सिस्टम का 'ब्लैक होल': रीवा सुपर स्पेशलिटी में 60% से ज्यादा पद खाली, मरीजों के साथ कब तक होगा मजाक?
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा की जनता को विंध्य के सबसे आधुनिक अस्पताल के सपने दिखाए गए थे। 170 करोड़ रुपए खर्च कर अतिरिक्त भवन (एक्सटेंशन बिल्डिंग) का निर्माण भी हो रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ईंट और पत्थरों की दीवारें मरीजों का इलाज करेंगी? अस्पताल की भव्यता तो बढ़ रही है, लेकिन इसके भीतर जान बचाने वाले 'भगवान' यानी डॉक्टरों का घोर अभाव है।
डिप्टी सीएम के 'पावर' पर भारी पड़ रही अव्यवस्था
हैरानी की बात यह है कि वर्तमान में डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला के पास ही चिकित्सा शिक्षा विभाग का जिम्मा है। इसके बावजूद वह अपने ही शहर के सबसे महत्वपूर्ण अस्पताल के लिए पर्याप्त चिकित्सकों की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। वर्ष 2019 से संचालित इस अस्पताल में करोड़ों का बजट आ रहा है, लेकिन डॉक्टर यहाँ आने को तैयार नहीं हैं।
आंकड़ों की हकीकत: 119 पद खाली, 29 सीनियर के भरोसे अस्पताल
अस्पताल के भीतर पदों का गणित बेहद डरावना है। स्वीकृत 187 पदों में से केवल 68 पर ही नियुक्तियां हैं। इसमें भी यदि हम जूनियर (JR) और सीनियर रेजिडेंट (SR) को हटा दें, तो केवल 29 मुख्य विशेषज्ञ चिकित्सक ही शेष बचते हैं।
अस्पताल में पदों का वर्तमान स्टेटस:
| पद का नाम | स्वीकृत पद | कार्यरत | रिक्त पद |
| प्रोफेसर | 25 | 04 | 21 |
| एसोसिएट प्रोफेसर | 25 | 07 | 18 |
| असिस्टेंट प्रोफेसर | 50 | 12 | 38 |
| मेडिकल ऑफिसर | 06 | 06 | 00 |
| सीनियर रेजिडेंट (SR) | 54 | 19 | 35 |
| जूनियर रेजिडेंट (JR) | 27 | 20 | 07 |
| कुल योग | 187 | 68 | 119 |
क्यों पलायन कर रहे हैं डॉक्टर?
सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में डॉक्टरों के आने से ज्यादा जाने का सिलसिला तेज है। पिछले साल डॉ. राकेश सोनी, डॉ. विवेक शर्मा (यूरोलॉजी) और डॉ. विजय शुक्ला जैसे विशेषज्ञों ने इस्तीफा दे दिया। सूत्रों की मानें तो अस्पताल का 'खराब प्रबंधन' और काम करने के माहौल की कमी डॉक्टरों को भागने पर मजबूर कर रही है। आरोप है कि डीन और स्थानीय प्रबंधन की कार्यप्रणाली इस अव्यवस्था की मुख्य जड़ है।
मरीजों का बढ़ता बोझ: इलाज कम, इंतज़ार ज़्यादा
अस्पताल में ओपीडी मरीजों की संख्या साल-दर-साल तेजी से बढ़ रही है, लेकिन डॉक्टर कम होते जा रहे हैं।
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2023-24: 98,177 मरीज
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2024-25: 1,09,135 मरीज
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2025-26: 1,42,839 मरीज (सर्वाधिक)
इतनी भारी भीड़ को संभालने के लिए विशेषज्ञों की टीम आधी भी नहीं है। आयुष्मान योजना और नगद भुगतान के बावजूद मरीजों को वह सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं, जिसका वादा किया गया था।
क्या सुधरेगी स्वास्थ्य व्यवस्था?
7 साल बीत जाने के बाद भी अगर किसी अस्पताल में 60% से अधिक विशेषज्ञों के पद खाली हों, तो उसे 'सुपर स्पेशलिटी' कहना जनता के साथ मजाक है। नए भवन पर 170 करोड़ खर्च करना तभी सार्थक होगा जब उन इमारतों में बैठने के लिए पर्याप्त डॉक्टर उपलब्ध होंगे।