रीवा: 'सफेद कोट' की आड़ में लूट का काला कारोबार! 16 घंटे का बिल 1 लाख, वेंटिलेटर होने के बावजूद सरकारी अस्पताल ने मरीज को मां भगवती अस्पताल भेजा
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित लूट और संवेदनहीनता का है, जिसने एक सरकारी कर्मचारी की जान जोखिम में डाल दी और उसके परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया। डढ़िया निवासी 60 वर्षीय रामभाई मिश्रा, जो आदिम जाति कल्याण विभाग में कार्यवाहक लिपिक थे, गुरुवार को एक सड़क हादसे का शिकार हुए। लेकिन उन्हें क्या पता था कि अस्पताल पहुँचने के बाद उन्हें सड़क से भी ज्यादा खतरनाक 'सिस्टम के गड्ढों' का सामना करना पड़ेगा।
संजय गांधी अस्पताल का 'झूठ': वेंटिलेटर खाली थे, फिर भी मरीज को बाहर क्यों भेजा?
दुर्घटना के बाद रामभाई मिश्रा को संजय गांधी अस्पताल की न्यूरो यूनिट में भर्ती कराया गया। वे होश में थे और खुद फोन पर बात कर रहे थे। उन्हें तुरंत वेंटिलेटर की जरूरत थी।
- सरकारी अस्पताल का दावा: परिजनों को बताया गया कि अस्पताल के सभी 10 वेंटिलेटर भरे हुए हैं।
- कड़वा सच: विश्वस्त सूत्रों और सूचना के अनुसार, उस समय 10 में से 2 वेंटिलेटर खाली थे।
- बड़ा सवाल: क्या सरकारी डॉक्टरों और प्राइवेट एम्बुलेंस/अस्पताल माफिया के बीच कोई सांठगांठ है? क्यों एक गंभीर मरीज को सरकारी सुविधा होने के बावजूद निजी अस्पताल के 'डेथ ट्रैप' में धकेला गया?
मां भगवती अस्पताल की 'वसूली': 16 घंटे, ₹1 लाख और रसीद का नामोनिशान नहीं
संजय गांधी अस्पताल से निराश होकर परिजन मरीज को 'मां भगवती अस्पताल' ले गए। यहाँ जो हुआ वह रूह कंपा देने वाला है:
- अंधाधुंध बिलिंग: मात्र 16 घंटे के इलाज का बिल लगभग ₹1 लाख थमाया गया। इसमें ₹400 का 'चार्जिंग शुल्क' और तीन बार डॉक्टर की विजिट का ₹6000 शामिल था।
- बिना रसीद की वसूली: परिजनों का आरोप है कि डॉक्टर दिनेश पटेल ने रात भर में ₹1 लाख तो ले लिए, लेकिन मांगने पर कोई आधिकारिक रसीद नहीं दी।
- रेफर में टालमटोल: जब सुबह मरीज की हालत बिगड़ी, तो परिजन बार-बार उसे किसी बड़े सेंटर रेफर करने की गुहार लगाते रहे, लेकिन अस्पताल प्रबंधन बिल वसूली के चक्कर में समय बर्बाद करता रहा।
फाइल का विवाद: क्या अस्पताल अपनी लापरवाही के सबूत मिटा रहा है?
अस्पताल और परिजनों के बीच सबसे बड़ा विवाद 'मरीज की फाइल' को लेकर हुआ।
- अस्पताल का तर्क: "नियमों के अनुसार ओरिजिनल फाइल मरीज को नहीं दी जा सकती, केवल फोटोकॉपी मिलेगी।"
- परिजनों का आरोप: फाइल न देना अस्पताल की लापरवाही छुपाने की कोशिश है। एमएलसी (MLC) केस होने के कारण फाइल कानूनी दस्तावेज है, लेकिन मरीज के परिजनों को यह जानने का हक है कि रात भर में कौन सी दवाएं और क्या इलाज दिया गया।
- तनावपूर्ण माहौल: अस्पताल स्टाफ का व्यवहार परिजनों के प्रति बेहद अपमानजनक रहा, जिससे अस्पताल के भीतर ही भारी हंगामा हुआ।
स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले में यह हाल, तो बाकी प्रदेश का क्या होगा?
रीवा मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री का गृह जिला है। यहाँ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल (संजय गांधी) और निजी अस्पतालों की यह स्थिति प्रदेश की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाती है। क्या इलाज अब केवल पैसा कमाने का जरिया बन गया है? क्या किसी गरीब या मध्यमवर्गीय व्यक्ति की जान की कीमत केवल उसके बैंक बैलेंस से तय होगी?
प्रशासन की चुप्पी पर उठते सवाल
रामभाई मिश्रा का मामला केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, यह रीवा के हर उस नागरिक की कहानी है जो इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर काटता है। प्रशासन को इस मामले में 'मां भगवती अस्पताल' की बिलिंग प्रक्रिया और संजय गांधी अस्पताल के वेंटिलेटर आवंटन की उच्च स्तरीय जांच करनी चाहिए।