REWA : सभी कालेजों की जनभागीदारी समितियों के रजिस्ट्रेशन की जानकारी तलब, अध्यक्षों के चयन की तैयारी शुरू : पूर्व जिम्मेदारों को इस बार अवसर नहीं मिलने के संकेत


रीवा। सरकारी कालेजों में जनभागीदारी समितियों को लेकर सरकार एक बार फिर संजीदा हो गई है। सभी कालेजों की जनभागीदारी समितियों से जुड़ी जानकारी तलब की गई है। उच्च शिक्षा विभाग ने अतिरिक्त संचालक से सभी जिलों के कालेजों की जानकारी मांगी है। जिसमें कालेजों का नाम और समितियों के गठन के रजिस्ट्रेशन के साथ ही वर्तमान अध्यक्ष की जानकारी दी जाएगी।

साथ ही जिन कालेजों के लिए रजिस्ट्रेशन नहीं हो सका है उसकी वजह भी बतानी होगी। जानकारी मिली है कि अतिरिक्त संचालक रीवा के कार्यक्षेत्र में वर्तमान में 71 सरकारी कालेज संचालित हो रहे हैं। जिसमें से 17 कालेज नए हैं जो हाल के वर्षों में खोले गए हैं। इन नए कालेजों की जनभागीदारी समितियों का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है। आगामी २४ नवंबर के पहले ही यह जानकारी भेजने निर्देश है।

अध्यक्षों की नियुक्यिां जल्द होने के संकेत
प्रदेश में सरकार स्थिर होने के बाद अब कालेजों की जनभागीदारी समितियों में भाजपा नेताओं की ताजपोशी की तैयारी की जा रही है। संगठन के स्तर पर कुछ प्रमुख कालेजों के लिए सूची भी तैयार हो चुकी है। इसकी अधिकृत घोषणा होना बाकी है। भाजपा के कई पुराने नेताओं को भी इस बार जनभागीदारी समितियों की जिम्मेदारी दी सकती है। पूर्व में समितियों की जिम्मेदारी संभालने वाले नेताओं को इस बार अवसर नहीं मिलने के संकेत संगठन की ओर से दिए गए हैं।

कांग्रेस सरकार नहीं कर पाई थी सभी कालेजों में नियुक्तियां
वर्ष 2018 में सरकार बदलते ही सभी कालेजों की जनभागीदारी समितियां भंग कर कलेक्टर या एसडीएम को जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके बाद कुछ प्रमुख कालेजों में कांग्रेस सरकार की ओर से नियुक्तियां की गई थी। संगठन के भीतर गुटबाजी की वजह से जिन नामों की घोषणा हुई थी उन पर सवाल उठाए गए और उन पर लगे पूर्व के आरोपों को सरकार तक पहुंचाया था। इस कारण अन्य कालेजों के लिए घोषणाएं रुक गई थी। इस वजह से सभी कालेजों में नियुक्तियां नहीं हो पाई थी। सरकार बदलते ही अध्यक्षों को हटा दिया गया है। 

पहले सांसद-विधायकों को चुना जाता था
जनभागीदारी समितियों में पहले सांसद, विधायकों को अध्यक्ष के तौर पर चुना जाता था। इसके बाद नियमों में बदलाव किए गए और गणमान्य नागरिक के नाम पर पार्टी कार्यकर्ताओं को महत्व सरकार देने लगी। भाजपा सरकार द्वारा बनाए गए इन नियमों को कांग्रेस की सरकार में भी लागू किया जाता रहा। एक बार सरकार ने यह भी नियम बनाया था कि जो अध्यक्ष चुने जाएंगे उन्हें समिति में निर्धारित राशि जमा करनी होगी लेकिन बाद में इसे भी संशोधित कर दिया गया। 
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