रीवा में 'डॉक्टर डकैत' गैंग! कानून, नैतिकता सब फेल; निजी अस्पताल बने लूट का अड्डा

 
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ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) रीवा शहर में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होमों का एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है, जो मरीजों के इलाज के नाम पर उनकी जेबों को बेखौफ होकर काट रहा है। एक समय था जब निजी अस्पताल कुछ ही थे, लेकिन आज यह शहर "कुकुरमुत्ते की तरह उग आए" अस्पतालों से अटा पड़ा है। यह सिर्फ एक भौगोलिक विस्तार नहीं है, बल्कि यह अनैतिकता, भ्रष्टाचार और खुलेआम कानून के उल्लंघन की एक पूरी कहानी है। ये अस्पताल न केवल भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI) और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) के नैतिकता कोड की धज्जियां उड़ा रहे हैं, बल्कि मरीजों के उपभोक्ता अधिकारों और मानवीय गरिमा का भी मज़ाक बना रहे हैं। यह एक ऐसा संगठित अपराध है, जहाँ सफेद कोट पहने लोग मरीजों को लूटने का काम कर रहे हैं, और प्रशासन आंखें मूंदे हुए है।

अनियमितता का सिंडिकेट: इलाज के नाम पर ₹1 लाख का फटका क्यों?
रीवा के निजी अस्पतालों में मरीज जब किसी सामान्य बीमारी जैसे बुखार या खांसी का इलाज कराने पहुँचता है, तो उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी जाती है। यह सलाह इलाज के लिए नहीं, बल्कि बिना वजह बिल बढ़ाने के लिए दी जाती है। जैसे ही मरीज भर्ती होता है, अनावश्यक जाँचों का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। चाहे उस जाँच की कोई मेडिकल आवश्यकता हो या न हो, मरीजों से ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट, एक्स-रे, ईसीजी और न जाने क्या-क्या करवाया जाता है। यह सब कुछ सिर्फ और सिर्फ बिल को ₹5,000 से ₹10,000 से सीधे ₹1 लाख तक पहुँचाने के लिए किया जाता है। मरीजों के परिजन बिल देखकर हैरान रह जाते हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

रीवा में निजी अस्पताल मरीजों से पैसे कैसे लूटते हैं? इस तरह की जबरन भर्ती और अनावश्यक जाँचें Clinical Establishments Act, 2010 और Consumer Protection Act, 2019 दोनों का उल्लंघन है। इन दोनों कानूनों के तहत, मरीज को अनावश्यक सेवाओं के लिए शुल्क नहीं लिया जा सकता।

कानून का उल्लंघन: Clinical Establishments Act, 2010 का मज़ाक
शहर में चल रहे अधिकांश निजी अस्पताल Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act, 2010 के नियमों का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं। इस कानून का उद्देश्य मरीजों को गुणवत्तापूर्ण और नैतिक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना है। इसके तहत, हर अस्पताल को कुछ निश्चित मानकों का पालन करना होता है, जिसमें न्यूनतम सुविधाएं, योग्य स्टाफ, फायर सिस्टम और पार्किंग की व्यवस्था शामिल है।

लेकिन रीवा में हकीकत कुछ और ही है। कई नर्सिंग होम तो महज एक छोटे से मकान में बिना किसी फायर सिस्टम या उचित सुरक्षा व्यवस्था के चल रहे हैं। न तो पार्किंग की जगह है और न ही आपातकालीन स्थिति में मरीजों को निकालने का कोई रास्ता। यह सब जानकर भी स्थानीय CMHO कार्यालय और अन्य जिम्मेदार अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं करते। यह दर्शाता है कि कानून केवल किताबों में मौजूद है, जबकि जमीन पर इसका कोई महत्व नहीं है।

रीवा के डॉक्टर अनैतिक क्यों हैं? जब प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेता है, तो ऐसे अनैतिक चिकित्सक और अस्पताल संचालक बेखौफ हो जाते हैं। उन्हें पता है कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी, और वे मरीजों की जेब काटने का काम जारी रख सकते हैं।

गर्भवती महिलाओं के साथ धोखा: सामान्य डिलीवरी के बजाय क्यों होती है C-सेक्शन?
यह गोरखधंधा गर्भवती महिलाओं के साथ भी हो रहा है। अधिकांश निजी नर्सिंग होम में, सामान्य डिलीवरी की संभावना होने के बावजूद भी महिलाओं को C-सेक्शन के लिए मजबूर किया जाता है। एक सामान्य डिलीवरी से अस्पताल को बहुत कम लाभ होता है, जबकि C-सेक्शन से एक बड़ा बिल बनाया जा सकता है। यह एक स्पष्ट आर्थिक प्रेरणा है जो डॉक्टरों को अनैतिक निर्णय लेने के लिए उकसाती है।

क्यों निजी अस्पताल गर्भवती महिलाओं को धोखा देते हैं? इसके अलावा, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को हर तीसरे महीने सोनोग्राफी करवाने के लिए कहा जाता है, चाहे उसकी कोई मेडिकल आवश्यकता हो या न हो। यह अनावश्यक डायग्नोस्टिक प्रक्रिया एक तरह का सीधा आर्थिक शोषण है। उन्हें घटिया किस्म की आयरन और कैल्शियम की गोलियाँ और सिरप भी दिए जाते हैं, जो सिर्फ उन्हीं अस्पतालों के केमिस्ट काउंटर पर उपलब्ध होते हैं। यह NMC के नैतिकता कोड का उल्लंघन है जो किसी भी डॉक्टर को किसी विशेष दवा कंपनी या ब्रांड को बढ़ावा देने से रोकता है।

फर्जी पैथोलॉजी रिपोर्ट का धंधा: क्या है नियम और क्या है हकीकत?
रीवा के निजी अस्पतालों का एक और काला अध्याय है फर्जी पैथोलॉजी लैबों का धंधा। अधिकांश अस्पतालों ने अपनी खुद की पैथोलॉजी लैब बना रखी है, या फिर अपने किसी चहेते को संचालन का अधिकार दिया है। यहाँ मरीजों के ब्लड, यूरिन और स्टूल टेस्ट जबरन करवाए जाते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि इन पैथोलॉजी लैबों में डिग्रीधारी लैब असिस्टेंट तक नहीं हैं। मरीजों को दी जाने वाली रिपोर्ट संदेहास्पद होती हैं, और अगर कोई व्यक्ति अलग-अलग लैब से एक ही चीज की जाँच करवाता है, तो रिपोर्ट में बहुत अंतर देखने को मिल सकता है। नियम यह है कि एक डॉक्टर केवल दो पैथोलॉजी केंद्रों में ही अपनी सेवाएँ दे सकता है, लेकिन रीवा में एक ही डॉक्टर के नाम से कई लैब चल रही हैं। यह स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है।

जिम्मेदार कौन? प्रशासनिक लापरवाही और रिश्वतखोरी का आरोप
ऐसा नहीं है कि इन सभी अनियमितताओं की जानकारी जिले के जिम्मेदार आला अधिकारियों को नहीं है। लेकिन, सूत्रों की मानें तो CMHO कार्यालय के छोटे बाबू से लेकर वरिष्ठ अधिकारी तक, सभी को हर महीने एक निश्चित राशि "सेवा शुल्क" के रूप में पहुंचाई जाती है। इसी रिश्वतखोरी के चलते ये निजी अस्पताल बिना किसी डर के मरीजों को लूटने का काम कर रहे हैं।

यह स्थिति भारतीय संविधान के तहत स्वास्थ्य के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। यह एक गंभीर अपराध है जो न केवल मरीजों की जान को जोखिम में डाल रहा है, बल्कि न्याय और कानून के प्रति जनता के विश्वास को भी खत्म कर रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइंस और मरीजों के अधिकार
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक फैसलों में मरीजों के अधिकारों को मान्यता दी है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act), 2019 के तहत, मरीज को एक उपभोक्ता माना गया है और उसे लापरवाही या अनैतिक सेवा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है। डॉक्टर की अनुपलब्धता, अनावश्यक इलाज, या दोषपूर्ण सेवा के लिए मरीज अदालत में जाकर न्याय की मांग कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि इलाज के नाम पर मरीजों का शोषण एक गंभीर अपराध है।

नागरिकों को क्या करना चाहिए? लूट के खिलाफ आवाज कैसे उठाएं?
यह लड़ाई सिर्फ कुछ पीड़ितों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा।

  • बिलों की जाँच करें: अस्पताल के बिल का हर आइटम ध्यान से देखें।
  • दूसरी राय लें: किसी भी गंभीर बीमारी के लिए तुरंत दूसरी राय लें।
  • दस्तावेजों को सुरक्षित रखें: सभी मेडिकल रिपोर्ट और बिल को सुरक्षित रखें।
  • शिकायत दर्ज कराएं: जिला स्वास्थ्य प्राधिकरण, CMHO कार्यालय और राज्य चिकित्सा परिषद में शिकायत दर्ज कराएं।
  • आरटीआई का उपयोग करें: आरटीआई के माध्यम से अस्पताल के लाइसेंस और नियमों की जानकारी लें।

अगले अंक में शहर के कुछ नामी गिरामी निजी अस्पतालों की कमियां हमारे अंक में प्रकाशित एवं प्रसारित की जायेंगी।

FAQ-
Q: रीवा के निजी अस्पताल मरीजों को कैसे लूटते हैं?

A: वे अनावश्यक जाँचें, जबरन अस्पताल में भर्ती और फर्जी रिपोर्ट के माध्यम से मरीजों से लाखों रुपये वसूलते हैं।

Q: क्या सामान्य डिलीवरी के बजाय C-सेक्शन कराना कानूनी है?

A: यदि चिकित्सीय आवश्यकता न हो तो यह अनैतिक और अवैध है।

Q: रीवा में पैथोलॉजी लैब की क्या समस्या है?

A: कई लैब बिना योग्य स्टाफ के चल रही हैं और फर्जी रिपोर्ट दे रही हैं। एक ही डॉक्टर के नाम से कई लैब संचालित हो रही हैं।

Q: क्या पुलिस और प्रशासन इन घोटालों पर कार्रवाई कर रहा है?

A: रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों पर रिश्वत लेने का आरोप है, जिसके कारण कार्रवाई में देरी हो रही है।

Q: मरीज ऐसे मामलों में कहाँ शिकायत कर सकते हैं?

A: मरीज जिला स्वास्थ्य प्राधिकरण, राज्य चिकित्सा परिषद या उपभोक्ता न्यायालय में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

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