लूट का 'झिरिया मॉडल': रीवा में MRP को ठेंगा दिखा रहे शराब ठेकेदार; आबकारी विभाग की मेहरबानी से फल-फूल रहा अवैध वसूली का काला कारोबार, CM हेल्पलाइन 'फेल'
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। विंध्य क्षेत्र के रीवा जिले में आबकारी नियमों की धज्जियां उड़ाना अब एक सामान्य बात हो गई है। जिले के झिरिया मोहल्ला स्थित शराब दुकान से शुरू हुआ 'ओवररेटिंग' का विवाद अब सीधे तौर पर जिला प्रशासन और आबकारी विभाग की साख पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। जब रक्षक ही भक्षक के साथ खड़ा नजर आए, तो आम जनता की फरियाद आखिर सुनेगा कौन?
₹20 की 'अतिरिक्त' वसूली: एक व्यक्ति की नहीं, पूरे सिस्टम की हार!
मामला 11 जनवरी 2026 का है, जब प्रवीण शर्मा नामक नागरिक ने झिरिया शराब दुकान से बीयर खरीदी। बोतल पर छपी कीमत ₹160 थी, लेकिन काउंटर पर बैठे सेल्समैन ने दबंगई के साथ ₹180 वसूले।
बिंदुवार समझें मामला:
खुली लूट: निर्धारित कीमत से ₹20 ज्यादा लेना कोई छोटी बात नहीं है; यह हजारों ग्राहकों से प्रतिदिन होने वाली लाखों की अवैध कमाई का हिस्सा है।
साक्ष्य दरकिनार: पीड़ित का दावा है कि उसके पास पूरी घटना का वीडियो साक्ष्य मौजूद है, लेकिन जांच अधिकारियों ने इसे देखने की जहमत तक नहीं उठाई।
CM हेल्पलाइन: समाधान का केंद्र या औपचारिकता का अड्डा?
प्रदेश सरकार जिस CM हेल्पलाइन (181) को जनता की समस्याओं का अंतिम समाधान बताती है, रीवा आबकारी विभाग ने उसे एक मजाक बना दिया है। पीड़ित ने शिकायत दर्ज कराई, लेकिन जो हुआ वह चौंकाने वाला है:
- तीन स्तर की जांच, जीरो नतीजा: एल-1 से लेकर एल-3 स्तर तक जांच हुई, लेकिन रिपोर्ट में लिख दिया गया कि "बिक्री नियमानुसार है"।
- कागजी 'टेस्ट परचेस': आबकारी विभाग ने तथाकथित 'टेस्ट परचेस' (नकली ग्राहक बनकर जांच) की बात कही, लेकिन यह जांच कब हुई और इसमें कौन शामिल था, इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है।
- एकतरफा फैसला: 31 जनवरी को बिना शिकायतकर्ता का पक्ष सुने और बिना वीडियो सत्यापन के शिकायत को बंद कर दिया गया।
आबकारी विभाग और ठेकेदारों के बीच 'मधुर संबंध'?
रीवा के स्थानीय निवासियों का आरोप है कि शराब दुकानों पर MRP से अधिक वसूली एक अघोषित नियम बन चुका है। जनता का सवाल है:
- क्या आबकारी विभाग को इन दुकानों के बाहर लगे 'रेट लिस्ट' और काउंटर पर होने वाली वसूली में अंतर दिखाई नहीं देता?
- क्या जिला प्रशासन को मिल रही शिकायतों पर निष्पक्ष जांच कराने की हिम्मत है?
- डिजिटल बिलिंग का अभाव: अधिकांश दुकानों पर आज भी पक्का बिल नहीं दिया जाता, जिससे अवैध वसूली को बढ़ावा मिलता है।
प्रशासनिक पारदर्शिता अब केवल फाइलों में!
झिरिया शराब दुकान का यह मामला केवल ₹20 का नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों की हत्या का है। यदि वीडियो साक्ष्य होने के बावजूद प्रशासन 'सब ठीक है' का राग अलाप रहा है, तो यह स्पष्ट है कि रसूखदार ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच गहरी सांठगांठ है। रीवा की जनता अब मांग कर रही है कि इन ठेकों का स्वतंत्र ऑडिट हो और सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक किए जाएं।