रीवा की सड़कों पर अन्नदाताओं का खून: जब पुलिस का 'डंडा' भारी पड़ा और फिर बिस्किट-टॉफी बांटकर 'माफी' मांगी गई!
ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) रीवा जिले में खाद की किल्लत ने किसानों के लिए एक बड़ी समस्या खड़ी कर दी है। पिछले कई दिनों से खाद के लिए दिन-रात लाइन में खड़े किसानों को जब खाद नहीं मिली, तो उनका सब्र टूट गया और उन्होंने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस विरोध के जवाब में पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज कर दिया, जिससे कई किसान घायल हो गए। लेकिन इस घटना से भी ज्यादा चौंकाने वाली बात तब सामने आई, जब पुलिस ने अगले ही दिन लाठीचार्ज के बाद उन्हीं किसानों को बिस्किट और टॉफी बांटते हुए तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए। यह घटना न केवल किसानों के दर्द को दिखाती है, बल्कि रीवा के प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी कई सवाल खड़े करती है।
यह मामला सिर्फ एक लाठीचार्ज का नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जहाँ किसान अपनी सबसे बुनियादी जरूरत के लिए तरस रहे हैं। यह घटना बताती है कि जब सरकार और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल होते हैं, तो कैसे हालात बेकाबू हो जाते हैं। किसानों को बिस्किट और टॉफी बांटकर पुलिस ने एक तरह से उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया, क्योंकि किसान को बिस्किट नहीं, बल्कि अपनी फसल के लिए खाद चाहिए थी। यह घटना पूरे देश में कृषि क्षेत्र और किसानों की समस्याओं को दर्शाती है, जहाँ उन्हें सिर्फ प्राकृतिक आपदाओं का ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का भी सामना करना पड़ता है।
देखिए पुलिस की बिस्किट बांटने की तस्वीरें...
पुलिस का दावा बनाम किसानों की हकीकत
लाठीचार्ज के बाद, रीवा के पुलिस अधीक्षक (SP) विवेक सिंह ने दावा किया कि लाठीचार्ज किसानों पर नहीं, बल्कि कुछ असामाजिक तत्वों पर किया गया था, जो हालात को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इन उपद्रवियों ने अधिकारियों से माइक छीनने और साउंड सिस्टम गिराने की कोशिश की, और हमले की नीयत से मौके पर ईंटें भी जमा कर रखी थीं। एसपी का दावा था कि यह सब एक पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा था।
लेकिन पुलिस के इस दावे को मौके पर मौजूद किसानों ने पूरी तरह से खारिज कर दिया। किसानों का कहना है कि वहाँ कोई भी असामाजिक तत्व नहीं था, बल्कि सभी खाद की कमी से परेशान किसान ही थे। इनमें कई बुजुर्ग और महिलाएं भी शामिल थीं, जिन्हें लाठीचार्ज में चोटें आईं। किसानों ने सवाल किया कि अगर पुलिस के दावे सही थे, तो वे किसी भी असामाजिक तत्व को पहचान क्यों नहीं पाए और न ही किसी को गिरफ्तार कर पाए? यह दिखाता है कि पुलिस ने बिना सोचे-समझे और बेतरतीब तरीके से कार्रवाई की, जिसका खामियाजा निर्दोष किसानों को भुगतना पड़ा।
लाठीचार्ज से लेकर बिस्किट बांटने तक का पूरा घटनाक्रम
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत खाद के इंतजार से लाठीचार्ज तक की कहानी है।
4 दिन से लाइन में लगे किसान: रीवा जिले में पिछले चार दिनों से खाद की भारी कमी थी। किसान, जिनमें कई बुजुर्ग और महिलाएं भी थीं, रात 12 बजे से ही लाइन में लग जाते थे। वे सड़क पर ही सोने को मजबूर थे।
वितरण केंद्र बंद, किसान नाराज: घंटों इंतजार के बाद भी जब शाम तक खाद नहीं मिली और वितरण केंद्र बंद कर दिया गया, तो किसानों का गुस्सा भड़क गया। उन्होंने गेट पर जाकर विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी शुरू कर दी।
अचानक लाठीचार्ज: एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, एक किसान के नारेबाजी करने पर, वहां मौजूद थाना प्रभारी ने उसे समझाने की बजाय अचानक लाठीचार्ज शुरू करवा दिया। पुलिस ने किसानों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, जिससे कई लोग गिर पड़े और घायल हो गए।
लाठीचार्ज के बाद पुलिस का रुख कैसे बदला: इस घटना के बाद, जब मीडिया में इसकी खबरें आईं और चारों तरफ से आलोचना होने लगी, तो पुलिस ने अपनी छवि सुधारने के लिए एक अजीब कदम उठाया। अगले दिन, वे किसानों को बिस्किट और टॉफी बांटने लगे और उसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए।
यह घटनाक्रम दिखाता है कि पहले पुलिस ने किसानों पर सख्ती दिखाई और जब उन्हें लगा कि यह उनके लिए नकारात्मक छवि बना सकता है, तो उन्होंने जनता की सहानुभूति पाने के लिए यह कदम उठाया।
खाद की किल्लत: रीवा के किसानों की आपबीती
इस पूरे विवाद के केंद्र में खाद की कमी है। किसान अपनी फसल के लिए खाद पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। एक 70 साल के बुजुर्ग किसान भगवानदास यादव ने रोते हुए बताया कि वह चार दिन से लाइन में लगे थे और अब उनका शरीर जवाब दे रहा है। उन्हें चार दिन बाद टोकन तो मिला, लेकिन अब उनमें इतनी ताकत नहीं बची कि खाद उठाकर ले जा सकें।
वहीं, एक अन्य किसान शिवेंद्र तिवारी ने सरकार और प्रशासन पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा, "अगर खाद नहीं देना था तो लाइन में क्यों खड़ा किया? क्या पूरे जिले में सभी लाइन में लगे किसान असामाजिक तत्व हैं?" यह सवाल रीवा के हर उस किसान का दर्द बयां करता है, जो अपनी मेहनत से देश का पेट पालता है, लेकिन उसे ही सरकार की नीतियों और प्रशासनिक लापरवाही का शिकार होना पड़ता है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया: विपक्ष का हमला और सीएम की नाराजगी
इस घटना पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। कांग्रेस ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की। उन्होंने सवाल पूछा कि जब शराब की दुकानों में शराब खत्म नहीं होती, तो खाद वितरण केंद्रों में खाद कैसे खत्म हो जाती है? उन्होंने कहा कि किसान को टॉफी-बिस्किट नहीं, बल्कि खाद चाहिए।
वहीं, इस घटना के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी नाराजगी जताई। उन्होंने बैठक में कलेक्टरों को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर खाद वितरण सही नहीं हुआ, तो इसका मतलब है कि वे जिला नहीं चला पा रहे हैं और उन्हें हटाना पड़ेगा। यह दिखाता है कि सरकार भी इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ फटकार तक ही सीमित रहेगा, या इस पर कोई ठोस कार्रवाई भी होगी?
प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल और भविष्य की चुनौतियां
यह घटना केवल एक लाठीचार्ज का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है। खाद की किल्लत कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन इसे समय रहते न सुलझा पाना प्रशासन की बड़ी विफलता है। प्रभारी कलेक्टर ने कहा कि वे व्यवस्था सुधारने की कोशिश कर रहे हैं और किसानों से सहयोग की अपील की है, लेकिन जब तक खाद की नियमित आपूर्ति नहीं होगी, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसानों को समय पर और पर्याप्त मात्रा में खाद मिले, ताकि उन्हें इस तरह से लाइनों में खड़ा होकर अपमानित न होना पड़े।