MP : सूर्य उपासना के साथ शुरू हुआ महापर्व छठ : अल सुबह से ही श्रद्धालुओं में खासा उत्‍साह

भोपाल, उज्‍जैन, रतलाम। सूर्य उपासना के महापर्व छठ की शुरुआत आज से हो रही है। पहले दिन नहाय खाय और सूर्य पूजा के साथ ही यह पर्व प्रारंभ हो गया है। चार दिवसीय महापर्व के लिए श्रद्धालुओं में अल सुबह से ही खासा उत्‍साह देखा जा रहा है। पर्व के दौरान चार दिनों तक श्रद्धा का सैलाब उमड़ेगा हालांकि कुछ स्‍थानों पर कोरोना संक्रमण के कारण सामूहिक पूजा नहीं होगी।

राजधानी भोपाल में भोजपुरी समाज में खासा उत्‍साह

भोपाल प्रतिनिधि के अनुसार राजधानी में बुधवार से चार दिवसीय सार्वजनिक छठ पूजा महापर्व नहाय खाए के साथ शुरू हो गया। दो दिवसीय महाप्रसाद ठेकुआ के लिए गेहूं की पिसाई निशुल्क की जाएगी। शनि मंदिर प्रांगण कमला पार्क पर दोपहर 12 बजे से 19 नवंबर गुरुवार को खरना, 20 नवंबर शुक्रवार को डूबते हुए सूर्य को पूजा अर्चना के उपरांत कमर भर पानी में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य देव को ठेकुआ पकवान एवं ऋतु फल बांस के सूपा में सजा कर अक्षत दीप धूप जल से सामूहिक रूप से अर्ध्य अर्पित करेंगे।

42 जगहों पर छठ पूजा महापर्व का आयोजन

सभी व्रतधारी 21 नवंबर को पारण उगते हुए सूर्य देव को अर्ध्य अर्पित करेंगे। इसके साथ ही छठ पूजा महाव्रत का समापन होगा। इस बार 42 जगहों पर छठ पूजा महापर्व का आयोजन किया जा रहा है। 20 नवंबर को भोजपुरी एकता मंच के तत्वाधान में शीतल दास की बगिया एवं वर्धमान सनसेट पार्क छठ घाट पर पर्व का आयोजन किया जाएगा।

घाटों पर रहेंगे सुरक्षा के इंतजाम भी

इसमें 2100 दीपों का दीपदान, घाट पर मास्क का वितरण एवं सैनिटाइजर की व्यवस्था रहेगी। इस अवसर पर डाक्टरों की टीम भी रहेगी, जो घाट पर आने वाले व्यक्तियों का थर्मल स्कैनिंग करेगी। घाट पर पालीथिन के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई। महर्षि पतंजलि परिसर गांधीनगर में छठ पूजन के लिए नए कुंड का निर्माण नगर निगम के सहयोग से किया गया।

छठ महापर्व की तैयारियां पूरी

बिहार सांस्कृतिक परिषद के कार्यकर्ताओं एवं छठव्रती श्रद्धालुओं द्वारा छठ महापर्व की तैयारी सरस्वती मंदिर प्रांगण, ई सेक्टर, में पूरी हो चुकी है। इसके अलावा संत हिरदाराम नगर, कोलार, आनंद नगर सहित अन्य स्थानों पर छठ पर्व मनाया जाएगा।

निभाई नहाय-खाय की रस्म, लिया छठ महाव्रत का संकल्प

बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े चार दिनी त्यौहार छठ पूजा की छटा बुधवार को शहर में बिखरने लगी है। पहले दिन व्रतधारियों ने नहाया-खाय की रस्म निभाते हुए छठ महाव्रत का संकल्प लिया। इसमें सुबह स्नानकर व्रतधारियों ने ध्यान कर साफ बर्तन में स्वयं के हाथ से चावल, दाल, लौकी की सब्जी बनाकर प्रसाद में ग्रहण की। इसके साथ ही सूर्य उपासना के पर्व पर किए जाने वाले व्रत का संकल्प लिया।

पूर्वोत्तर सांस्कृतिक संस्थान के महासचिव के के झा ने बताया कि बताया कि सूर्य को ग्रंथ में प्रत्यक्ष देवता बताया गया है जिन्हें हम खुद देख सकते हैं। सूर्य उर्जा का स्त्रोत है और इसकी किरणों में रोग प्रतिरोधक क्षमता है। इनकी आराधना का पर्व हर वर्ष हर्षोल्लास से मनाया जाता है। पर्व के पहले दिन पहले दिन बुधवार को नहाय-खाय, गुरुवार को खरना, शुक्रवार को अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देकर छठ पूजा की जाएगी।

शनिवार को 21 को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के सात पर्व का समापन होगा। इस बार कोरोना महामारी के कारण शहर के बड़े छठ पूजा के सार्वजनिक आयोजन नहीं किए जा रहे है। ऐसे में व्रतधारी घरों में ही जलकुंड बनानकर सूर्य को अर्घ्य देंगे। सभी से कोरोना महामारी के मद्देनजर सरकार द्वारा जारी गाइड लाइन पालन करने का आग्राह किया गया है। इस मौके पर समाजजन कृत्रिम जलकुण्डों पर मास्क पहनकर और सामाजिक दुरी का पालनकर छठ पर्व मनाएंगे।

शुक्ल पंचमी को होगा खरना, 36 घंटे के निर्जरा व्रत की शुरुआत

छठ पर्व के दूसरे दिन गुरुवार को खरना होगा। इसमें व्रतधारी दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को गन्ने के रस से बने हुए चावल की खीर के साथ चावल का पिट्टा, घी की चुपड़ी रोटी का प्रसाद भगवान सूर्य को लगाएंगे। इसके बाद स्वयं भी भोजन करेंगे। भोजन के बाद व्रतधारियों को 36 घंटे का निर्जला व्रत की शुरुआत होगी। चार दिनी पर्व का मुख्य दिन शुक्रवार को होगा जब कमर तक जल में खड़े होकर व्रतधारी अस्त होते सूरज को अर्घ्य देंगे।

रतलाम में उत्‍साह का माहौल

रतलाम प्रतिनिधि के अनुसार चार दिवसीय छठ पर्व को लेकर शहर में श्रद्धालुओं में उत्‍साह का माहौल है।इस वर्ष कोरोना संक्रमण के कारण रतलाम में निवासरत पूर्वांचलवासी सावधानी बरतते हुए जल कुंडों में पूजन विधि संपन्न करेंगे। उल्लेखनीय है कि इस व्रत को बिहार में वर्ष में दो बार मनाया जाता है। देश के विभिन्न भागों में बसे बिहार निवासी अपनी जन्म भूमि लौटने का प्रयास करते हैं। वर्ष में एक बार यह व्रत चैत्र माह की शुक्ल पक्ष छठ को किया जाता है, जिसे चैती छठ कहते हैं। दूसरी बार यह कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की छठ को किया जाता है। इसे कतकी छठ कहते हैं।

लोक जीवन में कतकी छठ को अधिक महत्व दिया जाता है। ऐसा इसलिए कि कार्तिक मास पुण्य का मास माना जाता है। दूसरा तर्क यह है कि चूंकि कार्तिक माह से शरद ऋतु प्रारंभ होती है, इसलिए इस माह में उपवास रखने में कष्ट कम होता है। इसलिए कतकी छठ करने वालों की संख्या अधिक होती है। छठ व्रत सूर्य षष्ठी के साथ कहीं–कहीं डाला छठ के नाम से भी मनाया जाता है। हिंदू समाज का सांस्कृतिक व्रत छठ मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाता है, लेकिन कुछ पुरुष भी इसे करते हैं।

छठ ही एक  मात्र ऐसा व्रत है, जिसमें पहले अस्त होते और बाद में उगते सूर्य की उपासना की जाती है। व्रत प्रारंभ होकर अनुष्ठान समाप्ति तक रात–दिन छठ व्रत से संबंधित गीत होते हैं। चतुर्थी को व्रती स्नान कर पूजा करते हैं और तब अत्यंत नियमपूर्वक शुद्ध भोजन बनाकर केवल दिन में भोजन करते हैं। इसे बिहार अंचल में नहा खाय या नहाय खाय भी कहा जाता है। इस विधि के बाद से यानी नहाय खाय के दिन से ही व्रत का आरंभ माना जाता है। उस दिन भोजन में सिर्फ अरवा, चावल या भात, चने की दाल और कद्दू की सादी छौंकी हुई तरकारी ग्रहण की जाती है।

पंचमी को दिनभर उपवास रखकर शाम को स्नान कर पूजा करते हैं और तब खीर व रोटी खाते हैं। इसे खरना कहते हैं। इसे चंद्रमा देखने के बाद ही किया जाता है। षष्ठी को निराहार रहकर शाम को नदी, तालाब अथवा कुंड के किनारे व्रती सूर्यास्त के समय विविध पकवान, फल, फूल, पान सुपारी, रोली, अक्षत, दूध आदि पूजन सामग्री कच्चे बांस के बने नए सूपों में सजाकर अस्ताचल के सूरज की ओर मुंह करके अर्घ्य देते हैं और घर लौट आते हैं। अर्घ्य देने के समय व्रती अपने परिवार की खुशहाली की कामना भगवान सूर्य से करती हैं। सप्तमी को प्रात: फिर षष्ठी की संध्या की ही तरह पूर्ववत उन्हीं निश्चित स्थानों पर पानी के किनारे खड़े होकर उदयमान सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत के अनुष्ठान की समाप्ति होती है।

उज्जैन में विक्रम सरोवर, रामघाट पर बिखरेगी छठ उत्सव की छटा

उज्जैन प्रतिनिधि के अनुसार धर्मधानी उज्जयिनी में छठ पर्व आरंभ हो गया स्थानीय विक्रम सरोवर और रामघाट पर छठ पूजा होगी। प्रशासन स्तर पर इसकी तैयारियां शुरू हो गई हैं। बता दें कि शहर में बड़ी संख्या में पूर्वांचलवासी रहते हैं। हर वर्ष पर्व उल्लास के साथ मनाया जाता है। हालांकि इस वर्ष कोरोना को देखते हुए पर्व सादगी से मनाया जाएगा।

नागदा में पास दिखाने पर मिलेगा प्रवेश

नागदा में भी पर्व को लेकर तैयारियां की गई हैं। कोरोना काल को देखते हुए प्रशासनिक अधिकारी अपने स्तर पर व्यवस्थाएं जुटाने में लगे हैं। इस बार चंबल नदी के तीन घाटों पर पूजन होगा। इसके लिए पास व्यवस्था की गई है। वितरण के पहले दिन मंगलवार को 2500 लोगों को पास वितरित किए गए। अभी दो और दिन पास बांटे जाएंगे।

इन तीन घाटों पर पूजन

महिलाएं अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगी। इसके लिए नायन, मेहतवास और हनुमान डैम घाटों पर व्यवस्था की गई है। पर्व की तैयारियों को लेकर साफ-सफाई शुरू हो गई है। इन घाटों पर प्रवेश उन्हें ही मिलेगा, जिनके पास जारी होंगे। मंगलवार से श्रद्धालुओं के पास बनाने और उन्हें वितरित करने का काम शुरू हो गया। दुर्गापुरा, सी ब्लॉक, रामलीला मैदान, मेहतवास, गवर्नमेंट कॉलोनी, इंद्रपुरी कॉलोनी एवं विद्या नगर में स्टॉल लगाकर पंजीयन किया गया। मंगलवार की दोपहर तक लगभग 1284 व्यक्तियों ने पंजीयन कराया। 2568 लोगों को चंबल घाट पर जाने की अनुमति मिल चुकी है। राजस्व निरीक्षक बसंतसिंह रघुवंशी द्वारा दिनभर आठ पंजीयन स्थल का निरीक्षण किया गया। इस दौरान ललितदास पंथी सहित नपा अधिकारी मौजूद रहे।

घरों में सफाई के साथ छठ व्रती जुटे तैयारियों में

खंडवा । उत्तर भारतीय परिवार द्वारा मनाएं जाने वाले चार दिवसीय छठ पर्व की शुरूआत बुधवार को नहाए-खाए के साथ हुई। पर्व के लिए घरों में साफ सफाई के साथ छठी माता के पूजन की तैयारियों में जुट गए है। पर्व के मुख्य दिवस 20 ओर 21 नवंबर को डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। छठ का सामूहिक आयोजन शहर में आबना नदी स्थित गणगौर घाट पर होगा।

छठ पूजन के संबन्ध में उदितनारायण झा ने बताया कि चार दिवसीय छठ पर्व की शुरुआत नहाए खाए के साथ हो चुकी है। इस दिन घर में साफ-सफाई और प्रसादी की तैयारी की जा रही है।। छठ व्रती स्नान कर शुद्धता के साथ भोजन तैयार करेंगे। इस दिन कद्दू की सब्जी, बगैर मसले की चना दाल और अरवा चावल की प्रसादी ग्रहण की जाएंगी।

36 घण्टे रहेंगे निराहार तुला लग्न

छठ पर्व अंतर्गत 19 नवंबर को खरना मनाया जाएगा। इस दिन गन्ने के रस की खीर बनाई जाती है। इसके बाद प्रसाद को बांस की टोकरी में रखा जाएगा। इसे दउरा या दौरा भी कहा जाता है। गुरुवार को खीर-पूड़ी और प्रसादी बनेंगी। छठ का व्रत रखने वाले करीब 36 घण्टे निरहार रहकर पूजा-अर्चना करेंगे।

20 को करेंगे सूर्य की उपासना

शुक्रवार से सूर्य की उपासना का दौर शुरू होगा। गणगौर घाट पर 20 नवंबर को शाम में पानी में खड़े रहकर डूबते सूर्य को अर्घ्य तथा 21 नवंबर को सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर को पर्व मनाया जाएगा।

उत्तर भारत से आई पूजन सामग्री

छठ पर्व के लिए जरूरी की प्रकार की पूजन सामग्री यह उपलब्ध नहीं होने से इसे उत्तर भारत से बुलवाया गया है। इसमें गंगा की पवित्र मिट्टी व जल भी बुलाया गया है।

सूर्य अर्घ्य देने का महत्त्व

कार्तिक मास की छठ को परंपरा अनुसार छठी माता का पूजन किया जाता है, जो भगवान सूर्य की बहन है। मान्यता है कि माता को प्रसन्न करने के लिए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। छठ माता को संतान देने वाली माता के नाम से भी जाना जाता है। छठ पर्व संतान की कामना और सुख-शांति के लिए भी मनाया जाता है। छठ पर सूर्य को अर्घ्य देने के पीछे स्वास्थ्य से जुड़े वैज्ञानिक कारण भी हैं।

छठ पूजा 2020 की तिथियां

18 नवंबर 2020, बुधवार- चतुर्थी (नहाय-खाय)

19 नवंबर 2020, गुरुवार- पंचमी (खरना)

20 नवंबर 2020, शुक्रवार- षष्ठी (डूबते सूर्य को अर्घ्‍य)

21 नवंबर 2020, शनिवार- सप्तमी (उगते सूर्य को अर्घ्‍य)

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