नेशनल हॉस्पिटल में उपचार का लाइसेंस या मौत का परमिट : इलाज के नाम पर 'ओवरडोज' और गलत इंजेक्शन
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) रीवा शहर के नेशनल अस्पताल में उस समय चीख-पुकार मच गई, जब ग्राम दिठौरा (पोस्ट ककलपुर) की निवासी श्रीमती कामनी सोंधिया (पति: सुनील सोंधिया) ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। 28 वर्षीय कामनी, जो कुछ घंटों पहले तक स्वस्थ दिख रही थीं, उनकी अचानक मौत ने अस्पताल प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया है। स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले में इस तरह की घटना होना पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है।
परिजनों के आरोप: लापरवाही, बेड की कमी और गलत इंजेक्शन
मृतक के परिजनों ने डॉ. अखिलेश पटेल और अस्पताल प्रबंधन पर "इलाज नहीं, हत्या" का आरोप लगाया है। उनके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- इंतजार की सजा: परिजनों का दावा है कि वे दोपहर 3 बजे से मरीज को भर्ती कराने के लिए भटकते रहे, लेकिन अस्पताल ने 'बेड खाली नहीं है' का बहाना बनाकर शाम तक इलाज शुरू नहीं किया।
- दवाओं का जानलेवा डोज: आरोप है कि नर्सों के बीच इंजेक्शन को लेकर असमंजस था। अंततः जो इंजेक्शन दिया गया, उसके तुरंत बाद कामनी की आँखें फैल गईं और उसे उल्टियाँ होने लगीं। परिजनों का कहना है कि यह दवाओं का ओवरडोज और गलत इंजेक्शन था।
अस्पताल का बचाव: 'लीवर फेलियर' बना ढाल
हंगामे के बीच डॉ. अखिलेश पटेल और अस्पताल प्रबंधन ने अपनी सफाई पेश की। उनका तर्क है कि:
- गंभीर बीमारी: मरीज पिछले 6 महीनों से 'डीकंपेन्सेटेड लीवर' (अत्यंत खराब लीवर) से जूझ रही थी। सीटी स्कैन में लीवर, आंतों और स्प्लीन में भारी संक्रमण पाया गया था।
- इमरजेंसी रिस्पॉन्स: अस्पताल का कहना है कि भर्ती के वक्त मरीज का बीपी (Blood Pressure) काफी कम था। उसे हार्ट अटैक आया, जिसके बाद सीपीआर (CPR) और वेंटिलेटर का सहारा लिया गया, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका।
प्रशासनिक दखल: पुलिस का आश्वासन और न्याय की उम्मीद
देर रात तक चले हंगामे के बाद एसडीओपी उमेश प्रजापति पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे। उन्होंने आक्रोशित परिजनों को समझाकर शांत कराया। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि यदि पोस्टमार्टम रिपोर्ट या जाँच में मेडिकल लापरवाही की पुष्टि होती है, तो दोषियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
समाज और सिस्टम से कड़वे सवाल
यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है:
नेताओं की चुप्पी: चुनाव में समाज के नाम पर वोट मांगने वाले 'ठेकेदार' आज सोंधिया समाज की इस बेटी के लिए क्यों नहीं बोल रहे?
लाइसेंस या मौत का परमिट: क्या रीवा के इन निजी अस्पतालों की जाँच सिर्फ कागजों पर होती है? हर कुछ दिनों में यहाँ से निकलने वाली लाशों का हिसाब कौन देगा?
डॉक्टर की जिम्मेदारी: क्या डॉ. अखिलेश पटेल को मरीज की नाजुक स्थिति का अंदाजा नहीं था? या दवाओं का डोज तय करने में चूक हुई?