REWA : सम्राट अशोक के शासनकाल में देउर कोठर में बने थे बौद्घ स्तूप : पढ़िए

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रीवा । देश ही नहीं विदेश तक में बौद्घ धर्म को मनाने वाले लोगों के रीवा जिले के देउर कोठर बने बौद्घ स्तूप किसी तीर्थस्थल से कम नहीं हैं। देउर कोठर को इतिहासविद तो जानते ही हैं बल्कि विदेशों में भी इसका पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्व है। यहां लगभग 2 हजार वर्ष पुराने बौद्घ स्तूप और लगभग 5 हजार वर्ष प्राचीन शैलचित्रों की श्रृंखला मौजूद है। जो 1980 से 1982 के बीच प्रकाश में आए थे। ये स्तूप सम्राट अशोक के शासनकाल में ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के निर्मित हैं। देउर कोठार स्थान, रीवा-इलाहाबाद मार्ग एचएन-27 पर सोहागी पहाड़ से पहले कटरा कस्बे के समीप स्थित है। रीवा से इसकी दूरी करीब 72 किमी है। यहां मौर्य कालीन मिट्टी ईट के बने 3 बड़े स्तूप और लगभग 46 पत्थरों के छोटे स्तूप बने हैं। अशोक युग के दौरान विंध्य क्षेत्र में बौद्घ धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ और भगवान बौद्घ के अवशेषों को वितरित कर स्तूपों का निर्माण किया गया।

बौद्घ स्तूपों की सबसे बड़ी श्रृंखलाः पुरातत्व विभाग के उपसंचालक जबलपुर पीसी महोबिया बताते हैं कि देउर कोठार के बौद्घ स्तूपों का समूह सबसे बड़ा बौद्घ स्तूप समूह है। जिसमें पहला बौद्घ स्तूप ईंटों द्वारा बनाया गया था। एक मौर्यकालीन स्तंभ भी है। जिसमें एक शिलालेख भी है। जिसकी शुरुआत भगवतोष से होती है। पुरातत्ववेत्ता नारायण व्यास बताते हैं कि देउर कोठार में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा खुदाई कराई जा रही थी। जिनकी टीम में वो भी शामिल थे। जिसमें उन्हें मन्नत शिलालेखों के साथ-साथ कुछ रेलिंग के टुकडे भी मिले थे। देउर कोठार पर शोधपत्र व पुस्तक का भी प्रकाशन हो चुका है।

यहां से था व्यापारिक मार्गः अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा में पर्यटन एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष महेशचंद्र श्रीवास्तव बताते हैं कि यह क्षेत्र कौशाम्बी से उज्जौनी अवंतिका मार्ग तक जाने वाला दक्षिणपक्ष का व्यापारिक मार्ग था। इसी वजह से बौद्घ अनुयायियों ने यहां पर स्तूपों का निर्माण किया होगा। ऐसा कहा जाता है कि देउर कोठार में भरहुत से अधिक प्राचीन स्तूप है। यहां बौद्घ भिक्षू आधात्मिक स्थल बनाकर शिक्षा-दिक्षा और साधना करते रहे होंगे। इसके प्रमाण यहां मिलते है। बौद्घ धर्म के अनुयायियों का विंध्य क्षेत्र शिक्षण केंद्र था। इसके प्रमाण देउर कोठार मे मिलते है। यहां पर खुदाई के दौरान मौर्य कालीन ब्राही लेख के अभिलेख, शिलापट्ट स्तंभ और पात्रखंड बड़ी संख्या में मिले।

आते हैं बौद्घ धर्मावलंबीः रीवा राजघराने के 34 वे बारिस पुष्पराज सिंह जू देव ने बताया कि श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार, भूटान, थाईलैंड, चीन आदि जैसे देशों से बौद्घ धर्मावलंबी भारी संख्या में देउर कोठार आते हैं। वो सबसे ज्यादा बौद्घ स्तूपों को ही देखना पसंद करते हैं और उन पर शोध भी करते हैं। देउर कोठार सहित सतना में भरहुत, मानपुर के बौद्घ स्तूपों को राष्ट्रीय बौद्घ टूरिज्म सर्कटि में शामिल किए जाने की मांग लंबे समय से की जाती रही है।

वर्जन

बौद्घ स्तूप को लेकर कई बार पुरातत्व विभाग से प्रस्ताव तैयार करा कर दिल्ली भेजा जा चुका है। इसका पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्व है। मैं इस दिशा में प्रयास करूंगा।

डॉ. इलैया राजा टी, कलेक्टर रीवा



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