रीवा गौशाला घोटाला: डभौरा में बिना बने बह गए ₹20 लाख, EOW की FIR से हड़कंप

 

मध्य प्रदेश के रीवा जिले के डभौरा में सरकारी तंत्र और ठेकेदारों की जुगलबंदी ने बेजुबान गायों के नाम पर स्वीकृत बजट में ही सेंध लगा दी। नगर परिषद डभौरा की यूनिट-3 में 37.85 लाख रुपए की लागत से बनने वाली गौशाला के निर्माण में भारी हेराफेरी का मामला सामने आया है। पारदर्शी प्रक्रिया को दरकिनार कर पसंदीदा ठेकेदार को अनुचित लाभ पहुंचाने और कागजों पर काम दिखाकर लाखों रुपए का सरकारी खजाना डकारने के आरोप में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने सख्त कदम उठाया है। EOW की जांच में घोटाले की पुष्टि होने के बाद तत्कालीन जिम्मेदार इंजीनियरों और फर्म संचालक समेत कई लोगों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज कर लिया गया है।t

₹37.85 लाख की योजना: कागजों पर बनी गौशाला, धरातल पर मिला अधूरा ढांचा
शासन की योजना के तहत डभौरा में एक सर्वसुविधायुक्त गौशाला का निर्माण होना था। इस परियोजना की कुल स्वीकृत लागत 37.85 लाख रुपए तय की गई थी। निर्माण कार्य का जिम्मा ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) संभाग क्रमांक-2, रीवा को सौंपा गया था।

स्वीकृत प्राक्कलन के अनुसार मौके पर निम्नलिखित संरचनाएं निर्मित की जानी थीं:

  • बछड़ों के लिए सुसज्जित शेड।
  • चारा भंडारण हेतु भूसा गोदाम।
  • बीमार और असहाय मवेशियों के उपचार एवं ठहराव के लिए अलग शेड।
  • पानी की समुचित व्यवस्था हेतु नलकूप (बोरवेल) और 6,000 लीटर की ओवरहेड टंकी।
  • सुरक्षा के लिए मजबूत बाउंड्रीवॉल एवं जमीन का समतलीकरण।

हालांकि, जब EOW की टीम ने मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन किया, तो जमीनी हकीकत चौंकाने वाली थी। पूरी गौशाला के नाम पर वहां महज 80×25 फीट की एक अधूरी बाउंड्रीवॉल और एक बिना छत/प्लास्टर का अधूरा ढांचा खड़ा था। बोरवेल, पानी की टंकी और मवेशी शेड जैसे महत्वपूर्ण निर्माण दूर-दूर तक गायब मिले।

फर्जी टेंडर और चहेती कंपनी का खेल: अमानत राशि गायब, फिर भी बना दिया L-1
EOW द्वारा जब्त किए गए दस्तावेजों की छानबीन में अधिकारियों की नीयत और कार्यशैली की कलई खुल गई। नियमों के मुताबिक किसी भी सरकारी काम के लिए खुला पारदर्शी टेंडर आमंत्रित करना अनिवार्य होता है, लेकिन यहां नियमों को ताक पर रखकर साजिश रची गई। छतरपुर की फर्म मेसर्स दीनदयाल कुशवाहा को उपकृत करने के लिए एक ही कार्य की दो अलग-अलग तारीखों (3 दिसंबर 2020 और 31 दिसंबर 2020) में फर्जी व कूटचरित संक्षिप्त निविदाएं तैयार की गईं।

जालसाजी की हद यहीं खत्म नहीं हुई:
गौशाला निर्माण के लिए कुल 28 प्रकार की सामग्रियों की आपूर्ति का टेंडर निकाला गया था, जबकि संबंधित फर्म ने सिर्फ 9 सामग्रियों के ही रेट/कोटेशन जमा किए। इसके बावजूद अधिकारियों ने सांठगांठ कर उक्त फर्म की दर को न्यूनतम (L-1) घोषित कर दिया और कार्यादेश जारी कर दिया। टेंडर प्रक्रिया के लिए अनिवार्य निविदा फॉर्म शुल्क जमा ही नहीं कराया गया और न ही अमानत राशि (EMD) ली गई।

मनरेगा पोर्टल की आड़ में खेल: अधूरा निर्माण, फिर भी ₹20 लाख का सरकारी भुगतान
सरकारी धन की लूट का सबसे बड़ा जरिया बना मनरेगा डिजिटल पोर्टल। मौके पर काम पूरी तरह अधूरा पड़ा था, लेकिन कागजों में काम को पूरा या प्रगति पर दिखाकर फर्जी मूल्यांकन दरें तय की गईं।

मनरेगा पोर्टल पर ₹27,38,578.22 की राशि के फर्जी देयक अपलोड किए गए। बिना जमीनी जांच और बिना भौतिक सत्यापन के ₹20,22,020 की राशि जारी कर फर्म के खाते में ट्रांसफर भी कर दी गई।
EOW के अनुसार, अधूरी और घटिया निर्माण सामग्री के बावजूद भुगतान की स्वीकृति देना सीधे तौर पर शासन के खजाने को चूना लगाने और गंभीर वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है।

EOW का शिकंजा: कार्यपालन यंत्री से लेकर फर्म संचालक तक 7 पर आपराधिक मुकदमा दर्ज
भ्रष्टाचार के इस पूरे गठजोड़ में शामिल अधिकारियों और ठेकेदार की भूमिका स्पष्ट होने के बाद EOW रीवा ने नामजद एफआईआर दर्ज की है।

आरोपियों की सूची:

  • राजेंद्र सिंह धुर्वे – तत्कालीन कार्यपालन यंत्री 
  • एस.आर. आर्य – तत्कालीन कार्यपालन यंत्री
  • हिमांशु तिवारी – तत्कालीन कार्यपालन यंत्री
  • संजीव कुमार सेठी – तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी (SDO)
  • गजाधर सिंह राजपूत – तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी (SDO)
  • लक्ष्मण प्रसाद शुक्ला – तत्कालीन सहायक ग्रेड-3 एवं प्रभारी (निविदा शाखा)
  • दीनदयाल कुशवाहा – प्रोपराइटर, मेसर्स दीनदयाल कुशवाहा (छतरपुर)

जालसाजी और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत संगीन धाराएं
EOW ने इस मामले में निष्पक्ष जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड विधान (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की अति-गंभीर धाराओं में अपराध पंजीबद्ध किया है:

IPC की धाराएं:

  • 409: सरकारी पद पर रहते हुए अमानत में खयानत 
  • 420: धोखाधड़ी और छल करना 
  • 467, 468, 471: कूटरचित दस्तावेज बनाना और फर्जी दस्तावेजों का असली के रूप में इस्तेमाल 
  • 120B: आपराधिक षड्यंत्र रचना

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम:
धारा 7(C), 13(1) एवं 13(2): लोक सेवक द्वारा पदीय कर्तव्य के दुरुपयोग और आर्थिक लाभ कमाने के संबंध में। मामला दर्ज होने के बाद EOW अब संबंधित अधिकारियों और ठेकेदार के बैंक खातों, संपत्तियों और टेंडर फाइलों की विस्तृत तफ्तीश में जुट गई है।