रीवा में सरकारी 'अय्याशी' का बड़ा खुलासा: शराब-कबाब के साथ रंगे हाथों पकड़े गए PIU के 'रत्न'

 
पीआईयू एसडीओ संजीव कालरा का 'शराब-पार्टी' वाला रूप सोशल मीडिया पर आग की तरह फैला, माँ की बीमारी का हवाला देकर बरसों से रीवा में जमाकर लूट रहे विभाग

ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। रीवा के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक तस्वीर ने खलबली मचा दी है। यह तस्वीर किसी आम आदमी की नहीं, बल्कि लोक निर्माण विभाग (PIU) के एक जिम्मेदार एसडीओ संजीव कालरा की है, जो अपनी कुर्सी की गरिमा को शराब की बोतलों और अय्याशी की महफिल में भुला बैठे हैं। महंगी शराब और टेबल पर सजे खाने-पीने के सामान के साथ उनकी तस्वीरें यह चीख-चीख कर कह रही हैं कि रीवा में सरकारी तंत्र किस कदर बेलगाम हो चुका है।

डिप्टी सीएम के 'नवरत्न' और पीआईयू का स्याह सच
संजीव कालरा को रीवा में डिप्टी सीएम के 'नवरत्नों' में से एक माना जाता है। शायद यही वजह है कि उनकी कुर्सी के आगे कोई हिल नहीं पाता। सत्ता बदली, सरकार बदली, लेकिन संजीव कालरा की रीवा से विदाई कभी नहीं हुई। पीआईयू के जितने भी बड़े प्रोजेक्ट शहर में चल रहे हैं, उनकी कमान सीधे तौर पर इन्हीं के हाथों में है। सूत्रों की मानें तो निर्माण कार्यों का भुगतान हो या कमीशन का सेटिंग-गेट-टिंग, कालरा साहब की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।

'माँ की बीमारी' बनी भ्रष्टाचार और अय्याशी की ढाल
हैरानी की बात यह है कि संजीव कालरा सालों से रीवा में सिर्फ इसलिए जमे हुए हैं क्योंकि उन्होंने 'माँ की बीमारी' का भावनात्मक कार्ड खेल रखा है। लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। पता चला है कि उनका परिवार और माँ सतना में उनके भाई (जो खुद एक डॉक्टर हैं) के पास रहते हैं। क्या 'माँ की बीमारी' अब भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक 'शील्ड' बन गई है, ताकि वे अपने गृह-जिले या पसंदीदा पोस्टिंग पर जमे रहकर सरकारी मलाई काट सकें? यह जनता के साथ एक भद्दा मजाक है।

काम ठप, सिर्फ कमीशन का खेल: पीआईयू की बर्बादी
संजीव कालरा की अय्याशी का असर पीआईयू विभाग पर साफ दिख रहा है। विभाग के पास अब काम न के बराबर बचे हैं। बड़ी एजेंसियां जैसे एमपीबीडीसी (MPBDC) प्रोजेक्ट्स छीन रही हैं, क्योंकि पीआईयू के अधिकारी फील्ड में काम करने के बजाय 'शराब पार्टी' में व्यस्त हैं। उनकी प्राथमिकता जनता की सेवा नहीं, बल्कि अपने रसूख और कमीशन का दायरा बढ़ाना है।

मेडिकल कॉलेज भवन: भ्रष्टाचार का एक जीवंत उदाहरण
संजीव कालरा की निगरानी में हुए निर्माण कार्यों की गुणवत्ता जगजाहिर है। मेडिकल कॉलेज का अकादमिक भवन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बनने के साथ ही यह इमारत बारिश में चूने लगी थी। तीन साल तक विवादों में रहने के बाद अब जाकर उसे कंडम हालत में हैंडओवर किया गया है। क्या यह विकास है या जनता के पैसों की बर्बादी?

शासन और प्रशासन से तीखे सवाल

  • डिप्टी सीएम साहब, आपके 'नवरत्न' विभाग की गरिमा गिरा रहे हैं, क्या आप भी इस अय्याशी में शामिल हैं?
  • पीआईयू प्रबंधन, जब अधिकारी का ध्यान फील्ड के बजाय होटल के कमरों में है, तो विभाग की बर्बादी के लिए किसे जिम्मेदार माना जाए?
  • प्रशासन, क्या ऐसे अधिकारी पर तत्काल प्रभाव से निलंबन की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

'रीवा न्यूज़ मीडिया' का संकल्प है कि हम ऐसे 'शराबखोर' अधिकारियों का पर्दाफाश करते रहेंगे। अब समय आ गया है कि रीवा की जनता अपनी गाढ़ी कमाई को इन लुटेरों की अय्याशी का जरिया न बनने दे।