रीवा का चर्चित गोलीकांड: 6 साल बाद कोर्ट का बड़ा फैसला, साक्ष्यों के अभाव में भाजपा नेता के बेटे पर हमला करने वाले सभी आरोपी बरी

 

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले के बहुचर्चित पंकज मैत्री गोलीकांड मामले में माननीय न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए सभी आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है। 21-22 अगस्त 2018 की दरमियानी रात हुए इस हमले ने उस वक्त की सियासत में उबाल ला दिया था, लेकिन अभियोजन पक्ष और पुलिस की कमजोर पैरवी के चलते यह मामला कोर्ट में टिक नहीं सका।

क्या था पूरा मामला?

घटना अगस्त 2018 की है, जब भाजपा नेता कृष्णप्रिया मैत्री के पुत्र और असिस्टेंट प्रोफेसर पंकज मैत्री पर उनके घर के पास जानलेवा हमला हुआ था। रात करीब 2 से 3 बजे के बीच अज्ञात हमलावरों ने पंकज को निशाना बनाकर गोलियां चलाई थीं। घायल पंकज को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जिसके बाद पुलिस ने चार मुख्य आरोपियों—सिकंदर मेहतर, नितेश मांडव, गौतम बक्सरिया और बिगुल—के खिलाफ हत्या के प्रयास (धारा 307) का मामला दर्ज किया था।

न्यायालय के फैसले का मुख्य आधार

अपर सत्र न्यायाधीश सुधीर सिंह राठौर की अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों का सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद पाया कि पुलिस द्वारा पेश किए गए सबूत 'ऊंट के मुंह में जीरा' के समान थे।

1. साक्ष्यों की भारी कमी: पुलिस ने दावा किया था कि घटना स्थल से कारतूस के खोखे, आरोपियों के कपड़े और मोटरसाइकिल बरामद की गई थी, लेकिन कोर्ट में इन चीजों का आरोपियों से संबंध साबित नहीं हो सका।

2. गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास: इस मामले में कुल 17 गवाह पेश किए गए। मुख्य गवाह और पीड़ित के पिता कृष्णप्रिया मैत्री के बयानों में पुलिस डायरी और कोर्ट की गवाही के दौरान भारी अंतर पाया गया। अदालत ने माना कि मौखिक साक्ष्य भरोसेमंद नहीं हैं।

3. सीसीटीवी फुटेज का गायब होना: पुलिस ने शुरुआती जांच में चौराहे पर लगे सीसीटीवी कैमरों का हवाला दिया था, लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि पुलिस ने कोर्ट में वह फुटेज पेश ही नहीं की।

राजनीतिक साजिश और बचाव पक्ष की दलील

आरोपी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव सिंह परिहार और शेरा सिंह ने गिरीश पटेल, साक्षी सिंह बघेल, सुभी सिंह, संभव मिश्रा, सुरेश विश्वकर्मा, रामदल रावत, माधवी शुक्ला साक्षी सिंह परिहार, तृषा कुशवाहा, प्रतीक द्विवेदी ने पैरवी की। बचाव पक्ष ने कोर्ट में दलील दी कि आरोपियों में से तीन कांग्रेस पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे, जिन्हें केवल राजनीतिक द्वेष के चलते इस मामले में घसीटा गया। एडवोकेट शेरा सिंह ने तर्क दिया कि मुख्य गवाह का बयान केवल अपने बेटे के पक्ष में झुका हुआ था, जिसमें निष्पक्षता की कमी थी।

मामले का संक्षिप्त घटनाक्रम 

विवरण तथ्य
घटना का समय 21-22 अगस्त 2018 (मध्यरात्रि)
पीड़ित का नाम पंकज मैत्री (असिस्टेंट प्रोफेसर)
मुख्य आरोपी सिकंदर मेहतर और अन्य
अभियोजन के गवाह 17
न्यायाधीश सुधीर सिंह राठौर (अपर सत्र न्यायाधीश)
अंतिम निर्णय सभी आरोपी दोषमुक्त (Acquitted)

पुलिस की कार्यप्रणाली पर खड़े हुए सवाल

इस फैसले ने एक बार फिर पुलिसिया जांच की खामियों को उजागर कर दिया है।

  • सीसीटीवी क्यों नहीं पेश किया? अगर सीसीटीवी फुटेज मौजूद था, तो पुलिस ने उसे साक्ष्य के रूप में क्यों नहीं रखा?

  • जांच में ढिलाई: 6 साल तक चले इस केस में पुलिस कोई भी ठोस तकनीकी साक्ष्य पेश करने में नाकाम रही।

  • जेल और न्याय: मुख्य आरोपी सिकंदर मेहतर को इस मामले में 3 महीने जेल में बिताने पड़े, जबकि अन्य आरोपी भी डेढ़ महीने तक जेल में रहे। अब बरी होने के बाद उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा की हानि का जिम्मेदार कौन होगा?

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "संदेह चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, वह सबूतों की जगह नहीं ले सकता।" ठोस तकनीकी साक्ष्यों के अभाव और गवाहों की आपसी खींचतान ने इस हाई-प्रोफाइल केस को धराशायी कर दिया। सभी आरोपियों को अब इस मामले से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है।