MP LIVE : 20 मिनट धूप और कोरोना वायरस से मुकाबला, शोध में निकला यह निष्कर्ष



कोरोना संक्रमण के दौर में सुबह 11 से दोपहर दो बजे के बीच की 20 मिनट की धूप भारतीयों के लिए सबसे कारगर है। इस प्रयोग से कोरोना संक्रमितों में रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से बढ़ती है। जो लोग कोरोना की चपेट में नहीं आए हैं, उनके लिए भी बचाव का यह बेहतर उपाय है।

यह नतीजे एक शोध का निष्कर्ष है। इस शोध में डायबिटीज इंडिया, नेशनल डायबिटिक ओबेसिटी एंड कोलेस्ट्रॉल फाउंडेशन तथा न्यूट्रिशियन एक्सपर्ट ग्रुप इंडिया के अधीन देश के 60 विशेषज्ञों ने काम किया है। इनमें मध्य प्रदेश से इंदौर निवासी डा. प्रीति शुक्ला भी अकेली विशेषज्ञ शामिल थीं। दरअसल, यह स्थापित तथ्य है कि धूप विटामिन-डी का अच्छा स्रोत है, लेकिन कोरोना काल में इसका व्यापक असर राष्ट्रीय स्तर पर हुए शोध में सामने आया है।

आहार विशेषज्ञों ने डायबिटिक, मोटापा और उच्च रक्तचाप से पीड़ित सामान्य व कोरोना संक्रमित मरीजों पर शोध किया कि आहार के माध्यम से संक्रमित होने की आशंका को किस तरह कम किया जा सकता है। शोध के मुताबिक, हर व्यक्ति के आहार में मुख्य रूप से वजन के हिसाब से प्रोटीन की मात्रा (प्रति किलो एक ग्राम) और विटामिन-डी की जरूरत है। विटामिन-डी के लिए धूप सबसे बेहतर स्रोत है। प्रोटीन के लिए तीन समय का संतुलित आहार जरूरी है।

इसमें रोटी, चावल, दाल, सब्जी और दही शामिल हैं। कद्दू के बीज, अलसी, दही, राजमा, बादाम, अंडा, दाल और ओट्स से जिंक मिल सकता है। मूंगदाल, अंडा, मशरूम, गेहूं और चावल से सेलिनियम (माइक्रोन्यूट्रियंट्स) और विटामिन सी के लिए संतरा, नींबू, आंवला जरूरी है। संक्रमण से बचाव के लिए डिब्बाबंद खाना, तले पदार्थ, लंबे वक्त तक भूखा रहने से परहेज करना होगा। इस दौर में उपवास भी कम करने की सलाह दी गई है।

दोपहर की धूप इसलिए महत्वपूर्ण

डॉ. प्रीति शुक्ला के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार दुनिया के ठंडे देशों के लोगों को प्रति सप्ताह 50000 ईयू (इंटरनेशनल यूनिट) विटामिन-डी की जरूरत होती है तो भारतीयों को 60000 ईयू प्रति सप्ताह। भारतीयों की त्वचा का रंग गेहूंआ है। त्वचा पर सुबह के बजाय दोपहर 11 से दो बजे की धूप ज्यादा असरकारी होती है।शरीर के भीतर सबसे ज्यादा धूप दोनों बांहों और चेहरे से ही प्रवेश करती है इसलिए सूर्य की किरणों को रोकने वाली कोई क्रीम न लगाएं। सिर्फ 20 मिनट ही धूप में रहने की अनुशंसा है इसलिए पैराबैंगनी किरणों से होने वाला खतरा बेहद कम है।

(यह शोध बैलेंस न्यूट्रिशियन इज निडेड इन टास्क आफ कोविड-19 एकेडमिक इन इंडिया अ काल फार एक्शन फार न्यूट्रिशियन एंड फिजिशियन नाम से सितंबर माह में प्रकाशित हुआ है।)

इनका कहना है

50 हजार डाक्टरों से साझा की जा रही जानकारी शोध के निष्कर्षों को मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इसे देश के 50 हजार डाक्टरों से साझा किया जा रहा है।

- डॉ. बंशी साबू, सचिव, डायबेटिक इंडिया
Powered by Blogger.