कांग्रेस का बड़ा आरोप: रीवा में गौमाता के नाम पर करोड़ों का घोटाला, गौशालाएं खाली और गायें सड़कों पर
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा मध्यप्रदेश का रीवा जिला, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था के लिए जाना जाता है, आज एक गंभीर मानवीय और पशु कल्याण संकट का सामना कर रहा है। यहाँ गौवंश की दुर्दशा लगातार बढ़ती जा रही है, जिसका सीधा असर न केवल इन बेसहारा पशुओं के जीवन पर पड़ रहा है, बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा भी खतरे में है। गाँव हो या शहर, सड़कों पर झुंड के झुंड गायें बैठी रहती हैं, जिससे यातायात बाधित होता है और वाहन दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। यह स्थिति तब और भी चिंताजनक हो जाती है जब सरकार ने इन पशुओं की देखभाल के लिए करोड़ों रुपये खर्च करके गौशालाएं बनवाई हैं, जो आज खाली पड़ी हैं या खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं। यह एक ऐसा विरोधाभास है जो सरकारी वादों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करता है।
दुर्घटनाओं का बढ़ता ग्राफ: इंसानों और जानवरों के लिए खतरा
सड़क पर बैठे गौवंश ने रीवा की सड़कों को मौत का जाल बना दिया है। रात के समय, जब दृश्यता कम होती है, तो यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। दोपहिया वाहन चालक विशेष रूप से इन दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। हाल ही में, गुढ़ के रेडियो स्टेशन के पास एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। एक वाहन चालक ने गलती से एक गर्भवती गाय को टक्कर मार दी, जिससे गाय को गंभीर चोटें आईं और उसकी हालत नाजुक बनी हुई है। यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक दर्दनाक चेतावनी है कि यदि इस समस्या पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया तो परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं। महिला कांग्रेस की प्रदेश उपाध्यक्ष कविता पांडेय ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सड़कों पर गौवंश के जमावड़े के कारण आवागमन में भारी परेशानी होती है, और रात के समय यह समस्या चरम पर होती है। उन्होंने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ऐसे देश में, जहाँ गाय को माँ का दर्जा दिया जाता है, वहाँ उसकी ऐसी दुर्दशा हो रही है।"

रीवा जिले में गौवंश की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण गौशालाओं की अव्यवस्था और उनकी कम क्षमता है। कई गौशालाएं कागजों पर संचालित हो रही हैं, लेकिन हकीकत में उनका कोई अता-पता नहीं है। सरकार ने इन गौशालाओं के निर्माण और रखरखाव पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, लेकिन वे या तो खंडहर में तब्दील हो गई हैं या फिर व्यापक इंतजामों के अभाव में खाली पड़ी हैं। इन गौशालाओं में न तो पर्याप्त चारा है, न पानी और न ही कोई देखभाल करने वाला स्टाफ। ऐसे में, गौवंश को मजबूरन भोजन और पानी की तलाश में सड़कों पर भटकना पड़ता है। कविता पांडेय ने एक गंभीर सवाल उठाया है कि जब गौशालाओं में काम नहीं हो रहा है, तो उनके नाम पर आने वाला हर महीने का अनुदान किसके खाते में जा रहा है? यह सीधा-सीधा भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है, जहाँ गौवंश के नाम पर आने वाला फंड उन तक पहुँचने की बजाय बीच में ही गायब हो रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि कागजों पर तो सैकड़ों गौशालाएं सफलतापूर्वक चल रही हैं, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। इस मामले की गहन जांच होनी चाहिए कि गौशाला का फंड किसके खाते में जा रहा है और क्या इस भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होगी?

चारागाहों का गायब होना: एक मूल समस्या
सड़कों पर गौवंश के भटकने की एक और सबसे बड़ी वजह चारागाह की जमीन का खत्म होना है। ग्रामीणों ने बताया कि पहले हर गाँव में गौवंश के चरने के लिए पर्याप्त जमीन होती थी, लेकिन समय के साथ उन पर अवैध कब्जा हो गया या उन्हें दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल कर लिया गया। आज, गायों के लिए प्राकृतिक चारागाह लगभग खत्म हो चुके हैं। वे भूखी और प्यासी रहती हैं, जिससे उन्हें भोजन की तलाश में शहरों की व्यस्त सड़कों पर जाना पड़ता है। गौवंश को सड़कों से कैसे हटाया जाए, इसका समाधान केवल गौशालाएँ बनाना नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि उनके लिए पर्याप्त चारागाह उपलब्ध हो। चारागाहों का गायब होना न केवल गौवंश के लिए, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है। यह एक ऐसी समस्या है जिसकी जड़ें बहुत गहरी हैं और जिसका समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि सख्त निगरानी और राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही संभव है।
सरकारी वादे और जमीनी हकीकत
इस गंभीर स्थिति पर प्रशासन का क्या रुख है? जिला पंचायत सीईओ मेहताब सिंह गुर्जर ने कहा कि वे गौवंश की स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं और व्यवस्थाएं बेहतर बनाने पर फोकस किया जा रहा है। उन्होंने कहा, "गौशालाओं की स्थिति सुधारने और उन्हें बेहतर बनाने पर काम चल रहा है।" हालांकि, ग्रामीणों और activists का कहना है कि ये सिर्फ खोखले वादे हैं। वे सवाल करते हैं कि अगर व्यवस्थाएं बेहतर बनाने पर फोकस किया जा रहा था, तो आज गौशालाएं खंडहर क्यों हैं? यह एक ऐसा सवाल है जिसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। प्रशासन के आश्वासन और जमीन पर दिख रही हकीकत में भारी अंतर है। जब तक यह अंतर कम नहीं होगा, तब तक गौवंश की दुर्दशा और सड़क दुर्घटनाओं का सिलसिला जारी रहेगा। ग्रामीण यह जानने को उत्सुक हैं कि आखिर गौशालाओं को अनुदान क्यों नहीं मिल रहा है और अगर मिल रहा है तो वह कहाँ जा रहा है?
समाधान की तलाश: क्या है आगे की राह?
इस विकट समस्या का समाधान केवल तात्कालिक कदमों से संभव नहीं है। इसके लिए एक दीर्घकालिक और बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता है।
- सख्त ऑडिट: गौशालाओं के फंड का एक स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट कराया जाना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि पैसा कहाँ खर्च हो रहा है।
- चारागाहों की बहाली: उन सरकारी जमीनों को वापस लेना चाहिए जिन पर अवैध कब्जा हो चुका है और उन्हें चारागाह के रूप में बहाल करना चाहिए।
- गौशालाओं का प्रबंधन: गौशालाओं का प्रबंधन स्थानीय ग्रामीणों या गैर-सरकारी संगठनों को दिया जाना चाहिए, जो गायों की देखभाल में वास्तविक रुचि रखते हैं।
- जन जागरूकता: ग्रामीणों को भी इस बात के लिए जागरूक करना चाहिए कि वे अपनी गायों को सड़कों पर न छोड़ें।
यह एक ऐसा मुद्दा है जिसमें सरकार, प्रशासन और आम जनता, सभी को मिलकर काम करना होगा। गौवंश की सुरक्षा सिर्फ एक धार्मिक या सामाजिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक सुरक्षा और सुशासन का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।