' कहा गया, वही प्रशासन रात होते-होते अपने अपमान को पीने पर मजबूर हो गया। थाने पहुंचे आला अधिकारी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। एक तरफ वर्दी का गौरव था और दूसरी तरफ ऊपर से आया आदेश। अंततः, प्रशासनिक स्वाभिमान हार गया और सत्ता का रसूख जीत गया।

तीन घंटे का तांडव और बेबस शहर: जनता के सवाल 
जब शहर की मुखिया सुरक्षित नहीं हैं और उनके सम्मान की रक्षा के लिए कानून 'राजनीतिक कॉल' का इंतजार करता है, तो आम जनता की सुरक्षा का क्या?

  • अराजकता: मुख्य मार्ग और पुराने एनएच मार्ग पर 3 घंटे तक एम्बुलेंस और स्कूल बसें फंसी रहीं।
  • अपमान: कलेक्टर को लेकर जो शब्द उपयोग किए गए, वे किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक हैं।
  • सवाल: क्या रीवा में अब कानून केवल आम आदमी के लिए है? क्या रसूखदार संगठनों के लिए नियम बदल जाते हैं?

अधिकारियों की चुप्पी: क्यों बोलने से बच रहा है प्रशासन? 
मंगलवार सुबह जब मीडिया ने एफआईआर के बारे में सवाल पूछे, तो अधिकारियों के पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था। जो अधिकारी कल तक 'कड़ी कार्रवाई' की हुंकार भर रहे थे, वे अब केवल "बैठक और समीक्षा" की बात कर रहे हैं। पुलिस और प्रशासन ने अधिकारिक रूप से एफआईआर की कॉपी साझा करने या आरोपियों के नाम बताने से पूरी तरह परहेज किया है।

रसूखदारों के आगे नतमस्तक हुआ तंत्र?
रीवा के इतिहास में यह पहली बार देखा गया कि जिला प्रशासन ने इतना अपमान सहने के बाद भी आरोपियों को अभयदान दे दिया। अज्ञात पर मामला दर्ज करना केवल एक औपचारिकता है, जो अक्सर ठंडे बस्ते में चली जाती है। यह घटना साबित करती है कि जब वोट बैंक और राजनीति की बात आती है, तो 'प्रोटोकॉल' और 'स्वाभिमान' जैसे शब्द बेमानी हो जाते हैं।