रीवा में गैस का 'महा-संकट': एजेंसियों ने उपभोक्ताओं के हक़ पर डाला डाका; युद्ध के डर से ₹1500 में बिक रहा सिलेंडर
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। दुनिया के दूसरे छोर पर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की खबरों ने रीवा की रसोई में आग लगा दी है। सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से फैली 'गैस सप्लाई बंद होने' की खबर ने लोगों के कान खड़े कर दिए हैं। आलम यह है कि लोग अपना काम-धंधा छोड़कर गैस एजेंसियों के बाहर कतारों में खड़े हैं। रीवा गैस एजेंसी के मैदानी स्थित गोदाम के बाहर सुबह 5 बजे से ही लोगों की लंबी लाइनें देखी जा सकती हैं। हर कोई चाहता है कि संकट आने से पहले उनका सिलेंडर रिफिल हो जाए।
गैस एजेंसियों की 'कारस्तानी': उपभोक्ता को पता ही नहीं और सिलेंडर बिक गया!
इस भीड़ और अफरा-तफरी के बीच एक चौंकाने वाला सच सामने आया है। जब कई उपभोक्ता महीनों बाद गैस रिफिल कराने एजेंसी पहुँचे, तो उन्हें पता चला कि उनके नाम पर पहले ही सिलेंडर बुक होकर 'डिलीवर' दिखाया जा चुका है।
- डाका: उपभोक्ताओं के खाते से सब्सिडी जारी हो गई, सिलेंडर का कोटा खत्म हो गया, लेकिन असली हकदार को गैस मिली ही नहीं।
- फर्जीवाड़ा: एजेंसियों ने अपने स्तर पर ही डेटा एंट्री कर सिलेंडरों को ब्लैक मार्केट में खपा दिया। छिरिया के पास संचालित एजेंसियों के बाहर ऐसे दर्जनों लोग भटक रहे हैं जिनके सिलेंडर 'कागजों' में घर पहुँच चुके हैं, पर चूल्हा खाली है।
₹1500 में ब्लैक: दलालों की चांदी, गरीब की जेब खाली
एक तरफ आम आदमी 25 दिन के रिफिलिंग नियम और ओटीपी (OTP) की समस्याओं से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ रीवा में गैस दलालों का साम्राज्य फल-फूल रहा है।
खुलासा: जो सिलेंडर सरकारी रेट पर उपलब्ध होना चाहिए, वही सिलेंडर दलाल ₹1500 में सरेआम बेच रहे हैं। एजेंसियों से सीधे दलालों तक पहुँचने वाली यह सप्लाई अब आम आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही है। पहले जो सिलेंडर ₹1000 में ब्लैक मिलता था, संकट की खबर आते ही उसकी कीमत ₹500 और बढ़ा दी गई है।
25 दिन का बाउंडेशन और तकनीकी पेच: उपभोक्ता परेशान
सरकार और तेल कंपनियों ने रिफिलिंग के लिए 25 दिन का नियम बना रखा है। कई लोग जो इमरजेंसी के लिए सिलेंडर रखना चाहते हैं, उन्हें इस नियम के कारण बैरंग लौटना पड़ रहा है। इसके अलावा, तकनीकी खामियों ने कोढ़ में खाज का काम किया है। उपभोक्ताओं के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर ओटीपी नहीं पहुँच रहा है, जिससे बुकिंग की प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है। एजेंसियों ने इसी तकनीकी पेच का फायदा उठाकर उपभोक्ताओं के हिस्से का कोटा पहले ही 'हजम' कर लिया है।
मैदानी और छिरिया गोदाम पर भारी हंगामा
रीवा के मैदानी स्थित गैस गोदाम के बाहर आज स्थिति तनावपूर्ण रही। यहाँ सैकड़ों लोग सिलेंडर लिए खड़े थे, जिनमें से कई महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल थे। कई घंटों के इंतजार के बाद जब उन्हें बताया गया कि उनके नंबर पर पहले ही सिलेंडर सप्लाई हो चुका है, तो लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। उपभोक्ताओं का आरोप है कि एजेंसी संचालक और कर्मचारी मिलकर सिलेंडरों की कालाबाजारी कर रहे हैं और पूछने पर अभद्रता करते हैं।
क्या प्रशासन लेगा इन 'गैस माफियाओं' पर एक्शन?
रीवा में चल रहा यह खेल सिर्फ सप्लाई की कमी का नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित भ्रष्टाचार का है। एक तरफ कमर्शियल गैस की किल्लत है, तो दूसरी तरफ घरेलू गैस का खुलेआम ब्लैक हो रहा है। क्या जिला प्रशासन और खाद्य विभाग इन एजेंसियों के स्टॉक और कागजों की जांच करेगा? जब तक इन माफियाओं पर नकेल नहीं कसी जाएगी, तब तक आम आदमी इसी तरह लाइनों में धक्के खाता रहेगा।