प्रधानमंत्री सड़क योजना का संविदा ऑपरेटर बना मनरेगा मजदूर: फोटो अपनी, मजदूरी किसी और की, पैसा पूरा अपना!

 

पिता सरपंच, बेटा ऑपरेटर — पंचायत में ‘परिवारवाद मॉडल’ से चल रहा कथित संगठित भ्रष्टाचार, यह तो सिर्फ एक कड़ी!

रीवा (जवा) विशेष संवाददाता | जिले की जनपद पंचायत जवा अंतर्गत ग्राम पंचायत अंतरैला से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि MPRRDA (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना) में कार्यरत एक संविदा डाटा एंट्री ऑपरेटर ने खुद को ही मनरेगा का मजदूर बनाकर शासकीय राशि का फर्जी आहरण कर लिया। मामले में सबसे दिलचस्प और गंभीर पहलू यह है कि संबंधित कर्मचारी के पिता स्वयं ग्राम पंचायत के सरपंच हैं, जिससे पूरे प्रकरण में संगठित भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग की आशंका और मजबूत हो जाती है।

कैसे हुआ पूरा खेल?
प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत अंतरैला में मनरेगा योजना के अंतर्गत लगभग 10 मजदूरों के नाम से मजदूरी भुगतान दर्शाया गया। लेकिन जब दस्तावेजों और पोर्टल की जांच की गई तो सामने आया कि— एक मजदूर के स्थान पर संविदा ऑपरेटर की खुद की फोटो अपलोड की गई। भुगतान किसी अन्य नाम से दिखाकर राशि का आहरण कर लिया गया। 
वास्तविक श्रमिकों के बजाय कागजों में ही मजदूरी कराई गई। यह पूरा मामला यह दर्शाता है कि सिस्टम के अंदर बैठकर किस तरह योजनाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है।

पिता सरपंच, बेटा सिस्टम में — ‘डबल पावर’ का खेल?
इस प्रकरण को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि—ग्राम पंचायत के सरपंच स्वयं संबंधित कर्मचारी के पिता हैं। बेटा डाटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में सिस्टम तक सीधी पहुंच रखता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह पूरा खेल आपसी मिलीभगत से किया गया?

क्या पंचायत और सिस्टम दोनों पर पकड़ होने का फायदा उठाकर सरकारी राशि का दुरुपयोग किया गया?

नियमों का खुला उल्लंघन
मनरेगा के स्पष्ट प्रावधान हैं कि—केवल वास्तविक मजदूर ही मजदूरी के पात्र होते हैं। कोई भी शासकीय कर्मचारी मजदूरी प्राप्त नहीं कर सकता। इसके बावजूद यदि कोई कर्मचारी खुद को मजदूर दिखाकर भुगतान लेता है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि धोखाधड़ी और कूटरचना की श्रेणी में आता है।

ग्रामीणों में रोष, उठ रहे सवाल
गांव के लोगों में इस मामले को लेकर गहरी नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि—

“जहां गरीब मजदूरों को काम नहीं मिल रहा, वहां अधिकारी खुद मजदूर बनकर पैसा निकाल रहे हैं।”

यह स्थिति मनरेगा योजना के मूल उद्देश्य — गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराना — पर सीधा प्रहार है।

सिर्फ एक कड़ी, आगे और खुलासे संभव
सूत्रों के अनुसार यह मामला केवल एक उदाहरण है। बताया जा रहा है कि संबंधित व्यक्तियों के और भी कई भ्रष्टाचार से जुड़े कारनामे हैं, जिनका खुलासा जल्द ही किया जा सकता है। बता दें कि जब इस मास्टरमाइंड पंकज पाण्डेय से बात की गई तो वह जिस प्रकार से तकनीक का इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार का मजबूत उदाहरण पेश किया है। ठीक उसी प्रकार कहने लगा कि मेरे फ़ोटो की फोरेंसिक जांच कराने सागर लैब में भेज दीजिये। भ्रष्टाचार की इंतेहा करने वाला यह भ्रष्ट ऑपरेटर इतना पैसा कमा लिया है कि इसके आगे प्रशासन बेबकूफ नजर आता है। यह व्यक्ति अपने विभाग में भी करोड़ो का भ्रष्टाचार किया है, जिसकी शिकायतें भी वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंची हैं।

अब कार्रवाई का इंतजार
इस पूरे प्रकरण ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि— क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच होती है? क्या दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सख्त कार्रवाई की जाती है? या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?

रीवा न्यूज़ मीडिया लगातार अतरैला ग्राम पंचायत के भ्रष्ट सरपंच और मास्टरमाइंड पुत्र पंकज पाण्डेय से जुड़े मामले उठाएगा... आगे इनके और कारनामों को उजागर किया जाएगा।