रीवा: 'समाजसेवा' या खून का धंधा? SGMH ब्लड बैंक खाली, सर्टिफिकेट दिखाकर खून लूट रहे 'दिखावटी नेता'!    

 
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Rewa SGMH Blood Bank में सिर्फ 6 यूनिट रक्त शेष! समाजसेवी संस्थाओं पर लगा गंभीर आरोप: पहले दान किया, फिर सर्टिफिकेट से 'फ्री' में आधा खून निकाल ले गए।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) विंध्य के सबसे बड़े स्वास्थ्य केंद्र, संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH) रीवा का ब्लड बैंक आज खून की कमी से जूझ रहा है। जहां 800 यूनिट रक्त की क्षमता है, वहीं यह जीवनरक्षक केंद्र वर्तमान में केवल 6 यूनिट रक्त के सहारे चल रहा है! यह संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि उन दिखावटी समाजसेवियों और सामाजिक संस्थाओं के घिनौने कारनामों का परिणाम है, जिन्होंने पहले तो वाहवाही लूटने के लिए विशाल रक्तदान शिविर लगाए, और फिर डोनर सर्टिफिकेट (Donor Certificate) का इस्तेमाल करके फ्री में आधे से ज़्यादा खून वापस निकाल लिया। इस स्वार्थ के खेल ने असली गरीब और जरूरतमंद मरीजों के हक पर डाका डाला है।

दिखावटी समाजसेवा का पर्दाफाश: स्वार्थ के लिए रक्तदान 
रीवा में सामाजिक कार्यों के नाम पर चल रहे इस खुले व्यापार ने समाजसेवा जैसे पवित्र शब्द को बदनाम कर दिया है। ये संस्थाएँ पहले तो बड़े-बड़े ऑडिटोरियम में रिकॉर्ड तोड़ रक्तदान शिविर लगाकर सुर्खियाँ बटोरती हैं, एसजीएमएच ब्लड बैंक का कोष बढ़ाती हैं, लेकिन इस दिखावे के पीछे छिपा स्वार्थ तब सामने आता है जब ये लोग ब्लड बैंक को खाली करने पहुँच जाते हैं।

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ये समाजसेवी ब्लड बैंक को अपना लाभ सधने का जरिया मात्र मानते हैं। फ्री में ब्लड इश्यू करवाने का नियम है कि आप डोनर सर्टिफिकेट दिखाएँ। इन संस्थाओं से जुड़े लोगों ने दान तो किया, लेकिन बाद में अपने सर्टिफिकेट्स का उपयोग खुद या अपने जान-पहचान वालों के लिए फ्री में खून लेने के लिए किया। इसका सीधा मतलब है कि जो रक्त दान किया गया, वह घूमकर वापस दाता के स्वार्थ में चला गया, गरीब के काम नहीं आया।

377 यूनिट रक्त की 'चोरी': कैसे खाली हुआ जीवनरक्षक बैंक?
कुछ महीने पहले एक एनजीओ द्वारा आयोजित विशाल शिविर में 377 यूनिट रक्त एसजीएमएच को मिला था। प्रबंधन को लगा कि ब्लड बैंक संकट से उबर गया, लेकिन यह खुशी अस्थायी साबित हुई। प्रबंधन को तब करारा झटका लगा जब एक-एक करके डोनर सर्टिफिकेट ब्लड बैंक पहुँचने लगे।

इस एक ही शिविर के 150 से ज़्यादा डोनर अपना सर्टिफिकेट लेकर गए और फ्री में ब्लड इश्यू करा लिया। जो बचा, वह भी इन्हीं दिखावटी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अपने संपर्क वालों को फ्री में दिलवाकर वाहवाही लूट ली। इस डोनर सर्टिफिकेट का दुरुपयोग ने ब्लड बैंक को उस स्तर पर खाली कर दिया है कि अब केवल 6 यूनिट रक्त बचा है। यह दिखाता है कि इन संस्थाओं से विश्वास उठना स्वाभाविक है।

फ्री ब्लड के 'दलाल': नेतागिरी और ठेकेदारी का गठजोड़
रीवा में कई ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता और नेता हैं, जिन्होंने फ्री ब्लड दिलाने को एक व्यापार बना लिया है। ये लोग कभी खुद रक्तदान नहीं करते, न ही ब्लड बैंक को दान करवाते हैं, लेकिन अस्पताल में हर दिन डेरा डाले रहते हैं। ये सक्षम लोगों को सिफारिश और दबाव से फ्री में ब्लड दिलाकर झूठी वाहवाही लूटते हैं।

इनमें से एक 'फ्री की समाजसेवा' करने वाले व्यक्ति का नाम भी चर्चा में है, जिन्होंने लोगों को रक्त दिलाने का ढोंग कर सामाजिक नाम कमाया। आज, वह व्यक्ति श्याम शाह मेडिकल कॉलेज (SSMC) में अपनी पत्नी के नाम से संस्था चलाकर करोड़ों के ठेके ले रहा है। यह सीधा सवाल खड़ा करता है कि क्या ये लोग ब्लड बैंक में दिखावटी समाजसेवा करके सरकारी संस्थानों से ठेके और लाभ लेने का रास्ता साफ करते हैं?

असली जरूरतमंदों का हक मारा गया: कैंसर, थैलेसीमिया मरीजों की पीड़ा 
यह सारा खेल उन गरीब और गंभीर मरीजों के जीवन पर खतरा बन गया है, जिन्हें वास्तव में फ्री ब्लड की जरूरत है।

  • पीड़ित: संजय गांधी अस्पताल में कैंसर, थैलेसीमिया और डायलिसिस के सैकड़ों मरीज आते हैं।
  • जरूरत: इन मरीजों को हर महीने करीब 250 यूनिट रक्त की जरूरत होती है।
  • वर्तमान स्थिति: सिर्फ 6 यूनिट ब्लड शेष होने के कारण, जरूरतमंद और गंभीर मरीजों का हक इन दिखावटी समाजसेवियों द्वारा मारा जा रहा है।

ब्लड बैंक में अब A+ का 1, B+ का 3, B- 3, AB- 1 यूनिट और 100 ML के सिर्फ तीन पीडियाट्रिक यूनिट ही बचे हैं।

जवाबदेही की माँग: प्रशासन कब करेगा ऐसे 'समाजसेवियों' पर कार्रवाई? 
यह समय है कि प्रशासन केवल रक्तदान शिविरों की संख्या गिनना बंद करे और गुणवत्ता तथा जवाबदेही पर ध्यान दे।

  • FIR और जाँच: उन सभी संस्थाओं के खिलाफ FIR दर्ज हो, जिन्होंने बड़ी संख्या में डोनर सर्टिफिकेट का उपयोग कर गरीबों के हक का खून वापस लिया है।
  • ठेका रद्द: उन दिखावटी नेताओं/समाजसेवियों के सभी सरकारी ठेके और लाइसेंस की उच्च स्तरीय जाँच हो, जिनका नाम फ्री ब्लड के दलाली में सामने आ रहा है।
  • नियमों में बदलाव: डोनर सर्टिफिकेट के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त नए नियम बनाए जाएँ ताकि यह सुनिश्चित हो कि दान किया गया रक्त केवल असली जरूरतमंदों के लिए ही उपयोग हो।

यह समाजसेवा नहीं, यह स्वार्थ का नंगा नाच है, जिस पर प्रशासन को तत्काल लगाम लगानी होगी।

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