SGMH का घिनौना सच : 'कोड' से चलता है मरीजों का इलाज! रीवा के अस्पताल में एक्सपायर्ड दवाओं के खेल ने खोली पोल
ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। रीवा का संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय, जो विंध्य क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए स्वास्थ्य की अंतिम उम्मीद है, आज खुद बीमार हो चुका है। जिस संस्थान का काम जीवन बचाना है, वहां 'मौत का सौदा' चल रहा है। एक्सपायर्ड इंजेक्शन और दवाएं सीधे मरीजों को दिए जाने का मामला सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि अस्पताल के अंदर एक ऐसा माफिया सक्रिय है, जो मरीजों की जान की परवाह नहीं करता।
सरकारी अस्पताल या 'रेफर' करने का अड्डा?
इस घोटाले का दूसरा और सबसे डरावना पहलू यह है कि अस्पताल के अंदर मौजूद 'सरकारी दवा भंडार' अक्सर खाली रहता है। मरीज जब अस्पताल पहुंचता है, तो उसे सरकारी मुफ्त दवा देने के बजाय एक रहस्यमयी 'कोड' लिखकर पर्ची थमा दी जाती है। यह कोड किसी और को नहीं, बल्कि अस्पताल के बाहर स्थित उन्हीं चुनिंदा मेडिकल स्टोर्स को समझ में आता है, जिनका प्रबंधन से साठ-गांठ होती है।
- पर्ची पर कोड का खेल: डॉक्टर सरकारी दवा उपलब्ध कराने के बजाय कोड लिख रहे हैं ताकि मरीज बाहर से दवा खरीदे।
- अस्पताल में दवाओं का अभाव: जब सरकार करोड़ों का बजट दवाओं पर खर्च कर रही है, तो अस्पताल में दवाएं क्यों नहीं हैं? क्या यह सब बाहर से दवा बिकवाने का कमीशन का खेल है?
स्टोर प्रबंधन की जवाबदेही क्यों तय नहीं?
अस्पताल अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा ने भले ही जांच के आदेश दे दिए हों, लेकिन क्या केवल जांच से दोषियों को सजा मिलेगी? अस्पताल में एक्सपायर्ड दवाएं वार्ड तक कैसे पहुंचीं? बिना मिलीभगत के स्टोर से एक्सपायर्ड स्टॉक जारी करना नामुमकिन है। यह 'स्टोर लेवल' की लापरवाही नहीं, बल्कि 'क्रिमिनल नेग्लिजेंस' (आपराधिक लापरवाही) है।
आईसीयू की भयावह हकीकत: जीवन बचाने वाली दवाएं बनीं मौत का सबब
मामला तब प्रकाश में आया जब विवेक त्रिपाठी नामक व्यक्ति ने सोशल मीडिया और अस्पताल प्रबंधन के समक्ष सबूतों के साथ शिकायत दर्ज कराई। उनके पिता वर्तमान में संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय के गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में जीवन-मरण के बीच संघर्ष कर रहे हैं। परिजनों का आरोप है कि 18 जून को उनके पिता को जो इंजेक्शन और दवाएं दी गईं, उनकी उपयोग अवधि (Expiry Date) काफी पहले समाप्त हो चुकी थी। उन्होंने दवा के पैकेट की तस्वीरों को सार्वजनिक कर अस्पताल की लचर व्यवस्था की पोल खोल दी है।
सुरक्षा मानकों पर उठे सवाल: क्या मरीजों की जान का कोई मोल नहीं?
अस्पताल में एक्सपायर दवाओं और इंजेक्शनों का वितरण न केवल एक तकनीकी चूक है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी गंभीर मरीज के इलाज में दवाओं की गुणवत्ता और उनकी वैधता का भौतिक सत्यापन अनिवार्य है। यदि यह मामला समय रहते उजागर न होता, तो न जाने कितने अन्य मरीज इन जहर समान दवाओं का शिकार हो चुके होते। यह घटना अस्पताल की 'क्वालिटी कंट्रोल' टीम की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
मेडिसिन विभाग के भीतर सक्रिय भ्रष्टाचार का नेक्सस
प्राथमिक शिकायतों के अनुसार, यह अनियमियता विशेष रूप से मेडिसिन विभाग में बड़े पैमाने पर पनप रही है। आरोप है कि भर्ती मरीजों को बिना जांचे-परखे एक्सपायर्ड इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं। जैसे ही यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल हुई, अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया और आनन-फानन में संबंधित मेडिकल रिकॉर्ड्स को सील कर जांच की प्रक्रिया शुरू की गई। सवाल यह है कि आखिर ये एक्सपायर्ड दवाएं स्टोर से निकलकर सीधे मरीजों के बेड तक कैसे पहुंचीं?
अधीक्षक की लीपापोती और जांच का दिखावा
अस्पताल अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए एक कैंसर मरीज की शिकायत की पुष्टि की है। उन्होंने इसे 'स्टोर स्तर की लापरवाही' बताकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया है। अधीक्षक का दावा है कि एक्सपायर्ड दवा से तत्काल जान का खतरा नहीं होता, केवल प्रभावशीलता कम होती है। परंतु, एक सरकारी अस्पताल में यह तर्क अपने आप में हास्यास्पद और गैर-जिम्मेदाराना है। परिजनों का आरोप है कि जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है और असली दोषियों (जो स्टोर से ये दवाएं वार्ड तक भेज रहे हैं) को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
क्या मरीज केवल एक 'कोड' बनकर रह गए हैं?
आईसीयू में भर्ती मरीजों के परिजनों का आरोप है कि उन्हें ऐसी दवाएं दी गईं जिनकी एक्सपायरी डेट खत्म हो चुकी थी। यदि परिजनों ने जागरूकता न दिखाई होती, तो ये दवाएं मरीज के खून में शामिल होकर न जाने क्या अनर्थ कर देतीं। मरीज को ठीक करने के बजाय उसे और गंभीर स्थिति में धकेलने वाले इन लापरवाह कर्मियों और अधिकारियों को तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए।
मांग: दोषियों पर हो कड़ी कार्रवाई
हम मांग करते हैं कि:
- सीबीआई या एसआईटी जांच: केवल विभागीय जांच से काम नहीं चलेगा, क्योंकि इसमें कई बड़े अधिकारी शामिल हो सकते हैं।
- स्टोर मैनेजर और संबंधित दोषी डॉक्टरों पर FIR: मरीजों की जान खतरे में डालने के आरोप में तत्काल प्राथमिकी दर्ज हो।
- बाहरी दवाओं का ऑडिट: अस्पताल की पर्ची पर बाहर से दवा लिखने की प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगे और स्टॉक की सार्वजनिक जांच हो।