"विंध्य का 'डिजिटल कचरा' साफ़ करने का वक्त! मनीष पटेल, अविनाश तिवारी और शैलू शर्मा जैसे समाज बांटने वालों को No Views, No Likes, Only Boycott!"

 

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। विंध्य क्षेत्र, जो अपनी सांस्कृतिक समृद्धि और शालीनता के लिए जाना जाता है, इन दिनों सोशल मीडिया के एक नए और नकारात्मक दौर से गुजर रहा है। यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लोकप्रियता की अंधी दौड़ में कुछ स्थानीय इन्फ्लुएंसर्स ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। अविनाश तिवारी, मनीष पटेल और शैलू शर्मा जैसे नामों के साथ जुड़े हालिया विवादों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या 'व्यूज' और 'लाइक्स' सामाजिक शांति से बड़े हो गए हैं?

विवादों के घेरे में मनीष पटेल और अविनाश तिवारी: क्या है पूरा मामला? 
हाल ही में रीवा और आसपास के क्षेत्रों में मनीष पटेल के खिलाफ भारी जन आक्रोश देखा गया। आरोप है कि उनके वीडियो में एक विशेष समुदाय की महिलाओं और उनकी गरिमा को निशाना बनाया गया। यह पहली बार नहीं है; इससे पहले भी मनीष पटेल पर सैनिकों की पत्नियों और पुजारियों के प्रति अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप लग चुके हैं, जिसके कारण उन पर FIR भी दर्ज हुई है।

वहीं, अविनाश तिवारी का मामला भी कुछ अलग नहीं है। भगवान शिव के स्वरूप का उपयोग कर आपत्तिजनक गानों पर रील बनाना हो या नाई समाज की महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी, उनके कंटेंट ने समाज के विभिन्न वर्गों को उद्वेलित किया है। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग रचनात्मकता के बजाय वैमनस्य फैलाने के लिए अधिक किया जा रहा है।

शैलू शर्मा और सुधीर पांडेय: रील कल्चर का नकारात्मक पक्ष 
सोशल मीडिया की इस सूची में शैलू शर्मा का नाम भी चर्चा में रहा, जिन्होंने संजय गांधी अस्पताल जैसे संवेदनशील परिसर में वीडियो बनाकर विवाद मोल लिया। हालांकि, विरोध के बाद उन्होंने माफी मांग ली, लेकिन यह प्रश्न बना रहा कि क्या सार्वजनिक स्थानों की गरिमा सोशल मीडिया कंटेंट से कम महत्वपूर्ण है? इसी तरह, गायक सुधीर पांडेय द्वारा टीआरएस कॉलेज की छात्राओं पर की गई टिप्पणी ने भी छात्र राजनीति और समाज में उबाल ला दिया था।

आखिर क्यों बढ़ रही है विवादित कंटेंट की बाढ़? 
डिजिटल एल्गोरिदम की दुनिया बड़ी विचित्र है। अक्सर देखा गया है कि जो कंटेंट जितना विवादित होता है, उसे प्लेटफॉर्म उतना ही प्रमोट करते हैं।

  • ज्यादा व्यूज की भूख: विवाद पैदा करने से वीडियो तेजी से शेयर होते हैं।
  • कानूनी जानकारी का अभाव: कई युवा इन्फ्लुएंसर्स को यह पता ही नहीं होता कि उनकी एक रील उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा सकती है।
  • एल्गोरिदम का प्रभाव: भावनात्मक और भड़काऊ वीडियो को इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म ज्यादा लोगों तक पहुंचाते हैं।

रीवा पुलिस और प्रशासन ने अब अपनी रणनीति बदल ली है।

  • डिजिटल फुटप्रिंट ट्रैकिंग: अब केवल वीडियो हटा देने से काम नहीं चलेगा, पुराने रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।
  • आर्थिक चोट: भड़काऊ कंटेंट बनाने वालों के अकाउंट सस्पेंड कराने के लिए संबंधित प्लेटफॉर्म (Meta/Google) को सीधे पत्र लिखे जा रहे हैं।
  • कठोर धाराएं: केवल शांति भंग नहीं, बल्कि आईटी एक्ट और धार्मिक विद्वेष फैलाने की संगीन धाराओं के तहत गिरफ्तारियां सुनिश्चित की जा रही हैं।

विंध्य का गौरव बढ़ाने वाले इन्फ्लुएंसर्स भी हैं सक्रिय 
यह कहना गलत होगा कि विंध्य के सभी क्रिएटर्स एक जैसे हैं। इसी क्षेत्र से कई ऐसे प्रतिभाशाली कलाकार और इन्फ्लुएंसर्स भी निकले हैं जिन्होंने अपनी कला, लोक संस्कृति और स्थानीय मुद्दों को उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर विंध्य का नाम रोशन किया है। समस्या मुट्ठी भर उन लोगों से है जो विवाद को ही अपना करियर समझते हैं।

मनोवैज्ञानिक हमला: नई पीढ़ी पर गहरा खतरा 
ये वीडियो केवल 30 सेकंड की रील नहीं हैं, बल्कि ये समाज के मानस पटल पर गहरा प्रहार कर रहे हैं:

गलत रोल मॉडल: गाँव-देहात के युवा इन इन्फ्लुएंसर्स को देखकर यह सीख रहे हैं कि गाली देना या विवाद करना ही 'फेमस' होने का शॉर्टकट है।
नफरत का सामान्यीकरण: जब बार-बार किसी जाति या धर्म को निशाना बनाया जाता है, तो समाज में नफरत 'नॉर्मल' लगने लगती है, जो दंगे और तनाव की नींव रखती है।

प्रशासन की चेतावनी: अभिव्यक्ति की आजादी बनाम अपराध 
रीवा पुलिस और प्रशासन ने अब साफ कर दिया है कि 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का अर्थ किसी की धार्मिक या सामाजिक भावनाओं को आहत करना नहीं है। पुलिस की 'डिजिटल विंग' अब सक्रिय रूप से ऐसे अकाउंट्स पर नजर रख रही है जो समाज में तनाव पैदा कर रहे हैं। भड़काऊ पोस्ट करने वालों पर न केवल FIR दर्ज की जा रही है, बल्कि उनके अकाउंट्स को रिपोर्ट कर बंद कराने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।

सोशल मीडिया एक दोधारी तलवार है। यदि इसका उपयोग जिम्मेदारी से किया जाए तो यह बदलाव का माध्यम है, लेकिन यदि इसे समाज को बांटने के लिए इस्तेमाल किया गया तो इसके परिणाम घातक हो सकते हैं। एक समाज के रूप में हमारी जिम्मेदारी है कि हम ऐसे कंटेंट को बढ़ावा न दें और प्रशासन का सहयोग करें। 

पुलिस अपना काम करेगी, लेकिन समाज के तौर पर हमारी जिम्मेदारी सबसे बड़ी है। ऐसे लोगों को 'अनफॉलो' करना और उनके कंटेंट को रिपोर्ट करना ही सबसे बड़ा हथियार है। विंध्य की धरा को इन 'डिजिटल प्रदूषण' फैलाने वालों से बचाने के लिए हमें जागरूक होना होगा। याद रहे, आपका एक 'लाइक' किसी की नफरत को खाद-पानी दे सकता है।