आम आदमी बनकर लड़े और जीत हासिल की: रीवा के हिनौता में सांसद पुत्र अंकुर मिश्रा बने सरपंच, 366 वोटों से मारी बाजी
रीवा के हिनौता ग्राम पंचायत उपचुनाव में सांसद जनार्दन मिश्रा के बेटे अंकुर मिश्रा ने 366 वोटों से जीत दर्ज की। साइकिल प्रचार और बयानों ने बटोरी सुर्खियां।
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के रीवा जिले के अंतर्गत आने वाली हिनौता ग्राम पंचायत के सरपंच उपचुनाव के नतीजे आ चुके हैं, जिन्होंने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस चुनाव में रीवा के सांसद जनार्दन मिश्रा के बेटे अंकुर मिश्रा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 366 वोटों के अंतर से जीत हासिल कर ली है। यह चुनाव केवल एक पंचायत सीट का मुकाबला नहीं था, बल्कि पारिवारिक मतभेदों, साइकिल से प्रचार और अनोखे बياनों के चलते पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ था। जीत के बाद निर्वाचन अधिकारियों ने उन्हें आधिकारिक रूप से प्रमाण पत्र सौंप दिया है।
साइकिल प्रचार से लेकर पारिवारिक संघर्ष तक का सफर
अंकुर मिश्रा की यह चुनावी यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रही। एक सांसद का बेटा होने के बावजूद उन्होंने अपनी पहचान एक विशेषाधिकार प्राप्त राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े आम नागरिक के तौर पर पेश की।
साइकिल से प्रचार: उन्होंने बिना किसी बड़े तामझाम के साधारण साइकिल से घर-घर जाकर वोट मांगे।
पारिवारिक दूरी: चुनाव के दौरान उनके और उनके पिता के बीच वैचारिक और पारिवारिक मतभेद खुलकर सामने आए, जिससे यह मुकाबला हॉट सीट बन गया।
संघर्ष और जिद: तमाम बाधाओं और चुनौतियों को पार करते हुए उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की और जनता का भारी समर्थन हासिल किया।
चुनाव के दौरान चर्चा में रहे अंकुर मिश्रा के 5 बड़े बयान
इस चुनाव प्रचार के दौरान अंकुर मिश्रा द्वारा दिए गए बयानों ने मीडिया और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी थी। उनके ये 5 बयान सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहे:
"घर से बाहर कर दिया गया है": 26 सितंबर को उन्होंने खुलासा किया था कि राजनीतिक और पारिवारिक अनबन के चलते उन्हें घर से निकाल दिया गया है, हालांकि उन्हें उम्मीद थी कि पिता उन्हें कभी माफ करेंगे।
"मुझे सांसद का बेटा नहीं, आम आदमी समझें": उन्होंने जनता से अपील की थी कि वे उन्हें किसी सांसद के रसूखदार पुत्र के रूप में नहीं, बल्कि एक आम उम्मीदवार के रूप में परखें।
"पिता प्रचार नहीं करेंगे, अपनी लड़ाई खुद लड़ूंगा": अंकुर ने स्पष्ट किया था कि उनके पिता उनके समर्थन में प्रचार करने नहीं आएंगे और उन्हें अपनी यह लड़ाई पूरी तरह अकेले अपने दम पर लड़नी है।
"पिता एक फोन कर दें तो मामला सुलझ सकता है": 2 अक्टूबर को कलेक्ट्रेट में धरने के वक्त उन्होंने कहा था कि पिछले 15 दिनों से उनकी पिता से बात नहीं हुई है, लेकिन एक फोन से सब ठीक हो सकता है।
"चुनावी प्रस्तावक के मामले में कार्रवाई हो": नामांकन से पहले प्रस्तावक पर दबाव बनाने और कथित अपहरण के आरोप को लेकर उन्होंने रीवा कलेक्ट्रेट में मौन धरना दिया था और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई थी।
प्रमाण पत्र मिलने के बाद गांव में जश्न का माहौल
तमाम सियासी उथल-पुथल, विवादों और कड़े संघर्ष के बाद आखिरकार हिनौता की जनता ने अंकुर मिश्रा के पक्ष में अपना फैसला सुना दिया। 366 मतों के स्पष्ट बहुमत से जीत दर्ज करने के बाद जब उन्हें जीत का प्रमाण पत्र मिला, तो उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई। अब देखना यह होगा कि सरपंच बनने के बाद अंकुर मिश्रा अपने पंचायत क्षेत्र के विकास के वादों को किस प्रकार अमलीजामा पहनाते हैं।