रीवा परिवहन विभाग के दावों की खुली पोल: वीआईपी निर्माण कंपनी के आगे नतमस्तक हुआ आरटीओ अमला, जनता में भारी आक्रोश

 

रीवा क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय की दोहरी नीति उजागर। रतहरा-चोरहटा सड़क निर्माण में लगी KCC कंपनी के 100 से अधिक ओवरलोड वाहनों पर कार्रवाई से बच रहा विभाग।

ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। रीवा क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) इन दिनों अपनी एक कथित 'बड़ी सफलता' का ढोल पीटने में मसरूफ है। विभाग द्वारा जारी आधिकारिक बयानों में दावा किया गया है कि यात्रियों की सुरक्षा को ताक पर रखकर दौड़ने वाली अंतर्राज्यीय स्लीपर बसों के खिलाफ एक बड़ा अभियान चलाया गया। इस कार्रवाई के तहत वाराणसी से नागपुर, प्रयागराज से इंदौर और प्रयागराज से रायपुर जैसे लंबे रूटों पर चलने वाली 9 आलीशान बसों के परमिट और रजिस्ट्रेशन को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया। आरटीओ अमले का कहना है कि इन बसों में 'फायर अलार्म डिटेक्शन सिस्टम' (FADS) और 'फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम' (FDSS) जैसे अनिवार्य जीवन रक्षक उपकरण गायब थे।

इस कार्रवाई को अखबारों की सुर्खियों में जगह तो मिल गई, लेकिन जैसे ही यह खबर धरातल पर आई, विभाग खुद कटघरे में खड़ा हो गया। स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और बस ऑपरेटर्स एसोसिएशन ने आरोप लगाया है कि यह पूरी कार्रवाई केवल विभाग की छवि चमकाने और बड़ी मछलियों से ध्यान भटकाने के लिए किया गया एक सुनियोजित ड्रामा है। सवाल यह उठ रहा है कि जो विभाग बसों के भीतर लगे छोटे उपकरणों को ढूंढने के लिए इतनी मुस्तैदी दिखा रहा है, उसे सड़कों पर साक्षात काल बनकर दौड़ रहे विशालकाय डंपर और हाईवा क्यों नजर नहीं आते?

केसीसी कंपनी के 100 से अधिक अनियंत्रित वाहन: रतहरा-चोरहटा मार्ग पर कानून व्यवस्था को खुला चैलेंज
रीवा शहर के एक छोर रतहरा से लेकर चोरहटा तक चल रहे बाईपास और सड़क चौड़ीकरण के काम का जिम्मा 'केसीसी (KCC) कंस्ट्रक्शन कंपनी' के पास है। इस निर्माण कार्य के नाम पर कंपनी के लगभग 100 से भी ज्यादा भारी-भरकम वाहन, डंपर, मिक्सर मशीनें और हाईवा चौबीसों घंटे सड़कों पर दौड़ रहे हैं। स्थानीय निवासियों, राहगीरों और वाहन चालकों का स्पष्ट आरोप है कि इन वाहनों के पास न तो पूरे कागजात हैं और न ही ये परिवहन विभाग के तय मापदंडों को पूरा करते हैं।

आरोप बेहद संगीन हैं। लोगों का कहना है कि केसीसी कंपनी के ये डंपर इस कदर ओवरलोड होकर निकलते हैं कि इनके पीछे चलने वाले दुपहिया वाहनों के लिए सड़क पर टिकना दूभर हो जाता है। ओवरलोडिंग के कारण इन वाहनों से गिट्टी, धूल और मलबे के टुकड़े लगातार सड़क पर गिरते रहते हैं, जो आए दिन होने वाले सड़क हादसों की मुख्य वजह बन रहे हैं। इसके बावजूद, रीवा आरटीओ की नजरें इन 100 वाहनों पर कभी नहीं पड़तीं।

नंबर प्लेट गायब, फिटनेस एक्सपायर: आरटीओ साहब! दफ्तर से बाहर निकलिए, फील्ड की हकीकत देखिए
परिवहन नियमों के मुताबिक, किसी भी कमर्शियल या भारी वाहन का नंबर प्लेट पूरी तरह साफ और स्पष्ट होना अनिवार्य है ताकि किसी भी दुर्घटना की स्थिति में वाहन की पहचान की जा सके। लेकिन केसीसी कंपनी के अधिकांश डंपरों की स्थिति देखी जाए, तो उनकी नंबर प्लेटों पर या तो जानबूझकर कालिख-मिट्टी पोती गई है या वे इस कदर टूट चुके हैं कि नंबरों को पढ़ पाना नामुमकिन है।

इतना ही नहीं, सूत्रों का दावा है कि इनमें से कई वाहनों का न तो समय पर इंश्योरेंस रिन्यू हुआ है और न ही इनके पास प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र (PUC) है। भारी वाहनों के लिए हर साल होने वाला अनिवार्य 'फिटनेस टेस्ट' भी इन वाहनों के लिए केवल एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि जब भी आरटीओ की टीम चेकिंग का दिखावा करने आती है, तो वह सड़कों पर चलने वाले इन डंपरों को रोकने की जहमत नहीं उठाती। अधिकारी सीधे कंपनी के मुख्य प्लांट के अंदर जाते हैं, वहां एसी कमरों में बैठकर 'चाय-पानी' का दौर चलता है और कागजों पर 'सब कुछ ठीक है' की मुहर लगाकर अमला वापस लौट आता है।

रीवा आरटीओ की कार्यप्रणाली का तुलनात्मक विश्लेषण:
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| स्लीपर बसों पर 'कड़ी' नजर                              | KCC कंपनी के भारी वाहनों पर 'खामोशी'|
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| - जरा सी तकनीकी कमी पर निलंबन                 | - ओवरलोडिंग के बावजूद कोई चालान नहीं|
| - दूसरे राज्यों (MH, TS) के वाहनों पर |            - बिना स्पष्ट नंबर प्लेट के सड़कों पर |
|   तुरंत एक्शन                                                 |   दौड़ने की खुली छूट              |
| - प्रेस नोट जारी कर लूटी गई वाहवाही  |            - शिकायतों के बाद भी धरातल पर शून्य |
|                                   |   कार्रवाई                        |
| - आम जनता की सुरक्षा का दिया हवाला       | - घटिया डायवर्सन और हादसों पर चुप्पी|
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भ्रष्टाचार और अवैध मंथली का खेल? परिवहन विभाग के गलियारों में तैरते अनसुने सवाल
जब एक सरकारी महकमा किसी रसूखदार कंपनी के सामने घुटने टेक देता है, तो जनता के मन में भ्रष्टाचार की आशंका होना स्वाभाविक है। रीवा के स्थानीय परिवहन हलकों और सोशल मीडिया पर इस बात की चर्चाएं आम हैं कि निर्माण कंपनियों और आरटीओ के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के बीच 'मासिक लेनदेन' (मंथली फिक्सिंग) का एक मजबूत नेक्सस काम कर रहा है।

एक तरफ आम मध्यमवर्गीय परिवार के व्यक्ति की बाइक या कार का इंश्योरेंस एक दिन भी फेल हो जाए, तो आरटीओ और ट्रैफिक पुलिस बीच चौराहे पर उसका तगड़ा चालान काट देती है। दूसरी तरफ, करोड़ों का टर्नओवर रखने वाली केसीसी कंपनी की पूरी फ्लीट बिना किसी रोक-टोक के नियमों के परखच्चे उड़ा रही है। बस ऑपरेटरों का भी दबी जुबान में यही कहना है कि उन्हें निशाना इसलिए बनाया जा रहा है क्योंकि वे विभाग की नाजायज मांगों के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं, जबकि बड़ी कंपनियां अपने रसूख के दम पर पूरे सिस्टम को अपनी जेब में लेकर घूमती हैं।

रतहरा-चोरहटा बाईपास की दुर्दशा: घटिया डायवर्सन और अंधाधुंध हादसों का जिम्मेदार कौन?
केसीसी कंपनी द्वारा किए जा रहे निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों की जिस तरह धज्जियां उड़ाई गई हैं, वह किसी से छिपी नहीं है। रतहरा से चोरहटा तक जगह-जगह जो डायवर्सन (रास्ता बदलने के पॉइंट) बनाए गए हैं, वे इतने अव्यवहारिक और खतरनाक हैं कि रात के अंधेरे में वहां से गुजरना मौत को दावत देने जैसा है। इन डायवर्सन पॉइंट्स पर न तो कोई रिफ्लेक्टर लाइट लगाई गई है और न ही कोई सांकेतिक बोर्ड है जो वाहन चालकों को सचेत कर सके।

सड़क निर्माण के दौरान उड़ने वाली धूल को दबाने के लिए पानी का छिड़काव करने का नियम है, लेकिन कंपनी इस पर भी पैसे बचा रही है। नतीजतन, पूरी सड़क पर धूल का ऐसा गुबार छाया रहता है जिससे सामने से आ रहे वाहन दिखाई नहीं देते। पिछले कुछ महीनों में इस मार्ग पर कई छोटे-बड़े सड़क हादसे हो चुके हैं, जिनमें कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। लेकिन आरटीओ, लोक निर्माण विभाग (PWD) और नेशनल हाईवे अथॉरिटी (NHAI) के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है।

जनता ने खोला मोर्चा: जिला प्रशासन और परिवहन आयुक्त से निष्पक्ष जांच की पुरजोर मांग
आरटीओ की इस दोहरी नीति और केसीसी कंपनी की तानाशाही के खिलाफ अब रीवा की जनता का सब्र का बांध टूट चुका है। स्थानीय समाजसेवियों, वाहन चालकों और प्रभावित ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से रीवा जिला कलेक्टर और मध्य प्रदेश के परिवहन आयुक्त (ग्वालियर) से इस पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है।

जनता की साफ मांग है कि:

  • केसीसी कंपनी के अंतर्गत चल रहे सभी 100 से अधिक भारी वाहनों को सड़क पर रोककर उनके परमिट, फिटनेस, इंश्योरेंस और डंपर की क्षमता (लोडिंग लिमिट) की मौके पर जांच की जाए।
  • जिन वाहनों के नंबर प्लेट स्पष्ट नहीं हैं या जो ओवरलोड पाए जाएं, उन्हें तुरंत जब्त (Seize) कर उन पर भारी जुर्माना लगाया जाए।
  • निर्माण कार्य क्षेत्र में सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने पर कंपनी के प्रबंधन के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो।

आरटीओ विभाग के उन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाए जो लगातार मिल रही शिकायतों के बावजूद दफ्तर से बाहर निकलने को तैयार नहीं थे।

क्या केवल कागजों तक सीमित रहेगी रीवा RTO की 'महान' उपलब्धियां?
यह मामला अब सिर्फ परिवहन नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह रीवा के प्रशासनिक इकबाल और ईमानदारी की परीक्षा बन चुका है। अगर रीवा आरटीओ आने वाले दिनों में केसीसी कंपनी के इन मस्ताने डंपरों पर कोई ठोस और दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तो यह साफ हो जाएगा कि विभाग की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है।

अब देखना यह होगा कि क्या रीवा जिला प्रशासन इस मामले को संज्ञान में लेकर परिवहन विभाग को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास कराता है, या फिर हमेशा की तरह एक नया प्रेस नोट जारी कर जनता की आंखों में धूल झोंकने का काम जारी रहेगा। गंगेव से लेकर चोरहटा तक की जनता अब केवल खोखले आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है; उसे सड़क पर बदलाव और कार्रवाई चाहिए।