खत्म करो ये ढोंग! रीवा में ढाई क्विंटल नकली पनीर ज़ब्त, फूड विभाग अपनी जेब देखता है या लोगों की जान? ज़िम्मेदार अधिकारियों को तुरंत बर्खास्त करो!

 
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ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) रीवा के खाद्य विभाग ने शनिवार को एक 'बड़ी' कार्रवाई करते हुए समान क्षेत्र के स्नेह ट्रेडर्स से ढाई क्विंटल एनालॉग (नकली) पनीर ज़ब्त किया। सुनने में यह कार्रवाई बहुत सराहनीय लगती है, खासकर तब जब यह नकली माल धड़ल्ले से वैवाहिक समारोहों में परोसे जाने की तैयारी में था, जिससे सैकड़ों लोगों के स्वास्थ्य को सीधा खतरा हो सकता था। लेकिन, यह कार्रवाई उस खोखले सिस्टम की पोल खोलती है जिस पर हर भारतीय नागरिक का भरोसा टिका होता है। यह सिर्फ़ एक रेड नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की साल भर की लापरवाही का 'सीज़नल इलेक्शन' है।

फूड विभाग, साल भर क्या करता है? किस बात का लेते हैं ये जिम्मेदार अधिकारी वेतन?
यह सवाल हर नागरिक के मन में उठना चाहिए: क्या खाद्य सुरक्षा की गारंटी सिर्फ़ शादी-विवाहों के सीज़न तक सीमित है? क्या फूड विभाग के जिम्मेदार अधिकारी साल भर अपने दफ़्तरों में बैठकर वेतन लेते हैं और मिलावटखोरों को खुला लाइसेंस दे देते हैं? जैसे ही शादियों का सीज़न आता है, मुनाफाखोरी आसमान छूने लगती है और मिलावट का धंधा भी। ठीक इसी समय, नींद से जागा हुआ फूड विभाग 'कार्रवाई' का डंडा लेकर मैदान में उतरता है, जैसे यह कोई सालाना औपचारिकता हो।

"क्या नकली पनीर की सप्लाई सिर्फ़ नवंबर से फ़रवरी के बीच होती है? क्या साल के बाकी 8-9 महीनों में मिलावटखोर अपनी दुकानें बंद करके साधु बन जाते हैं? इस सीज़नल कार्रवाई से यह साफ़ है कि या तो अधिकारियों की मिलीभगत है, या फिर वे साल भर अपनी ड्यूटी से पूरी तरह नदारद रहते हैं।"

खोखला सिस्टम और मिलावटखोरों की हिम्मत!
यह रीवा का मामला दिखाता है कि उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से नकली पनीर की सप्लाई धड़ल्ले से मध्यप्रदेश तक हो रही है। इस पर किसी की नज़र क्यों नहीं पड़ी? क्या अंतरराज्यीय चेक पोस्ट और खाद्य सुरक्षा के तंत्र इतने खोखले हो चुके हैं कि मिलावटी माल का परिवहन बेरोकटोक जारी है?

स्नेह ट्रेडर्स के संचालक प्रमोद प्रधान ने भी स्वीकार किया कि यह नकली माल प्रयागराज से मंगवाया गया था। यह स्वीकारोक्ति मात्र एक दुकान की नहीं, बल्कि पूरे सप्लाई चेन में मौजूद भ्रष्ट सिस्टम की कहानी बताती है। यह साफ़ इंगित करता है कि मिलावटखोरों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं— क्योंकि उन्हें पता है कि 'सीज़न' के बाद जांच रुक जाएगी।

हर सप्ताह, हर महीने क्यों नहीं होती व्यापक और नियमित जांच?
असली चुनौती इस बात की है कि यह कार्रवाई नियमित क्यों नहीं होती? हर महीने, हर सप्ताह पूरे शहर और ज़िले में, सिर्फ़ पनीर ही नहीं, बल्कि तेल, घी, मसाले और अन्य खाद्य सामग्री की व्यापक जांच क्यों नहीं की जाती?
अगर विभाग हर पंद्रह दिन में रैंडम सैंपलिंग और चेकिंग शुरू कर दे, तो मिलावटखोरों की हिम्मत अपने-आप पस्त हो जाएगी। लेकिन, ऐसा होता नहीं है। कार्रवाई तब होती है जब शिकायतों का अंबार लग जाता है और बात 'बड़े' अधिकारी तक पहुंच जाती है।

नागरिकों का स्वास्थ्य या सिर्फ़ जुर्माना वसूलने की तैयारी?
फूड विभाग ने पूरे स्टॉक को ज़ब्त कर दुकान को सील कर दिया है और सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं। सवाल यह है कि ज़ब्ती और सैंपलिंग के बाद क्या होगा? क्या यह सिर्फ़ जुर्माना वसूलकर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की तैयारी है?

एनालॉग पनीर (Analog Paneer) सामान्यतः पाम ऑयल, स्टार्च, और मिल्क पाउडर को मिलाकर बनाया जाता है, जिसमें दूध की मात्रा बहुत कम या न के बराबर होती है। यह पनीर न केवल स्वादहीन होता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहद हानिकारक हो सकता है। यह दिखाता है कि मुनाफाखोर, इंसानी ज़िंदगी को दांव पर लगाकर सिर्फ़ पैसे बनाने पर तुले हैं।

खाद्य सुरक्षा अधिकारियों को जवाब देना होगा: 'एनालॉग पनीर' का धंधा कैसे पनप रहा है?
जिम्मेदार अधिकारियों को अब सिर्फ़ ज़ब्ती नहीं, बल्कि पूरे साल की अपनी कार्यप्रणाली पर जवाब देना चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि:

  • नियमित और निरंतर जांच: सिर्फ़ सीज़न में नहीं, बल्कि साल भर हर महीने, हर सप्ताह खाद्य पदार्थों की जांच हो।
  • कड़े दंड: मिलावट के दोषियों पर सिर्फ़ जुर्माना नहीं, बल्कि ऐसी कड़ी कानूनी कार्रवाई हो कि कोई दोबारा ऐसा करने की हिम्मत न करे।
  • सप्लाई चेन की निगरानी: अंतरराज्यीय स्तर पर आने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच के लिए मज़बूत तंत्र बनाया जाए।
  • जन जागरूकता: नागरिकों को कैसे करें असली और नकली पनीर की पहचान, इस बारे में शिक्षित किया जाए।

रीवा की यह कार्रवाई एक चेतावनी होनी चाहिए। यह सिर्फ़ एक पनीर की दुकान का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश के खोखले खाद्य सुरक्षा तंत्र का प्रतीक है जिसे तत्काल दुरुस्त करने की ज़रूरत है!

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