न्याय के मंदिर में 'गाली-गलौज' और जान का खतरा, रीवा के वकीलों में छिड़ा महासंग्राम, थाने पहुंची चैंबर की जंग

 

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा जिला न्यायालय, जिसे न्याय का मंदिर कहा जाता है, आज वकीलों के आपसी विवाद और भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के कारण सुर्खियों में है। नवीन न्यायालय भवन में चैंबर आवंटन की प्रक्रिया ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया है, जो अब सिविल लाइन थाने की दहलीज तक पहुंच गया है। एक तरफ वरिष्ठ अधिवक्ता शारदा सिंह चौहान हैं, जिन्होंने अपनी जान को खतरा बताया है, तो दूसरी तरफ अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष राजेंद्र पांडे हैं, जो इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर रहे हैं।

₹2.5 लाख की वसूली: क्या चैंबर आवंटन में हो रहा है भ्रष्टाचार? 
विवाद की सबसे मुख्य कड़ी है 'चैंबर आवंटन में भ्रष्टाचार'। आरोप लगाया गया है कि नए कोर्ट परिसर में जगह देने के नाम पर वकीलों से ₹2.5 लाख तक की मांग की जा रही है। सीनियर वकीलों का दावा है कि नियमों और वरिष्ठता (Seniority) को दरकिनार कर उन लोगों को चैंबर दिए जा रहे हैं, जो संघ के करीब हैं या जो मोटी रकम दे रहे हैं। इसी 'चैंबर घोटाले' के आरोपों ने पूरे संघ के भीतर दो फाड़ कर दिए हैं।

शारदा सिंह चौहान का सनसनीखेज आरोप: "मुझे जान से मारने की धमकी मिली"
30 वर्षों से वकालत कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता शारदा सिंह चौहान ने पुलिस को दी गई शिकायत में बेहद गंभीर दावे किए हैं। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने चैंबर आवंटन में हो रही धांधली के खिलाफ आवाज उठाई, तो अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष राजेंद्र पांडे ने उनके साथ न केवल गाली-गलौज की, बल्कि उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी। शारदा सिंह के अनुसार, एक महिला वकील के साथ इस तरह का व्यवहार शर्मनाक है और यह उनकी आवाज को दबाने की कोशिश है।

राजेंद्र पांडे की सफाई: "मैं तो न्यायाधीशों के साथ बैठक में था" 
वहीं, अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष राजेंद्र पांडे ने इन आरोपों को पूरी तरह काल्पनिक बताया है। उनका कहना है कि जिस समय और स्थान पर गाली-गलौज और धमकी की बात कही जा रही है, उस समय वे न्यायालय परिसर में माननीय न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों के साथ एक आधिकारिक बैठक में व्यस्त थे। पांडे का कहना है कि शारदा सिंह लंबे समय से सोशल मीडिया पर न्यायालय और संघ के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट कर रही थीं, जिसके कारण उन्हें अनुशासनहीनता का नोटिस जारी किया गया है। इसी से नाराज होकर उन्होंने ये झूठे आरोप लगाए हैं।

अनुशासनहीनता का नोटिस और हाई कोर्ट का दखल 
चैंबर आवंटन का यह विवाद इतना बढ़ा कि मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट तक पहुंच गया। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती जाए और वरिष्ठता सूची का पालन हो। इसके बावजूद, संघ के भीतर खींचतान कम नहीं हुई। अध्यक्ष का कहना है कि संघ के पास साक्ष्य हैं कि भ्रष्टाचार के आरोप केवल दबाव बनाने के लिए लगाए जा रहे हैं, जबकि विरोधियों का कहना है कि नोटिस देना केवल सच बोलने वालों का मुंह बंद करने का तरीका है।

न्यायालय की गरिमा और सुरक्षा पर उठते सवाल 
जब कानून के रखवाले ही आपस में भिड़ जाएं और थाने में शिकायतें होने लगें, तो आम जनता का भरोसा डगमगाना लाजमी है। रीवा कोर्ट में मची इस रार ने यह साफ कर दिया है कि चैंबर का मुद्दा अब केवल पेशेवर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और राजनीतिक रंग ले चुका है। वकीलों के बीच अविश्वास की यह खाई रीवा के न्यायिक इतिहास में एक काला अध्याय लिख रही है।

पारदर्शिता ही एकमात्र समाधान 
रीवा जिला न्यायालय में उपजा यह विवाद तभी शांत हो सकता है जब चैंबर आवंटन की प्रक्रिया पूरी तरह से सार्वजनिक और पारदर्शी हो। भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और किसी भी सीनियर वकील के साथ बदसलूकी की घटना की पुलिस को गहराई से तफ्तीश करनी चाहिए। अगर आज न्याय के परिसर में ही वकील सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, तो वे समाज को क्या न्याय दिला पाएंगे?