"मुख्यमंत्री जी! रीवा के शिक्षा विभाग ने आपके 'सुशासन' को बनाया मजाक: मैहर के प्यादे सस्पेंड, तो रीवा के असली 'करोड़पति लुटेरे' आपके बगल में क्यों बैठे?
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा संभाग के शिक्षा विभाग में इन दिनों अजीबोगरीब न्याय प्रणाली देखने को मिल रही है। एक ही तरह के अपराध (भवन मरम्मत घोटाला) के लिए मैहर जिले के अधिकारियों और प्राचार्यों को तत्काल निलंबित किया जा रहा है, लेकिन रीवा जिले के घोटालेबाज अब भी सरकारी कुर्सी का आनंद ले रहे हैं। ऐसा लगता है मानो रीवा के भ्रष्ट अधिकारियों को 'अभयदान' मिल चुका है।
मैहर में 'सर्जिकल स्ट्राइक': 13 प्राचार्यों की छुट्टी
- मैहर के रामनगर में हुए करोड़ों के फर्जीवाड़े के बाद कमिश्नर और जेडी (JD) ने निलंबन का हंटर चलाने में देरी नहीं की।
- कमिश्नर रीवा ने 7 प्राचार्यों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया।
- जेडी लोक शिक्षण ने 6 अन्य प्राचार्यों के खिलाफ निलंबन आदेश जारी किए। इन सभी पर आरोप है कि इन्होंने बिना काम कराए ठेका कंपनियों को लाखों का भुगतान किया।
रीवा का '28 लाख का खेल' और कमिश्नर की चुप्पी
मैहर जैसा ही, बल्कि उससे भी गंभीर मामला खुद रीवा जिले का है। यहाँ के 6 स्कूलों में मरम्मत के नाम पर 28 लाख रुपए का फर्जी भुगतान किया गया। जेडी की जांच टीम ने भ्रष्टाचार की पुष्टि भी कर दी। लेकिन विडंबना देखिए, इस घोटाले की फाइल पिछले 10 दिनों से कमिश्नर कार्यालय में धूल फांक रही है। रीवा के डीईओ (DEO) और संबंधित अधिकारी अब भी पदों पर डटे हुए हैं, जबकि उनके खिलाफ सबूतों का अंबार लगा है।
मैहर के इन 'बलि के बकरों' पर हुई कार्रवाई
कमिश्नर द्वारा निलंबित (मैहर जिला):
- शिवलाल वैस (गुलवार गुजारा): 24 लाख से अधिक का गबन।
- सियंबर सिंह (हर्रई): 23.30 लाख की वित्तीय अनियमितता।
- लक्ष्मण प्रसाद शुक्ला (देवदहा): 24.95 लाख का फर्जी भुगतान।
- श्रवण सिंह (कंदवारी): 23.60 लाख का फर्जीवाड़ा।
- रामलखन रावत (देवराजनगर) और मथुरा प्रसाद वर्मा (गोविंदपुर): 23.40 लाख का गबन।
- जेडी लोक शिक्षण द्वारा निलंबित:
- कामता प्रसाद तिवारी (मझटोलवा): 23.89 लाख का नियम विरुद्ध आहरण।
- रामाधार वर्मा (छिरहाई): 24 लाख की अनियमितता।
- राजेश कुमार साकेत (मनकहरी): 24 लाख का गलत भुगतान (वाणी इन्फ्रास्ट्रक्चर)।
- संकर्षण प्रसाद पाण्डेय (बड़वार), रवीन्द्र सिंह (सगौनी) और किरण पटेल (मड़वार)।
दोहरा मापदंड: कार्रवाई में भेदभाव क्यों?
जनता और विभाग के भीतर यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब अपराध एक जैसा है, जांच रिपोर्ट आ चुकी है, तो कार्रवाई में भेदभाव क्यों? रीवा जिले में 55 लाख का बजट आया था, जिसमें से 28 लाख रुपए बिना काम के ठेकेदारों को बांट दिए गए। क्या रीवा के अधिकारी कानून से ऊपर हैं? या फिर उन्हें बचाने के लिए ऊपर तक 'सांय-सांय' हो रही है?
क्या सिस्टम में पारदर्शिता आएगी?
शिक्षा विभाग में मरम्मत के नाम पर यह 'अंधेरगर्दी' विभाग की साख को बट्टा लगा रही है। मैहर में हुई कार्रवाई स्वागत योग्य है, लेकिन रीवा के मामले में चुप्पी यह संकेत देती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई सिर्फ 'चुनिंदा' लोगों के लिए है। अगर जल्द ही रीवा के दोषियों पर एफआईआर और निलंबन नहीं हुआ, तो यह साफ हो जाएगा कि प्रशासन भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रहा है।