रीवा में मचा हड़कंप! ₹2.5 करोड़ के छात्रावास फर्जीवाड़े की आंच पहुंची एडीएम तक, संभाग आयुक्त को भेजा एक्शन लेटर

 

ऋतुराज द्विवेदी (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के रीवा जिले के आदिम जाति कल्याण विभाग में सामने आए विशालकाय वित्तीय घोटाले ने संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है। जिले भर में संचालित अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के छात्रावासों की सूरत बदलने, बिजली-पानी की व्यवस्था सुधारने और छात्र-छात्राओं के लिए मूलभूत जरूरत का सामान खरीदने के नाम पर आवंटित ₹2.5 करोड़ के बजट को सांठगांठ करके कागजों में ही ठिकाने लगा दिया गया।

शुरुआती दौर में यह मामला सिर्फ एक सामान्य विभागीय लापरवाही लग रहा था। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह बात पूरी तरह साफ हो गई कि यह घोटाला कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि अधिकारियों और कर्मचारियों के गठजोड़ से चलाया जा रहा एक संगठित भ्रष्टाचार था। छात्रावासों में रह रहे छात्र एक-एक बाल्टी पानी और रोशनी के लिए तरसते रहे और कागजों पर उनके लिए लाखों रुपये के सामान की खरीदारी दर्शा दी गई।

जांच की आंच से अफसरशाहों में खलबली: एडीएम पीके पांडे की भूमिका पर क्यों उठे सवाल?
घोटाले की भनक लगते ही शुरू में विभागीय क्लर्कों पर गाज गिरी थी। विभाग के दो बाबुओं—विकास तिवारी और पटेल बाबू को निलंबित करके मामले को शांत करने का प्रयास हुआ। लेकिन जब फाइलों की ऑडिटिंग का दायरा बढ़ाया गया, तो यह बात सामने आई कि करोड़ों रुपये की वित्तीय स्वीकृतियां उच्च पदस्थ अधिकारियों के हस्ताक्षर और सहमति के बिना संभव ही नहीं थीं।

वर्तमान में मऊगंज में पदस्थ अपर जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) पीके पांडे, जो पूर्व में इस विभाग के दायित्वों से जुड़े रहे थे, अब सीधी जांच की परिधि में आ गए हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी बिलों के सत्यापन और फंड रिलीज करने की प्रक्रिया में विभागीय नियमों और वित्तीय संहिताओं की अनदेखी की। यद्यपि एडीएम पीके पांडे ने कारण बताओ नोटिस का उत्तर दिया है, परंतु रीवा जिला प्रशासन उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ। इसी आधार पर रीवा कलेक्टर द्वारा एडीएम के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का औपचारिक प्रस्ताव संभाग आयुक्त (कमिश्नर) को भेजा गया है।

कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी की सख्त कार्रवाई और जांच समिति की चौंकाने वाली रिपोर्ट
रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने मामले का संज्ञान लेते हुए तत्काल एक निष्पक्ष और अधिकार-संपन्न जांच समिति का गठन किया। इस समिति की रिपोर्ट ने सरकारी दावों की धज्जियां उड़ा दीं।

जांच समिति द्वारा छात्रावासों में किए गए भौतिक सत्यापन (Physical Verification) में निम्नलिखित मुख्य अनियमितताएं उजागर हुईं:

  • बिना काम किए फर्जी भुगतान: दर्जनों छात्रावासों में न तो प्लंबिंग का काम हुआ, न ही पुताई या बिजली सुधार, लेकिन इसके करोड़ों के बिल पास कर दिए गए।
  • फर्जी वेंडरों को पेमेंट: कई ऐसे वेंडरों और सप्लायरों के नाम पर चेक व ई-पेमेंट जारी किए गए जिनका धरातल पर कोई अस्तित्व ही नहीं था।
  • कोटेशन और टेंडर प्रक्रिया का उल्लंघन: चहेते ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए सरकारी नियमों को दरकिनार कर सीधे भुगतान किए गए।

शिकायतकर्ता कमला सिंह बघेल का संघर्ष 
किसी भी प्रशासनिक घोटाले को उजागर करने में जागरूक नागरिकों और मीडिया की सजगता सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस पूरे फर्जीवाड़े को सामने लाने में स्थानीय शिकायतकर्ता कमला सिंह बघेल की हिम्मत का बड़ा योगदान रहा। उन्होंने छात्रावासों की बदहाली और कागजी भुगतानों के ठोस साक्ष्य जुटाकर कलेक्टर कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई।

इसके साथ ही, रीवा न्यूज़ मीडिया ने इस मामले को लगातार प्रमुखता से उठाया और खोजी रिपोर्टिंग के जरिए फाइलों में दबे सच को जनता के सामने रखा। मीडिया के लगातार दबाव के कारण ही जांच ठंडे बस्ते में जाने से बची और वरिष्ठ अधिकारियों पर कार्रवाई का रास्ता साफ हो सका।

बिना मरम्मत और फर्जी बिलिंग: कैसे अंजाम दिया गया वित्तीय हेराफेरी का यह खेल?
सरकारी विभागों में छात्रावासों के रख-रखाव के लिए प्रतिवर्ष विकास निधि जारी की जाती है। आदिम जाति कल्याण विभाग रीवा में भ्रष्टाचार का यह खेल बेहद शातिराना तरीके से खेला गया:

काल्पनिक मांग पत्र तैयार करना: सबसे पहले छात्रावासों से काल्पनिक आवश्यकताओं और मरम्मत कार्यों की सूची बनाई जाती थी।
फर्जी बिलिंग और वेंडर साठगांठ: इसके बाद अपने परिचित या फर्जी वेंडरों के नाम से सामग्री आपूर्ति और मरम्मत कार्य के फर्जी बिल तैयार किए जाते थे।
निरीक्षण के बिना स्वीकृति: सक्षम अधिकारियों द्वारा बिना किसी भौतिक निरीक्षण के बिलों पर हस्ताक्षर कर सरकारी खजाने से धनराशि जारी कर दी जाती थी।

रीवा छात्रावास घोटाले से जुड़े मुख्य बिंदु और प्रशासनिक तथ्य
मामला और वित्तीय आकार: आदिम जाति कल्याण विभाग, रीवा के छात्रावासों में लगभग ₹2.5 करोड़ रुपये का गबन।

  • जांच के दायरे में आए मुख्य चेहरा: निलंबित बाबू विकास तिवारी और पटेल बाबू के साथ-साथ तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारी एवं वर्तमान मऊगंज एडीएम पीके पांडे।
  • कलेक्टर का कड़ा रुख: रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी द्वारा जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर एडीएम पीके पांडे के खिलाफ दंडात्मक व अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव कमिश्नर को प्रेषित।
  • शिकायतकर्ता एवं मीडिया का योगदान: शिकायतकर्ता कमला सिंह बघेल के तथ्यों और मीडिया की खोजी रिपोर्टिंग से उजागर हुआ प्रशासनिक फर्जीवाड़ा।
  • वर्तमान प्रशासनिक स्थिति: दो कर्मचारियों का तत्काल निलंबन हो चुका है, जबकि उच्च अधिकारियों पर निर्णय के लिए मामला अब कमिश्नर स्तर पर विचाराधीन है।

जनता और छात्रों के भविष्य पर असर: व्यवस्था सुधार के लिए प्रशासनिक सुधार क्यों जरूरी?
इस प्रकार के घोटालों का सबसे भयावह पक्ष यह है कि इसका सीधा नुकसान उन गरीब, आदिवासी और वंचित बच्चों को उठाना पड़ता है जो बेहतर शिक्षा की उम्मीद में घर छोड़कर छात्रावासों में रहने आते हैं। जब उनके रहने, खाने और पढ़ने के पैसों पर डाका डाला जाता है, तो पूरी व्यवस्था पर से जनता का विश्वास उठने लगता है।

रोकथाम हेतु आवश्यक सुधारात्मक कदम:

  • डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली: छात्रावासों के सभी मरम्मत कार्यों और भुगतानों को जीपीएस-टैग फोटो और ऑनलाइन पोर्टल से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए।
  • सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit): छात्रों, अभिभावकों और स्वतंत्र नागरिक समितियों को मिलाकर नियमित रूप से छात्रावासों का सोशल ऑडिट कराया जाए।
  • जवाबदेही और कठोर दंड: केवल निलंबन या तबादला ही काफी नहीं है; गबन की गई राशि की वसूली आरोपियों की व्यक्तिगत संपत्ति से की जानी चाहिए।