1 करोड़ का ऑफर ठुकरा कर बोले पीड़ित पिता- 'बेटी की मौत का सौदा नहीं करूंगा', रीवा अस्पताल कांड में NHRC का बड़ा एक्शन! ऑडियो लीक से भोपाल तक हड़कंप!
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के रीवा स्थित संजय गांधी स्मृति अस्पताल में चिकित्सा लापरवाही का एक गंभीर मामला सामने आया है। यहाँ 22 वर्षीय प्रसूता कल्पना मिश्रा और उनके नवजात शिशु की इलाज के दौरान मृत्यु हो गई। इस दुखद घटना के बाद से ही क्षेत्र में काफी आक्रोश देखा जा रहा है। पीड़ित परिवार ने अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों पर गंभीर लापरवाही बरतने के आरोप लगाए हैं। इस घटना ने न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि संपूर्ण राज्य के स्वास्थ्य तंत्र की व्यवस्थाओं पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
सौदाबाजी के आरोप और पीड़ित पिता का सख्त रुख
मृतका के पिता रामशिरोमणि मिश्रा ने बेहद गंभीर और चौंकाने वाले दावे किए हैं। उनका आरोप है कि मामले को दबाने और कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए उन्हें पहले 50 लाख रुपए और बाद में 1 करोड़ रुपए तक की भारी रकम की पेशकश की गई।
पिता का स्पष्ट कहना है कि वह अपनी बेटी की असमय मौत का सौदा किसी भी कीमत पर नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, "मेरी 22 साल की बेटी और उसके बच्चे को लापरवाही के कारण छीन लिया गया। यह केवल मेरी बेटी का सवाल नहीं है, बल्कि समाज की हर उस बेटी का मामला है जो इलाज के लिए अस्पतालों में जाती है।" सार्वजनिक हुए बातचीत के विवरण के अनुसार, मध्यस्थता करने की कोशिश कर रहे लोगों को पिता ने दोटूक जवाब दिया कि उन्हें राजनीतिक रसूख या आर्थिक प्रलोभन से कोई लेना-देना नहीं है; वे केवल कानूनी न्याय चाहते हैं।
सिरमौर चौराहे पर आमरण अनशन और बिगड़ती सेहत
न्याय की मांग को लेकर मृतका के पिता रीवा शहर के व्यस्त सिरमौर चौराहे पर लगातार भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं। अनशन के कई दिन बीत जाने के कारण उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा है। चिकित्सकों और परिजनों की चिंताओं के बावजूद, उन्होंने अन्न का एक दाना भी ग्रहण करने से इनकार कर दिया है। पीड़ित पिता का कहना है कि यदि प्रशासन और सरकार दोषियों के खिलाफ कड़ी और ठोस कार्रवाई नहीं करती है, तो वह अनशन स्थल पर ही अपने प्राणों की आहुति दे देंगे। उनके इस संकल्प को देखते हुए स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का समर्थन भी लगातार बढ़ रहा है।
राजनीतिक गलियारों में उबाल और भोपाल तक प्रदर्शन
इस दुखद घटना ने मध्य प्रदेश की राजनीति में भी तूल पकड़ लिया है। विपक्षी दलों ने प्रदेश सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर तीखे हमले बोले हैं।
कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा को भोपाल पुलिस ने उठाया
- विधायक का प्रदर्शन: सेमरिया क्षेत्र के कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा ने इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से जांच कराने और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर भोपाल में मंत्रालय के समक्ष विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।
- वरिष्ठ नेताओं के बयान: पूर्व मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ राजनेताओं ने अस्पताल प्रबंधन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि संजय गांधी अस्पताल लगातार विवादों में रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।
मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग का कड़ा संज्ञान
मामला केवल स्थानीय स्तर तक सीमित न रहकर अब राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय संवैधानिक संस्थाओं तक पहुँच चुका है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC): आयोग ने प्राप्त शिकायत पर संज्ञान लेते हुए मामले को प्राथमिक दृष्टया मानवाधिकारों और जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना है। NHRC ने मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव तथा रीवा कलेक्टर को औपचारिक नोटिस जारी कर 2 सप्ताह के भीतर विस्तृत जांच और कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही, मेडिकल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं।
राज्य महिला आयोग: महिला आयोग में भी मामले की स्वतंत्र जांच के लिए शिकायत दर्ज कराई गई है। याचिकाकर्ता ने राज्य स्वास्थ्य विभाग द्वारा गठित की गई 7-सदस्यीय जांच समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं और किसी तटस्थ एजेंसी से जांच कराने की मांग की है।
अस्पताल प्रशासन और व्यवस्था पर उठते सवाल
संजय गांधी अस्पताल रीवा संभाग का सबसे बड़ा चिकित्सा संस्थान माना जाता है। यहाँ प्रतिदिन सैकड़ों मरीज इलाज के लिए आते हैं। हालांकि, हालिया घटनाक्रम ने अस्पताल की आपातकालीन सेवाओं, मातृ सुरक्षा इंतजामों और डॉक्टरों की उपस्थिति प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि अस्पताल में समुचित देखरेख और समय पर इलाज न मिलने के कारण आए दिन मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
डिप्टी सीएम के आश्वासन पर परिजनों की प्रतिक्रिया
राज्य के उपमुख्यमंत्री एवं स्थानीय जनप्रतिनिधि ने अनशन स्थल पर पहुँचकर पीड़ित पिता और उनके परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने निष्पक्ष जांच कराने का आश्वासन देते हुए अनशन समाप्त करने का अनुरोध किया। हालांकि, पीड़ित पिता ने इस आश्वासन को केवल औपचारिक करार दिया और अनशन समाप्त करने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि जब तक जिम्मेदार डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ निलंबन और कानूनी एफआईआर जैसी प्रत्यक्ष कार्रवाई नहीं दिखती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
लीक फोन कॉल: 'ले-देकर' मामला दबाने की कोशिश पर पिता का आक्रोश
मामले में उस वक्त एक नया मोड़ आया जब पीड़ित पिता रामशिरोमणि मिश्रा और एक स्थानीय नेता के बीच हुई बातचीत का विवरण सार्वजनिक हुआ। आरोप है कि मामले को रफा-दफा करने के लिए परिवार को आर्थिक प्रलोभन देने का प्रयास किया गया।
बातचीत के मुख्य अंश:
नेता का सवाल: "आपकी क्या मांग है, आप क्या बजट चाहते हैं बताइए?"
- पिता का करारा जवाब: "आप यह कैसी बातें कर रहे हैं? मुझे किसी पार्टी, मंत्री, विधायक या सांसद से कोई मतलब नहीं है। मेरी 22 साल की बेटी की लापरवाही से जान गई है, उसकी हत्या की गई है। जो व्यक्ति इस दुख की घड़ी में सौदेबाजी कर रहा है, उसे शर्म आनी चाहिए।"
- पिता का स्पष्ट रुख: "मुझे केवल और केवल न्याय चाहिए। यदि दोबारा किसी ने पैसों से मेरी बेटी की मौत को तौलने की कोशिश की, तो मैं इसका कड़ा विरोध करूंगा।"
इस बातचीत के उजागर होने के बाद जन-आक्रोश और अधिक भड़क गया है।
सरकार पर तीन तरफ से बढ़ा चौतरफा दबाव
इस संवेदनशील मामले में राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर तीन प्रमुख मोर्चों से दबाव बना हुआ है:
- पीड़ित परिवार का अनशन: मृतका के पिता न्याय की मांग को लेकर लगातार छठवें दिन भी आमरण अनशन पर डटे हुए हैं और सौदाबाजी के दावों को उजागर कर सख्त सजा की मांग कर रहे हैं।
- प्रशासनिक व अनुशासनात्मक कार्रवाई: अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारियों और मेडिकल स्टाफ के खिलाफ गाज गिरना शुरू हो गई है।
- संवैधानिक संस्थाओं का हस्तक्षेप: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राज्य महिला आयोग ने मामले की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए जांच शुरू कर दी है।
अस्पताल प्रबंधन पर गिरी गाज: 4 निलंबित, डीन व अधीक्षक हटे
मामले की गंभीरता और बढ़ते जन-आक्रोश को देखते हुए शासन स्तर पर त्वरित कार्रवाई की गई है। अस्पताल के 6 प्रमुख लोगों के खिलाफ दंडात्मक कदम उठाए गए हैं:
- लापरवाही के आरोप में 4 स्वास्थ्य कर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।
- प्रशासनिक विफलता मानते हुए संजय गांधी अस्पताल के डीन और चिकित्सा अधीक्षक को उनके पदों से हटा दिया गया है।
- इसके बावजूद परिजनों और प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई नाकाफी है और दोषियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और महिला आयोग की सख्त कार्रवाई
न्याय की इस लड़ाई में अब देश की शीर्ष संस्थाएं भी शामिल हो गई हैं:
मानवाधिकार आयोग का कदम (केस नंबर 1823/12/36/2026): डॉ. दिव्यांश द्विवेदी की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए NHRC की पीठ ने मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव और रीवा कलेक्टर को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आयोग ने इसे प्रथम दृष्टया जीवन के अधिकार और मानवाधिकारों के हनन का मामला मानते हुए 2 सप्ताह के भीतर विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट (CAR) प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। साथ ही मेडिकल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सुरक्षित रखने और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं का ऑडिट कराने के आदेश दिए हैं।
महिला आयोग में शिकायत (रसीद सं. 2014111847959): सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में भोपाल से भेजी गई 7-सदस्यीय जांच टीम की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं। मांग की गई है कि मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए।
'जस्टिस फॉर कल्पना': सोशल मीडिया पर उठी न्याय की आवाज
सड़क से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म तक इस घटना को लेकर न्याय की मांग गूंज रही है। सोशल मीडिया पर #JusticeForKalpana अभियान के तहत हजारों लोग अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।
मृत्यु से पूर्व अस्पताल परिसर के वीडियो और तस्वीरें साझा कर आम जनता, छात्र संगठन और विभिन्न सामाजिक संस्थाएं पीड़ित परिवार के समर्थन में आगे आई हैं। रीवा के सिरमौर चौराहे पर चल रहे अनशन को स्थानीय लोगों का व्यापक समर्थन मिल रहा है।
अनशन स्थल पर अडिग पिता: न्याय मिलने तक जारी रहेगी जंग
स्वास्थ्य बिगड़ने और डॉक्टरों की चेतावनियों के बावजूद रामशिरोमणि मिश्रा अनशन स्थल पर डटे हैं। उनका कहना है कि यह लड़ाई अब केवल उनकी बेटी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर उस परिवार की लड़ाई है जो सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने आता है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि दोषियों को सख्त से सख्त सजा नहीं मिली तो वह अनशन स्थल पर ही अपने प्राण त्याग देंगे।