रीवा के शराब सिंडिकेट में बड़ा उलटफेर: सिरमौर चौराहा से गुढ़ तक नए 'शराब दिग्गजों' का राज, 5 समूहों पर अब भी सस्पेंस

 
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 जय महाकाल और सुप्रभ अनंत ग्रुप का दबदबा, आरक्षित मूल्य पर बिकीं महंगी दुकानें।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा जिले के आबकारी विभाग द्वारा संचालित शराब दुकानों की नीलामी प्रक्रिया अपने दूसरे और निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है। विंध्य की इस सबसे बड़ी व्यावसायिक हलचल में जिले की सबसे महंगी आरक्षित मूल्य वाली दुकान 'सिरमौर चौराहा' समूह को आखिरकार खरीदार मिल गया है। इस समूह के साथ-साथ जिले का एक और महत्वपूर्ण क्लस्टर 'गुढ़ शराब दुकान समूह' भी बिक चुका है। इन दो बड़े समूहों के बिकने से प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज है, क्योंकि ये दोनों क्षेत्र राजस्व के दृष्टिकोण से जिले के सबसे कमाऊ इलाकों में शुमार किए जाते हैं।

समान समूह का अटूट कीर्तिमान और आबकारी का गणित 
भले ही सिरमौर चौराहा समूह का आरक्षित मूल्य जिले में सबसे अधिक 59.58 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया था, लेकिन यह बाजार के पुराने रिकॉर्ड को ध्वस्त करने में नाकाम रहा। आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि 'समान समूह' का रिकॉर्ड अब भी अटूट है। समान समूह का आरक्षित मूल्य 55.44 करोड़ था, लेकिन ठेकेदार ने उस पर 10 करोड़ रुपये की अतिरिक्त बोली लगाकर उसे 65.18 करोड़ में खरीदा था। इसके विपरीत, सिरमौर चौराहा के लिए ठेकेदारों ने केवल आरक्षित मूल्य के बराबर ही बोली लगाई। आबकारी विभाग को उम्मीद थी कि सिरमौर चौराहा समान समूह के रिकॉर्ड को पार करेगा, लेकिन ठेकेदारों ने संतुलित दांव खेलकर विभाग की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

जय महाकाल और सुप्रभ अनंत ग्रुप: बाजार के नए धुरंधर 
रीवा के शराब सिंडिकेट में इस बार शक्ति का केंद्र बदलता नजर आ रहा है। जय महाकाल ग्रुप जिले के सबसे बड़े ठेकेदार के रूप में उभरा है। इस ग्रुप ने पहले ही इटौरा और पीटीएस (ट्रांसपोर्ट नगर) जैसे मलाईदार समूह अपने नाम किए थे, और अब सिरमौर चौराहा समूह को भी करीब 60 करोड़ की बोली के साथ अपने पाले में कर लिया है।

दूसरी ओर, एक और बड़ा नाम 'सुप्रभ अनंत ग्रुप' का सामने आया है। इस ग्रुप ने रणनीतिक बढ़त बनाते हुए गुढ़ शराब दुकान समूह का ठेका हासिल कर लिया है। गुढ़ इलाका औद्योगिक और ग्रामीण बेल्ट का मिश्रण होने के कारण ठेकेदारों की पहली पसंद बना हुआ था। इसके अलावा, मां भगवती ग्रुप ने मनगवां पर कब्जा बरकरार रखा है, जबकि सेमरिया और देवतालाब समूह क्रमशः प्रकाश सिंह और मैडस्टोन ग्रुप के खाते में गए हैं।

सरकारी खजाने को क्यों नहीं मिला अतिरिक्त मुनाफा?
इस नीलामी प्रक्रिया का सबसे चौकाने वाला पहलू यह रहा कि सरकार को तय आरक्षित मूल्य से ऊपर 'एक धेला' भी अतिरिक्त प्राप्त नहीं हुआ। दूसरे चरण की नीलामी में ठेकेदारों ने बहुत ही सुरक्षित तरीके से ई-टेंडर डाले। अधिकांश दुकानें बिना किसी बड़ी प्रतिस्पर्धा के उसी कीमत पर उठ गईं, जो विभाग ने न्यूनतम तय की थी। जानकारों का मानना है कि ठेकेदार अब जोखिम उठाने के मूड में नहीं हैं और केवल उसी मूल्य पर दुकानें ले रहे हैं जहां से उन्हें निश्चित मुनाफा नजर आ रहा है। इससे आबकारी विभाग का वह लक्ष्य अधूरा रह गया, जिसमें नीलामी के जरिए करोड़ों का अतिरिक्त प्रीमियम कमाने की योजना थी।

14 मार्च की अग्निपरीक्षा: अब इन 5 समूहों पर टिकी नजरें 
10 मार्च को हुई सफल नीलामी के बाद अब केवल 5 शराब समूह शेष रह गए हैं। इन समूहों के लिए 14 मार्च 2026 की तारीख मुकर्रर की गई है। बचे हुए समूहों में बैकुंठपुर (30.48 करोड़), गुढ़ के पास के कुछ क्षेत्र, डभौरा (16.67 करोड़), हनुमना (17.79 करोड़) और चाकघाट (11.58 करोड़) शामिल हैं। बैकुंठपुर अब नीलामी का सबसे बड़ा आकर्षण होगा। 12 मार्च से इन समूहों के लिए फॉर्म जमा करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आखिरी चरण में ठेकेदार आपस में भिड़ेंगे या ये दुकानें भी केवल सरकारी रेट पर ही सिमट जाएंगी।

रीवा का शराब सिंडिकेट और भविष्य की चुनौतियां 
जिस तरह से जय महाकाल और सुप्रभ अनंत जैसे ग्रुप्स ने रीवा के शराब बाजार पर अपनी पकड़ बनाई है, उससे यह साफ है कि जिले का शराब कारोबार अब कुछ ही बड़े हाथों में केंद्रित हो रहा है। छोटे ठेकेदार इस बड़ी रेस से बाहर हो चुके हैं। आने वाले समय में इन समूहों के सफल संचालन और आबकारी चोरी को रोकना विभाग के लिए बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल, प्रशासन का पूरा ध्यान 14 मार्च को होने वाली अंतिम नीलामी पर है, ताकि जिले की सभी 17 समूहों का शत-प्रतिशत निष्पादन सुनिश्चित किया जा सके।

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