रीवा की लुटती आबरू: बेबस डॉक्टर, बिलखते मरीज और अस्पतालों में सजी लूट की 'मंडी'

 

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) विशेष पड़ताल: विंध्य का केंद्र कहा जाने वाला रीवा आज स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर एक ऐसे नरक में तब्दील हो चुका है, जहाँ इंसान की जान की कीमत उसकी जेब में रखे नोटों से तय होती है। यहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था अब 'सेवा' नहीं, बल्कि एक ऐसा 'क्रूर व्यापार' बन चुकी है, जहाँ मौत की आहट पर भी नोटों की गिनती पहले की जाती है।

आयुष्मान कार्ड: गरीबों के लिए वरदान या भद्दा मजाक?
केंद्र और राज्य सरकार जिस आयुष्मान योजना को गरीबों के लिए 'संजीवनी' बताती है, वह रीवा के अस्पतालों की दहलीज पर पहुँचते ही दम तोड़ देती है। आयुष्मान कार्ड आज एक ऐसा कागजी टुकड़ा बन चुका है जिसे देखते ही निजी अस्पतालों के काउंटर पर बैठे कर्मचारियों के चेहरे की रंगत बदल जाती है।

दावा किया गया था कि 5 लाख तक का मुफ्त इलाज मिलेगा, लेकिन हकीकत यह है कि अस्पताल इस कार्ड को स्वीकार करने से पहले सौ बहाने बनाते हैं। कभी 'सर्वर' का रोना रोया जाता है, तो कभी यह कह दिया जाता है कि 'मशीन खराब है'। गरीब मरीज हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता रहता है, लेकिन अस्पताल का दिल नहीं पसीजता। सवाल यह है कि यदि इलाज नहीं हो रहा, तो फिर फाइलों में सरकार को करोड़ों का भुगतान कैसे दिखाया जा रहा है? क्या यह गरीब के नाम पर पैसे डकारने का कोई बड़ा गबन है?

निजी अस्पतालों का खौफनाक चेहरा: विहान, प्रार्थना,विंध्या और मेट्रो का 'सफेद आतंक'
रीवा के प्रमुख निजी अस्पताल—विहान हॉस्पिटल, प्रार्थना हॉस्पिटल, विंध्या हॉस्पिटल, मेट्रो हॉस्पिटल और नेशनल हॉस्पिटल—पिछले कुछ समय में अपनी कार्यप्रणाली को लेकर जनता के निशाने पर हैं। यहाँ इलाज के नाम पर जो खेल चल रहा है, वह रूह कंपा देने वाला है।

  • नकद का दबाव: आपातकालीन स्थिति में जब मरीज को तुरंत ऑक्सीजन या वेंटिलेटर की जरूरत होती है, तब डॉक्टर और स्टाफ बीमारी की गंभीरता नहीं, बल्कि यह पूछते हैं— "कितना पैसा जमा कर सकते हो?"
  • बर्बरता की हद: इन अस्पतालों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं जहाँ इलाज के नाम पर मोटी रकम जमा कराई गई, और जब तक पैसा खत्म नहीं हुआ, तब तक 'औपचारिकताएं' निभाई गईं। मरीज की मौत के बाद भी बिल के नाम पर शवों को बंधक बनाना यहाँ अब अपवाद नहीं, बल्कि नियम बनता जा रहा है।

संजय गांधी अस्पताल (SGMH): सरकारी बदहाली और रेफर का खेल
जब निजी अस्पताल दरवाजे बंद कर देते हैं, तो बेबस गरीब संजय गांधी अस्पताल की ओर भागता है। लेकिन विंध्य की सबसे बड़ी उम्मीद 'संजय गांधी' खुद वेंटिलेटर पर है। यहाँ इलाज कम और औपचारिकताएं ज्यादा निभाई जाती हैं। प्रतिदिन दर्जनों मरीज इस उम्मीद में आते हैं कि उन्हें छत और उपचार मिलेगा, लेकिन जांचों के नाम पर उन्हें एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक भटकाया जाता है। बेड की कमी और स्टाफ की किल्लत का बहाना बनाकर मरीजों को अंततः मौत के मुँह में या फिर वापस उन्हीं निजी अस्पतालों की लूट में धकेल दिया जाता है।

जांचों का जाल और कमीशन की खेती
रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था में हर सुई और हर टेस्ट पर 'कमीशन' का साया है। डॉक्टर एक जांच के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी जांच सिर्फ इसलिए लिखते हैं ताकि अस्पताल का बिल बढ़ाया जा सके। गरीबी का सबसे भद्दा मजाक तब बनता है जब एक पिता अपने बेटे की जान बचाने के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन और गहने गिरवी रख देता है, लेकिन इलाज के बाद भी उसे केवल अपनों की 'मिट्टी' नसीब होती है। कर्ज का बोझ उस परिवार को जीते जी मार देता है।

प्रशासन का 'मौन' समर्थन: आखिर क्यों नहीं होती कार्रवाई?
इन सब अराजकताओं के बीच स्वास्थ्य विभाग की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध है। निरीक्षण के नाम पर फोटो खिंचवाई जाती है, कागजी नोटिस दिए जाते हैं, लेकिन आज तक किसी भी 'नामचीन' अस्पताल पर ऐसी कार्रवाई नहीं हुई जो दूसरों के लिए नजीर बने। ऐसा लगता है कि निजी अस्पताल माफियाओं और प्रशासन के बीच कोई गहरी साठगांठ है, जो आम आदमी की चीखों को दबा देती है।

निष्कर्ष: इमारतों में कैद है मौत का सौदा
क्या स्वास्थ्य व्यवस्था का मतलब सिर्फ कांच की दीवारें और चमचमाती मशीनें हैं? या फिर इंसान की जान की भी कोई अहमियत है? रीवा की जनता अब जवाब चाहती है। फाइलों में दर्ज सफलता के आंकड़े श्मशान की खामोशी को नहीं दबा सकते। यदि आयुष्मान योजना की पारदर्शी जांच नहीं हुई और विहान, प्रार्थना,मेट्रो, विंध्या जैसे अस्पतालों की मनमानी पर बुलडोजर नहीं चला, तो आने वाले दिन और भी भयावह होंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: रीवा के निजी अस्पतालों में आयुष्मान कार्ड क्यों नहीं लिए जाते? उत्तर: अस्पताल नकद भुगतान को प्राथमिकता देते हैं और सरकारी भुगतान की प्रक्रिया से बचने के लिए तकनीकी खराबी का बहाना बनाकर गरीबों को लौटा देते हैं।
Q2: क्या संजय गांधी अस्पताल में मुफ्त जांच की सुविधा है? उत्तर: कागजों पर सुविधा है, लेकिन भीड़ और अव्यवस्था के कारण मरीजों को हफ्तों इंतजार करना पड़ता है, जिससे मजबूरन उन्हें निजी लैब जाना पड़ता है।
Q3: अस्पतालों की मनमानी की शिकायत कहाँ करें? उत्तर: जिला कलेक्टर या मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को लिखित शिकायत दी जा सकती है, हालाँकि जनता का आरोप है कि यहाँ कार्रवाई केवल नाममात्र की होती है।
Q4: इलाज के नाम पर कौन से प्रमुख अस्पताल विवादों में हैं? उत्तर: विहान, प्रार्थना, विंध्या, मेट्रो और नेशनल हॉस्पिटल जैसे संस्थानों की कार्यशैली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।