रीवा से विंध्य तक महाघोटाला: कलेक्टर ऑफिस के पीछे सेंट्रल किचन का काला सच, सोता सिस्टम हिलाने वाली मिड-डे मील की जमीनी हकीकत!
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के रीवा जिले से शुरू हुआ मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) योजना—जिसका वर्तमान नाम प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (PM POSHAN) है—का यह मामला अब पूरे विंध्य संभाग में एक बड़े संगठित महाघोटाले के रूप में सामने आ रहा है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले मासूम बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य के साथ किस हद तक खिलवाड़ किया जा रहा है, इसकी पोल अब खुलने लगी है। रीवा जिला मुख्यालय पर कलेक्टर कार्यालय के ठीक पीछे संचालित होने वाला 'सेंट्रल किचन' भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी का मुख्य अड्डा बन चुका है।
रीवा से लेकर सीधी, सिंगरौली, पन्ना, सागर और अमरपाटन तक फैला 'सिंडिकेट'
यह पूरा काला कारोबार केवल रीवा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा पूरे विंध्य संभाग और आसपास के जिलों तक फैल चुका है। सूत्रों के अनुसार मऊगंज, सतना, मैहर,चित्रकूट, सीधी, सिंगरौली, पन्ना, सागर और अमरपाटन सहित कई अन्य जगहों पर भी इसी तर्ज पर मिड-डे मील के नाम पर बच्चों के निवाले पर डाका डाला जा रहा है। इन सभी जगहों पर एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है, जिसके तार आपस में जुड़े हुए हैं।
होटल संचालक मास्टरमाइंड और मुफ्त बिजली-किराए का संदिग्ध खेल
इस पूरे महाघोटाले के पीछे का असली मास्टरमाइंड एक नामी होटल संचालक बताया जा रहा है, जिसने रीवा और आसपास के जिलों में अपना पूरा सिंडिकेट जमा रखा है। सूत्रों का दावा है कि जहाँ यह खाना बनता है, वहाँ न तो किसी प्रकार का किराया चुकाया जाता है और न ही बिजली बिल का कोई अता-पता रहता है—हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। इस अवैध और बड़े खेल में स्कूल स्तर के लोग और शिक्षक भी पूरी तरह शामिल हैं। यह कोई छोटा-मोटा घोटाला नहीं है, बल्कि इसमें ऊपर से लेकर नीचे तक हर स्तर पर हिस्सेदारी फिक्स है।
पीएम पोषण शक्ति निर्माण (PM POSHAN): किन-किन क्षेत्रों में लागू होती है योजना?
मध्याह्न भोजन योजना (Mid-Day Meal), जिसका वर्तमान नाम प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (PM POSHAN) है, केवल नगर निगम क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के पात्र सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में लागू होती है। मध्य प्रदेश सरकार के योजना विवरण में भी इसका क्षेत्र Urban and Rural बताया गया है, जिसके प्रमुख प्रशासनिक दायरे निम्नलिखित हैं:
नगर निगम क्षेत्र:
नगर निगम की सीमा में आने वाले पात्र सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल। यहाँ कुछ जगहों पर भोजन स्कूल में बनता है और कुछ जगहों पर सेंट्रल किचन से पहुँचाया जा सकता है।
नगर पालिका और नगर परिषद क्षेत्र:
कस्बों और छोटे शहरी निकायों के पात्र सरकारी एवं सहायता प्राप्त स्कूल भी योजना के दायरे में आते हैं।
जनपद पंचायत क्षेत्र:
ग्रामीण ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले पात्र सरकारी स्कूल। इनके भोजन की व्यवस्था स्कूल स्तर पर या स्वीकृत आपूर्ति व्यवस्था के माध्यम से हो सकती है।
ग्राम पंचायत क्षेत्र:
गाँवों के पात्र प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल भी योजना में शामिल हैं। ग्राम पंचायत, स्कूल प्रबंधन और संबंधित विभाग की भूमिका स्थानीय व्यवस्था के अनुसार होती है।
सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार योजना का दायरा केवल इन चार प्रशासनिक श्रेणियों तक सीमित नहीं है। पात्र विशेष प्रशिक्षण केंद्रों और कुछ अन्य निर्धारित संस्थानों के लिए भी इसके विशेष प्रावधान हैं।
रीवा कलेक्टर ऑफिस के पीछे चल रहा खेल और प्रशासनिक नींद
सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आई है कि नगर निगम क्षेत्र, नगर परिषद, जनपद पंचायत क्षेत्रों, ग्राम पंचायतों और आंगनवाड़ियों में बच्चों की संख्या का फर्जी आंकड़ा तैयार करके करोड़ों रुपयों का गोलमाल किया जा रहा है। जिन जगहों पर वास्तविक रूप से केवल 8 से 10 बच्चे मौजूद होते हैं, वहाँ सरकारी दस्तावेजों और रजिस्टरों में 300 बच्चों की उपस्थिति दर्ज कर दी जाती है।
सबसे हैरानी की बात तो यह है कि यह पूरा अवैध कारोबार रीवा कलेक्टर ऑफिस के ठीक पीछे संचालित होने वाले सेंट्रल किचन से चलाया जा रहा है। क्या जिला प्रशासन और बड़े अधिकारियों को यह सब दिखाई नहीं देता या फिर वे कुंभकरण की नींद सो रहे हैं? रीवा संभाग के बड़े अधिकारियों की मिलीभगत से यह पूरा खेल फल-फूल रहा है।
मध्याह्न भोजन प्रभारी राजेश शुक्ला और अधिकारियों की 'महीना' सेटिंग
मध्याह्न भोजन प्रभारी राजेश शुक्ला द्वारा इस पूरे मैनेजमेंट को संभाला जा रहा है, जिन्हें प्रतिदिन के हिसाब से मोटा कमीशन पहुंच रहा है। इस महाघोटाले की जड़ें शिक्षा विभाग के दफ्तरों तक फैली हुई हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार, सेंट्रल किचन के ठेकेदार और शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों के बीच हर महीने लाखों रुपए की 'महीना सेटिंग' फिक्स है। डीईओ (DEO), बीआरसी (BRC) और मध्याह्न भोजन प्रभारी कभी भी औचक निरीक्षण के लिए नहीं आते। अगर कभी कोई टीम जाती भी है, तो ठेकेदार को पहले ही सूचना मिल जाती है और कागजी कोरम पूरा कर लिया जाता है।
गंगेव जनपद के बांस ग्राम का मामला: बच्चों की थाली से गायब भोजन
रीवा जिले के गंगेव जनपद अंतर्गत बांस ग्राम के शासकीय विद्यालयों से आए दृश्यों ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। यहाँ के स्कूलों में नौनिहालों को परोसी जाने वाली दाल में दाने ढूँढना मुश्किल हो गया है, चावल में कंकड़-पत्थर मिल रहे हैं, और सबसे शर्मनाक बात यह है कि बच्चों के पास भोजन करने के लिए स्कूल में थालियाँ तक उपलब्ध नहीं हैं।
प्राथमिक विद्यालय के लिए ₹6.78 और उच्च प्राथमिक विद्यालय के लिए ₹10.17 प्रति बच्चा शासन द्वारा निर्धारित होने के बावजूद भोजन की गुणवत्ता इतनी घटिया है कि बच्चों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ गया है। बांस ग्राम के इन विद्यालयों में भोजन की गुणवत्ता, चावल की स्थिति और थालियों की उपलब्धता की निष्पक्ष जाँच होना बेहद जरूरी है।
हकीकत बनाम सरकारी कागज: मीनू की धज्जियां और हल्दी वाला पीला पानी
सफेद शेरों की धरती कहे जाने वाले रीवा में अब इन 'सफेदपोश आदमखोरों' की नजर गरीब बच्चों के निवाले पर टिकी हुई है। सेंट्रल किचन से बनकर स्कूलों में पहुँचने वाला खाना किसी जहर या कचरे से कम नहीं है।
शासन का निर्धारित मेनू सेंट्रल किचन की जमीनी हकीकत
1. गाढ़ी, पौष्टिक व दाल-सब्जी 1. हल्दी और नमक मिला पीला पानी
2. गरम, मुलायम और पकी रोटियां 2. जानवरों के खाने लायक कच्ची रोटी
3. सप्ताह में विशेष पोषाहार 3. मीनू डायरी को कूड़े में फेंका
4. बच्चों का शारीरिक विकास 4. पढ़ाई के बजाय भूख से तड़पते बच्चे
दाल के नाम पर सिर्फ हल्दी और नमक घुला हुआ खौलता पीला पानी दिया जाता है, जिसमें दाल का एक दाना भी नहीं होता। रोटियां इतनी सूखी और कच्ची होती हैं कि मासूम बच्चे उन्हें चबा नहीं पाते। जब इस घटिया गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए जाते हैं, तो ठेकेदार बेशर्मी से कहते हैं कि "अगर बच्चे स्कूल नहीं आए, तो क्या खाना हम पशुओं को खिला दें?" यह बयान प्रशासनिक संवेदनशीलता पर करारा तमाचा है।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पूरे प्रदेश में सुशासन का दावा करते हैं। ऐसे में रीवा और विंध्य के गरीब बच्चों के निवाले पर डाका डालने वाले इन भ्रष्ट अधिकारियों, होटल संचालक मास्टरमाइंड और ठेकेदारों पर सख्त कार्रवाई कब होगी? रीवा कलेक्टर को भी यह समझना होगा कि इस गंभीर मामले में अब सिर्फ औपचारिक जांच कमेटियां गठित करने से काम नहीं चलेगा। शिकायतों का अंबार लग चुका है, सबूत सामने हैं। जरूरत है कि बिना किसी पूर्व सूचना के औचक निरीक्षण किया जाए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।