रीवा न्यूज़ मीडिया खुलासा: परीक्षा ड्यूटी करें या मोबाइल से खेलें? शिक्षकों को डराकर कैसी परीक्षा कराना चाहता है विभाग?
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश में 10 फरवरी से शुरू हो रही मंडल परीक्षाओं से ठीक पहले शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। एक ओर परीक्षा की शुचिता बनाए रखने के लिए केंद्रों पर मोबाइल फोन पूरी तरह प्रतिबंधित है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन शिक्षकों पर ई-अटेंडेंस (E-Attendance) के जरिए उपस्थिति दर्ज कराने का 'अव्यावहारिक' दबाव बना रहा है। वेतन काटने की धमकियों ने शिक्षकों को मानसिक तनाव के उस दौर में धकेल दिया है, जहाँ परीक्षा की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं।
हाईकोर्ट में मामला लंबित, फिर भी ज़मीनी स्तर पर तानाशाही क्यों?
सबसे बड़ा विधिक सवाल यह है कि ई-अटेंडेंस का पूरा मामला इस समय माननीय उच्च न्यायालय, जबलपुर में विचाराधीन है। शिक्षक संगठनों का तर्क है कि जब मामला अदालत में लंबित है, तो कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारियों द्वारा वेतन रोकने या कटौती करने की धमकी देना न्यायपालिका की अवमानना और प्रशासनिक हठधर्मिता है।
विरोधाभासी आदेश: मोबाइल घर छोड़ें या अटेंडेंस लगाएं?
परीक्षा नियमों के अनुसार, केंद्राध्यक्ष से लेकर पर्यवेक्षक तक कोई भी मोबाइल फोन केंद्र के भीतर नहीं ले जा सकता। ऐसे में शिक्षकों के सामने दो बड़ी चुनौतियाँ हैं:
- नियम पालन बनाम नौकरी: यदि शिक्षक मोबाइल घर छोड़कर आते हैं, तो ई-अटेंडेंस नहीं लग पाएगी और वेतन कट जाएगा।
- तकनीकी खामियां: सर्वर डाउन होने या नेटवर्क न मिलने के कारण अटेंडेंस लगाने में 20-30 मिनट बर्बाद हो रहे हैं, जिससे परीक्षा कार्य प्रभावित हो रहा है।
शिक्षक संगठनों की चेतावनी: तनाव में शिक्षक, कैसे होगी पारदर्शी परीक्षा?
शिक्षक संगठनों (SIR और BLO कार्यों में संलग्न शिक्षकों सहित) ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि इस दोहरी व्यवस्था से शिक्षकों का मनोबल गिर रहा है। लॉग-इन और लॉग-आउट की प्रक्रिया में तकनीकी उलझनों के कारण शिक्षक अपने मुख्य दायित्व 'निगरानी' (Invigilation) के बजाय मोबाइल स्क्रीन पर अटके रहते हैं।
"प्रशासन को तय करना होगा कि उन्हें केवल डिजिटल डेटा चाहिए या परीक्षा की निष्पक्षता। तनावग्रस्त शिक्षक कभी भी बेहतर परिणाम नहीं दे सकता।" — स्थानीय शिक्षक प्रतिनिधि
क्या प्रशासन जागेगा या विवाद और बढ़ेगा?
10 फरवरी से लाखों छात्र परीक्षा में बैठेंगे। ऐसे में सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे शिक्षकों को भयमुक्त वातावरण दें। ई-अटेंडेंस जैसी व्यवस्था को तब तक स्थगित रखा जाना चाहिए जब तक कि परीक्षा और मूल्यांकन का कार्य समाप्त न हो जाए। क्या शासन इस 'प्रशासनिक ज़बरदस्ती' पर रोक लगाएगा या फिर यह विवाद कोर्ट की अवमानना का नया अध्याय लिखेगा?