विंध्य का सबसे बड़ा अस्पताल या दलालों का अड्डा? डॉक्टरों का नया 'कमीशन कोड'! पर्ची पर पैथोलॉजी नहीं, दलाल का पता लिख रहे साहब; रीवा के इस बड़े अस्पताल का पर्दाफाश

 

ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। विंध्य क्षेत्र के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र, संजय गांधी स्मृति अस्पताल (SGMH) और रीवा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल से एक बेहद शर्मनाक और अमानवीय लापरवाही का मामला सामने आया है। अस्पताल के भीतर स्थापित अत्यंत महत्वपूर्ण 'आर्टेरियल ब्लड गैस' (ABG) जांच मशीनें पिछले तीन दिनों से पूरी तरह ठप पड़ी हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इस तकनीकी खराबी को दूर करने के बजाय, अस्पताल के ही कुछ जिम्मेदार स्टाफ और डॉक्टरों ने इसे काली कमाई का जरिया बना लिया है।

अस्पताल के भीतर मरीजों का टेस्ट करने के बजाय, उनके लाचार परिजनों को बाहर घूम रहे दलालों के हाथों में सौंप दिया जा रहा है। विंध्य के दूर-दराज के इलाकों से आने वाले गरीब ग्रामीण अपने मरीजों की जान बचाने के लिए भटक रहे हैं और अस्पताल परिसर के ठीक बाहर अवैध रूप से खून के सेम्पल लिए जा रहे हैं।

सैकड़ों का टेस्ट और मनमाना रेट: सौरभ मेडिकल के सामने दलालों का खुला दरबार
अस्पताल के स्पेशल वार्ड (SPW) और सघन चिकित्सा इकाई (ICU) में भर्ती गंभीर मरीजों के परिजनों को डॉक्टर सीधे किसी अधिकृत पैथोलॉजी का पता नहीं बताते, बल्कि एक खास सिंडिकेट की तरफ इशारा करते हैं। परिजनों को निर्देश दिया जाता है कि वे अस्पताल के बाहर स्थित सौरभ मेडिकल स्टोर के पास जाएं, जहां 'संजय' नाम का एक दलाल पहले से मुस्तैद रहता है।

यह दलाल खुलेआम सड़क पर ही मरीजों के खून का सेम्पल लेता है। चंद सेकंड में होने वाली इस जांच की रिपोर्ट देने में वह जानबूझकर आधे से एक घंटे का समय लगाता है और प्रति जांच ₹600 की मोटी रकम नकद वसूलता है। सिर्फ एक ही दिन (रविवार) में लगभग 70 से 80 सेम्पल इस तरह सड़क पर लिए गए, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि यह कमीशनखोरी का खेल कितने बड़े पैमाने पर फल-फूल रहा है।

वेंटिलेटर पर लेटे तड़पते मरीजों के लिए क्यों जीवन-मरण का सवाल है एबीजी टेस्ट?
यह कोई सामान्य खून की जांच नहीं है जिसे टाला जा सके। एबीजी (ABG) जांच विशेष रूप से उन गंभीर मरीजों के लिए की जाती है जो वेंटिलेटर या आईसीयू में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे होते हैं। इस टेस्ट के जरिए मरीज के खून में मौजूद ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर और पीएच (pH) वैल्यू का सटीक पता चलता है।

इसी लाइव रिपोर्ट को देखने के बाद ही जीवन रक्षक दवाइयों की खुराक तय की जाती है। डॉक्टरों को हर दो से चार घंटे में यह रिपोर्ट चाहिए होती है। ऐसे में तड़पते हुए मरीज को आईसीयू में छोड़कर उसके बूढ़े माता-पिता या परिजन हर दो घंटे में ₹600 का इंतजाम करने और दलाल की मिन्नतें करने के लिए सड़क पर दौड़ने को मजबूर हैं।

स्विट्जरलैंड की सीमेंस कंपनी, भोपाल का सप्लायर और रीवा का संदिग्ध शार्टेज
मशीनें बंद होने के पीछे जो तकनीकी कारण बताया जा रहा है, वह रीवा चिकित्सा प्रबंधन की अदूरदर्शिता को उजागर करता है। इन मशीनों में रीएजेंट कार्टेज का उपयोग होता है, जिससे लगभग 750 टेस्ट किए जा सकते हैं। रीवा में इस्तेमाल होने वाली मशीनें अंतरराष्ट्रीय स्तर की सीमेंस (Siemens) कंपनी की हैं, जो स्विट्जरलैंड की है, और इसकी सप्लाई भोपाल की एक एजेंसी के माध्यम से होती है।

प्रबंधन का दावा है कि भोपाल से ही कार्टेज की किल्लत चल रही है। परंतु बड़ा सवाल यह है कि जब एक कार्टेज से सीमित संख्या में ही जांचें हो सकती हैं, तो बैकअप स्टॉक पहले से क्यों नहीं मंगाया गया? यह पहली बार नहीं है; इससे पहले भी मार्च और अप्रैल के महीनों में इसी तरह जानबूझकर कार्टेज खत्म होने का नाटक रचा गया था ताकि निजी दलालों की जेबें भरी जा सकें।

अस्पताल प्रबंधन और डीन की भूमिका: क्या शनिवार-रविवार की अनुपस्थिति महज इत्तेफाक है?
इस पूरे अमानवीय कृत्य के पीछे श्यामशाह मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. सुनील अग्रवाल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जब मार्च-अप्रैल में भी इसी सप्लायर कंपनी ने धोखा दिया था, तो उस पर कोई दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? ब्लैकलिस्ट करने के बजाय उसी लापरवाह कंपनी को दोबारा मौका क्यों दिया गया?

स्थानीय सूत्रों और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि जब भी वीकेंड (शनिवार और रविवार) आता है, डीन साहब रीवा मुख्यालय से नदारद हो जाते हैं। ठीक इसी समय अस्पताल के भीतर दलालों का नेटवर्क सबसे ज्यादा सक्रिय हो जाता है, क्योंकि उन्हें रोकने-टोकने वाला कोई शीर्ष अधिकारी दफ्तर में मौजूद नहीं होता।

लगातार बंद होती मशीनें और स्टोर में डंप पड़े जीवन रक्षक उपकरण
सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के निर्माण के दौरान सरकार ने करोड़ों रुपये के आधुनिक उपकरण और कई एबीजी मशीनें स्वीकृत की थीं। जमीनी हकीकत यह है कि उन महंगी मशीनों में से अधिकांश आज भी अस्पताल के धूल धूसरित स्टोर्स में डंप पड़ी हुई हैं।

जनता के टैक्स के पैसे से खरीदी गई संपत्तियों को जंग लगने के लिए छोड़ दिया गया है और केवल दो मशीनें चालू रखी गई थीं, जिन्हें भी कार्टेज का बहाना बनाकर बंद कर दिया गया। जब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग और रीवा संभाग आयुक्त इस पूरे मामले में उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित कर डॉक्टरों और बाहरी दलालों के कॉल डिटेल की जांच नहीं करेंगे, तब तक रीवा की गरीब जनता इसी तरह स्वास्थ्य माफियाओं का शिकार बनती रहेगी।