रीवा की चरमराई ट्रैफिक व्यवस्था: सोए हुए सिस्टम और लापरवाह जिम्मेदारों पर जनता का फूटा गुस्सा, तुरंत हो कार्रवाई!

 

रीवा शहर में कॉलेज चौराहा, सिरमौर चौराहा पर रोज लग रहा जाम, चेकिंग के नाम पर वसूली और अतिक्रमण से लोग परेशान।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) रीवा शहर में इन दिनों यातायात व्यवस्था के जो हालात हैं, वे किसी से छिपे नहीं हैं। एक तरफ शहर विकास के नए आयाम छू रहा है, तो दूसरी तरफ सड़कों पर फैलती अव्यवस्था और ट्रैफिक कुप्रबंधन ने आम नागरिकों का जीना मुहाल कर दिया है। सुबह 9 बजे से लेकर देर शाम तक शहर के प्रमुख मार्गों पर जिस तरह का जाम और अराजकता देखने को मिलती है, उसने स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर कई बड़े और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 

शहर में यातायात पुलिस की कार्यशैली अब पूरी तरह से सवालों के घेरे में आ चुकी है। जय स्तंभ चौक से लेकर समान थाने तक का इलाका इन दिनों नियमों के पालन का नहीं, बल्कि अवैध वसूली और खुली लूट का मुख्य केंद्र बन चुका है। शहरभर में ई-चालान और चेकिंग के नाम पर आम चालकों को प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि दूसरी ओर बड़े और भारी वाहनों को शहर के भीतर बेधड़क पार्क कराने और संचालन की एवज में हर महीने मोटी रकम वसूली जा रही है।

सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाले कुछ खास लोग पर्दे के पीछे से खेल चला रहे हैं: अपनी फर्जी वाहवाही लूटने और प्रशासनिक नाकामी को छिपाने के लिए कुछ 'छुटभैया तत्वों' और दलालों का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। यातायात महकमे की कमान संभाल रहीं अनिमा शर्मा और अंजलि गुप्ता पर गंभीर आरोप हैं कि वे शहर के बड़े और वरिष्ठ पत्रकारों से पूरी तरह दूरी बनाकर रखती हैं ताकि उनकी कारगुजारियों की असल परतें मीडिया के सामने न खुल सकें। 

ऑटो चालकों की बढ़ती फौज और सुरक्षा के नाम पर शून्य व्यवस्था
शहर में आज की सबसे बड़ी जमीनी हकीकत यह है कि आम जनता से ज्यादा संख्या रीवा की सड़कों पर ऑटो और ई-रिक्शा की हो गई है। स्थिति यह है कि सड़कों पर दौड़ रहे कई ऑटो चालकों का कोई अता-पता नहीं है। इनमें से कई चालकों के पास न तो वैध पहचान पत्र हैं और न ही पुलिस वेरिफिकेशन। यहाँ तक कि नशे की हालत में वाहन चलाने और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले तत्वों के सक्रिय होने की चर्चाएँ भी आम हो चुकी हैं, जिससे शहर की सुरक्षा पर भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है।  यातायात विभाग द्वारा इन ऑटो और ई-रिक्शा के लिए न तो कोई निश्चित रूट तय किया गया है और न ही पार्किंग के कोई नियम। जब जिसकी जहाँ मर्जी होती है, बीच सड़क पर ही ऑटो खड़ा कर सवारी बैठाना शुरू कर देते हैं, जिससे पीछे वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं।

यातायात पुलिस की कार्यशैली और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

शहर की खस्ताहाल ट्रैफिक व्यवस्था के पीछे विभागीय सुस्ती और भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। स्थानीय नागरिकों और सूत्रों के अनुसार: शहर में लगाए गए ट्रैफिक सिग्नल केवल शोपीस बनकर रह गए हैं। उनका कोई पालन नहीं होता और न ही यातायात कर्मी अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद दिखते हैं। यातायात थाने के ठीक सामने शराबखोरी के अड्डे संचालित होने की बातें सामने आती हैं। आरोप है कि यातायात पुलिस के जवान मुख्य चौराहों पर ट्रैफिक सुधारने के बजाय बाईपास और अन्य स्थानों पर वसूली और उगाही में व्यस्त रहते हैं। 

ट्रांसपोर्ट नगर पर सरकारी रस्ते पर अवैध पार्किंग पर खड़े वाहनों की लम्बी कतार, क्रेन, यात्री बस, जेसीबी, मिनी ट्रक 

चालान पर्ची का सच: सरकारी खजाना या सिर्फ चेकिंग के नाम पर खानापूर्ति?
शहर में जब-तब बिना पूर्व सूचना के अचानक चेकिंग पॉइंट लगा दिए जाते हैं। वाहन चालकों का आरोप है कि चेकिंग का मुख्य उद्देश्य यातायात को सुचारू बनाना या लोगों को जागरूक करना नहीं, बल्कि चालानी कार्रवाई के नाम पर दबाव बनाना होता है।

ट्रांसपोर्ट नगर में अवैध पार्किंग का अड्डा, सरकारी रास्ता बने पार्किंग स्टैंड 

सड़कों के व्यस्त मोड़ों पर अचानक टीम खड़ी हो जाती है, जिससे कई बार हड़बड़ाहट में हादसे होने का अंदेशा बना रहता है। आम जनमानस के बीच यह सवाल लगातार गूँज रहा है कि काटे जाने वाले चालान की राशि नियमानुसार सीधे सरकारी खाते में जमा हो रही है या इसमें प्रक्रियागत ढिलाई का फायदा उठाया जा रहा है। चेकिंग के दौरान कर्मचारियों का पूरा ध्यान गाड़ियों के कागजात और चालान काटने पर रहता है, जबकि 100 मीटर की दूरी पर लगा लंबा जाम उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं दिखता।

शहर के दो सबसे महत्वपूर्ण पॉइंट—कॉलेज चौराहा और सिरमौर चौराहा—इस समय अव्यवस्था के सबसे बड़े केंद्र बने हुए हैं।

सिरमौर चौराहा पर ऑटो स्टैंड के आसपास और मुख्य सड़क के बीचों-बीच फल-सब्जी के ठेले वालों का कब्जा रहता है। जबकि बगल में ही मंडी संचालित है, फिर भी विक्रेता मुख्य मार्ग को घेरकर दुकानें सजाते हैं। सड़कों पर बेतरतीब खड़े ऑटो और ठेले मुख्य मार्ग की चौड़ाई को आधा कर देते हैं। नगर निगम का उड़नदस्ता कभी-कभार रूटीन कार्रवाई का दावा करता है, लेकिन इसका असर सड़कों पर ज्यादा देर तक देखने को नहीं मिलता।

प्रमुख क्षेत्र                          अव्यवस्था का मुख्य कारण                                    प्रभावित वर्ग
कॉलेज चौराहा                   निर्माण कार्य व डाइवर्जन का अभाव                         दैनिक यात्री व छात्र
सिरमौर चौराहा                 ठेले, अवैध ऑटो स्टैंड, फल विक्रेता                        आम राहगीर व खरीदार
यातायात थाने के सामने       अवैध पार्किंग व स्थायी/अस्थायी अतिक्रमण                वाहन चालक
रेटहरा मार्ग                        भारी वाहनों की एंट्री व संकरी सड़कें                   स्थानीय निवासी व व्यापारी

जय स्तंभ चौक से लेकर ढेकहा चौराहा तक: सुबह-सुबह लग जाता है 'फिल्मों' जैसा जाम
रीवा के मुख्य हृदय स्थल कहे जाने वाले जय स्तंभ चौक और ढेढ़हा चौराहा का सुबह 9 बजे से 11 बजे के बीच का नजारा किसी फिल्मी सीन से कम नहीं होता। इन अति-व्यस्त चौराहों पर ट्रैफिक संचालन के लिए तैनात कर्मचारी या तो नदारद रहते हैं या फिर उनकी मौजूदगी महज कागजों तक सीमित होती है।

शहर के अधिकांश ट्रैफिक सिग्नल या तो लंबे समय से बंद पड़े रहते हैं या फिर उन्हें सुचारू रूप से संचालित करने वाला कोई नहीं होता। जब चौराहों पर कोई ट्रैफिक कर्मी ही नजर नहीं आएगा, तो वाहन चालक अपनी मर्जी से वाहन निकालेंगे ही, जिससे घंटों का भीषण जाम आम बात बन गई है।

क्या वाकई शहर के जिम्मेदारों की नजर इन हालातों पर नहीं पड़ रही?
आम नागरिकों के मन में अब यह सवाल सुलगने लगा है कि क्या शहर का पूरा सिस्टम और जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सो रहे हैं? जनता का सीधा कहना है कि क्या यातायात प्रभारी और संबंधित अधिकारियों को शहर की इन बदहाल सड़कों पर फैलती अराजकता दिखाई नहीं देती? शहर की जनता और स्थानीय लोग दबी जुबान से यह सवाल पूछ रहे हैं कि यदि चौराहों पर ट्रैफिक दुरुस्त करने के बजाय सारा ध्यान सिर्फ औपचारिकता और चेकिंग के नाम पर चालान या वसूली तक ही सीमित रह जाएगा, तो फिर शहर की सूरत कैसे सुधरेगी?

विकास की राह में बड़ा रोड़ा बन रहा लचर ट्रैफिक प्रबंधन
रीवा लगातार प्रगति की ओर अग्रसर है, नए निर्माण कार्य हो रहे हैं और शहर का विस्तार भी हो रहा है। लेकिन यदि बुनियादी यातायात व्यवस्था ही इसी तरह लचर और बेलगाम बनी रही, तो यह विकास भी आम जनता के लिए किसी सजा से कम साबित नहीं होगा।

अब समय आ गया है कि जिला प्रशासन और उच्चाधिकारी इस मामले का संज्ञान लें। शहर के प्रमुख चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस की स्थाई तैनाती हो, ऑटो चालकों के रूट और आईडी का सत्यापन कड़ाई से किया जाए, और बंद पड़े सिग्नलों को तुरंत शुरू कराया जाए, ताकि रीवा की जनता को इस रोजाना के मानसिक तनाव और जाम से मुक्ति मिल सके।

बायपास पर ध्यान, शहर के अंदर अव्यवस्था: ड्यूटी से गायब जिम्मेदार?
स्थानीय लोगों का कहना है कि रीवा शहर के भीतरी प्रमुख चौराहों पर जहाँ ट्रैफिक पुलिस बल की उपस्थिति की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, वहाँ कर्मचारी अक्सर नदारद मिलते हैं। इसके उलट, शहर की सीमा पर स्थित बायपास मार्गों पर चेकिंग गतिविधियाँ ज्यादा तेज दिखती हैं। 
शहर के बीचोबीच ट्रैफिक पॉइंट खाली पड़े रहने के कारण वाहन चालक मनमर्जी से वाहन पार्क करते हैं और ओवरटेक करते हैं, जिससे सेकंडों में लंबा जाम लग जाता है। जिम्मेदारी तय न होने और ड्यूटी टाइमिंग में ढिलाई के कारण पूरे शहर की यातायात व्यवस्था रामभरोसे चल रही है।

थाने और आबकारी दुकानों के सामने अतिक्रमण: प्रशासन की चुप्पी पर उठते सवाल
रीवा शहर की यातायात अव्यवस्था का एक और पहलू यह है कि स्वयं यातायात थाने और सिविल लाइन थाने के आसपास के इलाकों में ही सड़कों पर अतिक्रमण पसरा हुआ है।

सड़कों पर खान-पान के ठेले: थाने के ठीक आसपास के इलाके में खाने-पीने के ठेले और दुकानें लगी रहती हैं, जो सड़कों तक अतिक्रमण कर लेती हैं।
मदिरा दुकानों के आसपास का हाल: शराब की दुकानों के आसपास वाहन बेतरतीब ढंग से खड़े कर दिए जाते हैं। देर शाम इन जगहों पर गाड़ियों की कतारें लग जाती हैं, जिससे आम महिलाओं और राहगीरों का गुजरना मुश्किल हो जाता है।
कार्रवाई का अभाव: जब जिम्मेदार थानों के आस-पास ही अतिक्रमण हटाने की स्थायी पहल नहीं हो पाती, तो शहर के बाकी हिस्सों में नियम पालन की उम्मीद करना बेमानी साबित होता है।

अस्पताल जाने का रास्ता भी ठप: एम्बुलेंस और इमरजेंसी गाड़ियों पर असर
रीवा विंध्य क्षेत्र का सबसे बड़ा स्वास्थ्य केंद्र है। यहाँ आसपास के जिलों से रोज सैकड़ों मरीज आते हैं। लेकिन शहर के मुख्य बाजारों और चौराहों पर लगने वाले जाम का सीधा असर इमरजेंसी सेवाओं पर पड़ रहा है। अक्सर देखा जाता है कि सिरमौर चौराहे से अस्पताल मार्ग की ओर जाने वाली एम्बुलेंस जाम में फँसकर सायरन बजाती रहती हैं, लेकिन संकरी हो चुकी सड़कों और अतिक्रमण के कारण वाहन चालकों के पास साइड देने तक की जगह नहीं होती। यह स्थिति किसी मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।

जनता की दो टूक: कब होगी ठोस कार्रवाई और व्यवस्था में सुधार?
विकास की दौड़ में शामिल हो रहे रीवा शहर के लिए यह लचर ट्रैफिक व्यवस्था एक बड़ा बट्टा बन चुकी है। यदि समय रहते यातायात विभाग के इन शीर्ष अधिकारियों ने अपनी कार्यशैली नहीं बदली और मैदानी अमले को सक्रिय नहीं किया, तो जनता का गुस्सा और अधिक फूट सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या उच्चाधिकारी इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए शहर की यातायात कमान को दुरुस्त करते हैं या फिर सब कुछ इसी तरह भगवान भरोसे चलता रहेगा?