भ्रष्टाचार का 'गोरखधंधा': करोड़ों की दवा, महंगी दरें और बिना टेंडर का खेल; रीवा मेडिकल कॉलेज में जांच टीम की एंट्री से हड़कंप

 
श्याम शाह मेडिकल कॉलेज में अमृत फार्मेसी से बिना टेंडर महंगी दरों पर करोड़ों की दवा खरीदी की शिकायत के बाद जांच टीम ने दस्तावेजों को किया तलब।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा के प्रतिष्ठित श्याम शाह मेडिकल कॉलेज (SSMC) में भ्रष्टाचार की एक गहरी जड़ सामने आई है। सीएमएचओ कार्यालय के बाद अब मेडिकल कॉलेज में दवाओं की खरीद-फरोख्त में बड़े पैमाने पर अनियमितता की शिकायतें मिली हैं। आरोप है कि कॉलेज प्रबंधन ने नियमों को ताक पर रखकर चहेती फर्मों को फायदा पहुँचाने के लिए बाजार भाव से कई गुना अधिक कीमतों पर दवाइयां खरीदीं।

कमिश्नर की सख्ती: जेडी कोष एवं लेखा की टीम ने डाला डेरा
इस पूरे घोटाले की गूंज रीवा संभाग के कमिश्नर कार्यालय तक पहुँची। शिकायत की गंभीरता को देखते हुए कमिश्नर ने तत्काल संयुक्त संचालक (JD) कोष एवं लेखा को जांच के आदेश दिए। सोमवार को 5 सदस्यीय टीम मेडिकल कॉलेज पहुँची और वर्ष 2025-26 के दौरान हुई सभी खरीदारियों का रिकॉर्ड मांग लिया है।

  • जांच टीम में ये अधिकारी हैं शामिल:
  • सहायक संचालक अभयराज सिंह
  • समीर श्रीवास्तव
  • असिस्टेंट इंटरनल ऑडीटर मनीष कुमार त्रिपाठी
  • श्यामराज सिंह और अन्य कर्मचारी।

अमृत फार्मेसी से 'महंगा' नाता: लोकल पर्चेज का खेल
शिकायतकर्ताओं का मुख्य आरोप 'लोकल पर्चेज' यानी स्थानीय स्तर पर होने वाली खरीदी को लेकर है। बताया गया है कि अमृत फार्मेसी से जो दवाइयां खरीदी गईं, उनकी दरें सामान्य से कई गुना ज्यादा थीं। निविदाकारों ने सबूत के तौर पर उन दवाओं के नाम और बाजार दरों का विवरण भी कमिश्नर को सौंपा है, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि सरकारी खजाने को जानबूझकर लाखों का चूना लगाया गया।

बिना टेंडर करोड़ों का वारा-न्यारा
नियमों के मुताबिक, एक निश्चित राशि से अधिक की खरीदी के लिए टेंडर प्रक्रिया अनिवार्य है। लेकिन मेडिकल कॉलेज प्रशासन पर आरोप है कि उन्होंने बिना कोई टेंडर निकाले ही करोड़ों रुपए की दवाइयों के ऑर्डर दे दिए। इसे 'लोकल पर्चेज' की आड़ में किया गया ताकि पसंदीदा फर्मों को सीधा भुगतान किया जा सके।

जीसी की रोक के बावजूद नियमों को किया गया दरकिनार
हैरानी की बात यह है कि गवर्निंग काउंसिल (GC) की बैठक में पहले ही लोकल पर्चेज पर पाबंदी लगाने का निर्णय लिया गया था। इसके बावजूद, डीन कार्यालय ने इन नियमों को तोड़ते हुए करोड़ों की खरीदी जारी रखी। हालांकि बीच में विभाग के मंत्री से एक बार विशेष स्वीकृति मिली थी, लेकिन उसे स्थायी आधार मानकर बार-बार नियम तोड़े गए। अब जांच टीम ने उन नियमों की फाइल भी तलब की है जिसके तहत यह गैर-जरूरी छूट ली गई थी।

स्वास्थ्य विभाग (CMHO) में भी दवाओं की लूट, पर अधिकारी 'सेफ'
दवाओं का यह खेल केवल मेडिकल कॉलेज तक सीमित नहीं है। रीवा के स्वास्थ्य विभाग (CMHO कार्यालय) में भी जेम (GeM) पोर्टल के माध्यम से चुनिंदा फर्मों को लाभ पहुँचाने का मामला पुराना है। वहां भी लाखों की दवाइयां नियम विरुद्ध खरीदी गईं। क्षेत्रीय संचालक ने जांच टीम तो बनाई और एक सप्ताह में रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन आज तक वह जांच ठंडे बस्ते में है। अब देखना यह है कि क्या मेडिकल कॉलेज की जांच का भी यही हश्र होगा या दोषियों पर गाज गिरेगी।