रीवा: हुजूर तहसील में 'स्वच्छ भारत' का निकला जनाजा! गंदगी का अंबार, नलों में पानी नहीं और दलालों का 'समानांतर शासन'
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहाँ एक तरफ 'स्वच्छ भारत' और 'डिजिटल इंडिया' के जरिए पारदर्शी शासन का सपना देख रहे हैं, वहीं रीवा जिले की हुजूर तहसील इन दावों की धज्जियाँ उड़ा रही है। तहसील परिसर में घुसते ही स्वागत 'सुगंध' से नहीं, बल्कि कचरे के ढेरों और बदबू से होता है। सरकारी कार्यालय परिसर अब कूड़ाघर में तब्दील हो चुका है। विडंबना देखिए, जिस दफ्तर से पूरे क्षेत्र की व्यवस्था सुधरनी चाहिए, वही दफ्तर खुद 'बीमार' पड़ा है।
बाथरूम में पानी नहीं, टोंटियाँ गायब – शोपीस बने सरकारी वादे!
तहसील कार्यालय के बाथरूम की स्थिति इतनी शर्मनाक है कि वहाँ खड़ा होना भी दूभर है। नलों में पानी की एक बूंद नहीं है और जो टोंटियाँ लगी हैं, वे महज 'शोपीस' बनकर रह गई हैं। दूर-दराज के गाँवों से आने वाले बुजुर्गों और महिलाओं को पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। क्या रीवा का जिला प्रशासन इतना लाचार है कि एक सरकारी दफ्तर में पानी तक उपलब्ध नहीं करा पा रहा?
तहसीलदार शिवशंकर शुक्ला पर आरोपों की बौछार: "घर बैठे निपट रही हैं फाइलें?"
जब से हुजूर तहसील की कमान तहसीलदार शिवशंकर शुक्ला के हाथों में आई है, तब से शिकायतों का अंबार लग गया है। सूत्रों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि तहसीलदार साहब का दफ्तर में आना-जाना महज 'अतिथि' जैसा है। आरोप यहाँ तक हैं कि महत्वपूर्ण फाइलें कार्यालय के बजाय घर से निपटाई जा रही हैं। अगर साहब दफ्तर नहीं आएंगे, तो आम जनता अपनी फरियाद लेकर किसके पास जाएगी? यह कार्यशैली सीधे तौर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के 'सुशासन' के दावों को चुनौती दे रही है।
दलालों का 'स्वर्ग' बनी तहसील – बिना 'विटामिन-एम' के नहीं होता काम!
हुजूर तहसील अब आम नागरिकों के लिए नहीं, बल्कि दलालों के लिए 'चारागाह' बन चुकी है। आरोप है कि यहाँ हर मेज का एक रेट तय है। बिना बिचौलियों और दलालों के हस्तक्षेप के एक साधारण आवेदन भी आगे नहीं बढ़ता। जो गरीब किसान अपनी जमीन के कागज या नामांतरण के लिए आता है, उसे हफ्तों दौड़ाया जाता है, लेकिन दलाल के जरिए आने वाली फाइलें 'रॉकेट' की रफ्तार से पास हो जाती हैं।
आम जनता की पीड़ा: "न्याय की उम्मीद में घिस गए जूते"
तहसील परिसर में अपनी फाइल के लिए भटक रहे ग्रामीणों का कहना है कि वे महीनों से चक्कर काट रहे हैं। कभी बाबू गायब रहता है, तो कभी तहसीलदार साहब की कुर्सी खाली मिलती है। सफाई व्यवस्था की हालत ऐसी है कि तहसील में बैठना तो दूर, सांस लेना भी मुश्किल है। एक तरफ भ्रष्टाचार की मार और दूसरी तरफ गंदगी का प्रहार—हुजूर तहसील की जनता दोहरी मार झेल रही है।
प्रशासनिक सन्नाटा और उठते सवाल?
हुजूर तहसील की यह बदहाली क्या जिला प्रशासन की नजर में नहीं है? क्या कलेक्टर रीवा को इस बात की भनक नहीं कि उनके ठीक नाक के नीचे एक तहसील कार्यालय भ्रष्टाचार और गंदगी का अड्डा बन चुका है?
- सफाई के लिए आने वाला बजट कहाँ जा रहा है?
- तहसीलदार साहब की दफ्तर से गैर-हाजिरी पर कौन जवाब देगा?
- दलालों के प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा रहा?
अब जागने का वक्त है!
हुजूर तहसील की यह स्थिति केवल गंदगी की समस्या नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक लकवा (Administrative Paralysis) है। यदि जल्द ही सफाई व्यवस्था दुरुस्त नहीं की गई और दलालों के सिंडिकेट को नहीं तोड़ा गया, तो आम जनता का सरकारी तंत्र से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। जनता अब केवल 'आदेश' नहीं, बल्कि 'कार्रवाई' चाहती है।