नौनिहालो के निवाले पर डाका डालने वाले सेंट्रल किचन रीवा पर विभाग मेहरबान, सो रहा शिक्षा विभाग! प्रति माह लाखों का गोलमाल
रीवा कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी जी, एसी कमरे से निकलिए और देखिए सेंट्रल किचन का यह 'जहरीला' खेल!
ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। सफेद शेरों की ऐतिहासिक और गौरवशाली धरती अब उन 'सफेदपोश आदमखोरों' का चारागाह बन चुकी है, जिनकी नजर मासूम और गरीब बच्चों के हक के निवाले पर टिकी है। रीवा जिला मुख्यालय और आसपास के सरकारी स्कूलों में कक्षा पहली से आठवीं तक के हजारों नौनिहालों को पोषणयुक्त भोजन देने के दावों के साथ शुरू किया गया 'सेंट्रल किचन' आज की तारीख में संवेदनहीनता, कमीशनखोरी और महाभ्रष्टाचार की सबसे बड़ी प्रयोगशाला में तब्दील हो चुका है। परीक्षाओं का बहाना बनाकर और फंड का फर्जी रोना रोकर यहाँ बच्चों को भूखा मारा जा रहा है।
यह सीधे तौर पर रीवा के जिला कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के प्रशासनिक इकबाल को खुली चुनौती है। कलेक्टर साहब, आपके आलीशान और वातानुकूलित (AC) दफ्तर के ठीक पीछे इस महापाप को अंजाम दिया जा रहा है। कागजों पर 'सब चंगा सी' की मुहर लगाकर जनता की आंखों में धूल झोंकने वाले शिक्षा विभाग और जिला पंचायत के भ्रष्ट अधिकारियों की वजह से आज रीवा के गरीब घरों के बच्चे स्कूलों में पढ़ाई करने के बजाय भूख से तड़पने को मजबूर हैं। वक्त आ गया है कि आप अपने बंद कमरों से बाहर निकलें, बिना किसी पूर्व सूचना के मौके पर औचक निरीक्षण करने पहुंचें, ताकि आपको अपनी नाक के नीचे चल रहे इस घिनौने खेल का असली नजारा साफ-साफ दिखाई दे सके।
दाल के नाम पर हल्दी का पीला पानी: बच्चों की सेहत से खिलवाड़ कर कौन भर रहा तिजोरियां?
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ये बच्चे उन गरीब, मजदूर और शोषित परिवारों से आते हैं, जिनके लिए स्कूल का यह मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) सिर्फ एक वक्त का खाना नहीं, बल्कि उनके शरीर के लिए जरूरी पोषण का इकलौता जरिया है। लेकिन रीवा के सेंट्रल किचन के संचालक और ठेकेदार ने इन मासूमों की थाली को ही अपनी तिजोरी भरने का जरिया बना लिया है। अभिभावकों और शिक्षकों का गुस्सा अब ज्वालामुखी बनकर फटने को तैयार है, क्योंकि इस किचन से बनकर स्कूलों में सप्लाई होने वाला खाना किसी 'जहर' या कचरे से कम नहीं है।
सेहत से खिलवाड़: हकीकत बनाम सरकारी कागज
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│ शासन का निर्धारित मेनू │ सेंट्रल किचन की जमीनी हकीकत │
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│ 1. गाढ़ी, पौष्टिक व दाल-सब्जी │ 1. हल्दी और नमक मिला पीला पानी │
│ 2. गरम, मुलायम और पकी रोटियां │ 2. जानवरों के खाने लायक कच्ची रोटी│
│ 3. सप्ताह में विशेष पोषाहार │ 3. मीनू डायरी को कूड़े में फेंका │
│ 4. बच्चों का शारीरिक विकास │ 4. पढ़ाई के बजाय भूख से तड़पते बच्चे│
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जब खाना स्कूलों में पहुंचता है, तो उसे देखकर रूह कांप जाती है। दाल के नाम पर सिर्फ हल्दी और नमक घुला हुआ खौलता पीला पानी डिब्बों में भरा होता है, जिसमें दाल का एक दाना ढूंढने से भी नहीं मिलता। रोटियां इतनी सूखी, कड़क और अधपकी होती हैं कि उन्हें चबाना मासूम बच्चों के बस की बात नहीं है। कक्षा 6वीं, 7वीं और 8वीं के छात्र जो देश का भविष्य बनने का सपना लेकर स्कूल आते हैं, वे दोपहर होते-होते भूख के मारे बेंच पर सिर रखकर रोने लगते हैं। शासन द्वारा जारी की गई 'मीनू डायरी' को इस ठेकेदार ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है। सवाल यह उठता है कि बच्चों के स्वास्थ्य के साथ इस कदर जानलेवा खिलवाड़ करने की हिम्मत इस ठेकेदार में आई कहाँ से?
"क्या खाना पशुओं को खिलाएं?"— संवेदनहीनता की पराकाष्ठा और अधिकारियों की बेशर्म दलीलें
भ्रष्टाचार से भी ज्यादा खतरनाक और डरावनी इन ठेकेदारों और उनके संरक्षकों की 'मानसिकता' है। जब स्कूल प्रबंधन या जागरूक नागरिक खाने की बेहद घटिया क्वालिटी और कम मात्रा को लेकर सवाल उठाते हैं, तो सेंट्रल किचन के कर्ता-धर्ता बेहद अमानवीय और बेशर्म तर्क देते हैं। इनका कहना होता है कि "अगर बच्चे स्कूल नहीं आए, तो क्या खाना हम पशुओं को खिला दें?" यह बयान रीवा के समूचे प्रशासनिक तंत्र और इंसानियत के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह सवाल सीधे तौर पर उन अधिकारियों से है जो सरकार से लाखों रुपये की सैलरी लेते हैं और सरकारी गाड़ियों में घूमकर मॉनिटरिंग का ढोंग करते हैं। क्या आपको इंसानों के मासूम बच्चों और पशुओं के बीच का फर्क समझ में नहीं आता? या फिर भ्रष्टाचार की मोटी मलाई और कमिशन के नोटों ने आपकी आंखों की रोशनी के साथ-साथ आपके भीतर की बची-खुची संवेदनाओं को भी पूरी तरह से मार डाला है? बच्चों को पशुओं के समकक्ष खड़ा करने की यह धृष्टता इस बात का प्रमाण है कि इन्हें प्रशासन और कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है।
शिक्षा विभाग की 'महीना' सेटिंग: आज तक एक भी अधिकारी जांच करने क्यों नहीं पहुंचा?
इस पूरे महाघोटाले की जड़ें शिक्षा विभाग के दफ्तरों के भीतर तक धंसी हुई हैं। अंदरूनी सूत्रों और विभाग के ही ईमानदार कर्मचारियों का दावा है कि सेंट्रल किचन के इस ठेकेदार और शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों, खासकर मध्याह्न भोजन प्रभारी और उनके मातहतों के बीच हर महीने 'लाखों रुपये की मोटी रकम' की सेटिंग फिक्स है। यह एक ऐसा संगठित सिंडिकेट है जहां ऊपर से लेकर नीचे तक हर किसी का हिस्सा पहले से तय होता है।
यही वजह है कि आज तक इतिहास में कभी भी रीवा शिक्षा विभाग का कोई भी बड़ा जिम्मेदार अधिकारी, चाहे वह डीईओ (DEO) हो, बीआरसी (BRC) हो या मध्याह्न भोजन का मुख्य प्रभारी, कभी इस सेंट्रल किचन की हकीकत देखने, वहां की साफ-सफाई और कच्चे माल की गुणवत्ता की जांच करने औचक निरीक्षण पर नहीं गया। अगर कभी कोई टीम दिखावे के लिए जाती भी है, तो ठेकेदार को पहले ही फोन पर सूचना दे दी जाती है। बंद कमरों में चाय-नाश्ते के साथ कागजी कोरम पूरा कर लिया जाता है और 'सब कुछ ए-वन क्लास है' की रिपोर्ट बनाकर फाइल दबा दी जाती है। यह लापरवाही नहीं, बल्कि चंद रुपयों के लालच में रीवा के हजारों बच्चों की जिंदगी को दांव पर लगाने का जघन्य अपराध है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से सीधे सवाल: बच्चों का हक मारने वाले इन 'आदमखोरों' पर कब चलेगा बुलडोजर?
मध्य प्रदेश के मुखिया डॉ. मोहन यादव जी, आप पूरे प्रदेश में सुशासन का डंका बजा रहे हैं। आप लगातार मंचों से घोषणा करते हैं कि आपकी सरकार में गरीबों और कमजोरों का हक मारने वाले माफियाओं को जमीनदोज कर दिया जाएगा। तो फिर रीवा की धरती पर आपके इन 'भांजे-भांजियों' की सेहत और निवाले से खिलवाड़ करने वाले इन सरकारी और गैर-सरकारी माफियाओं पर आपका बुलडोजर कब चलेगा? क्या रीवा के गरीब नौनिहालों का हक इन भ्रष्ट अधिकारियों की तिजोरियां और आलीशान बंगले बनाने के लिए है?
रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी जी को भी यह समझना होगा कि इस गंभीर मामले में अब सिर्फ औपचारिक जांच कमेटियां गठित करने से काम नहीं चलेगा। शिकायतों का अंबार लग चुका है, सबूत सामने हैं।
हमारी सीधी मांग और चेतावनी:
- 48 घंटे के भीतर इस भ्रष्ट और संवेदनहीन सेंट्रल किचन के ठेकेदार का टेंडर और अनुबंध तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।
- बच्चों के निवाले की मलाई खाने वाले मध्याह्न भोजन प्रभारी और संबंधित लापरवाह अधिकारियों को तुरंत सस्पेंड (Suspend) किया जाए।
- इन सभी दोषियों के खिलाफ आपराधिक साजिश और बच्चों की जान को खतरे में डालने की धाराओं के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज कर जेल भेजा जाए।
यदि अगले दो दिनों के भीतर प्रशासन ने इस गंभीर और संवेदनशील मामले पर कोई ठोस और दंडात्मक कार्रवाई नहीं की, तो यह जन-आक्रोश अब केवल खबरों तक सीमित नहीं रहेगा। रीवा के अभिभावक, जागरूक नागरिक और सामाजिक संगठन इन मासूम बच्चों के हक के लिए कलेक्ट्रेट का घेराव कर सड़कों पर उतरने को बाध्य होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।